पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आगरा से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक छोटे से औद्योगिक शहर फिरोजाबाद के बाहरी इलाकों में कांच के कारखानों की कुछ चिमनियों से धुएं की पतली लकीरें निकल रही हैं और कुछ ठंडी खड़ी हैं। सघन बसे औद्योगिक क्लस्टर के साथ फिरोजाबाद की अर्थव्यवस्था तकरीबन पूरी तरह से कांच और चूड़ी उद्योग पर निर्भर है।
औद्योगिक क्लस्टर की गलियों में कामगार दोपहर के भोजन के अवकाश के दौरान कारखानों के बाहर जमा थे और भू-राजनीति तथा आपूर्ति श्रृंखला के झटकों पर चर्चा कर रहे थे। हजारों किलोमीटर दूर चल रहे अमेरिका-इजरायल और ईरान के संघर्ष की आंच उन तक भी पहुंच रही है। हालांकि उनकी लड़ाई रोजगार के नुकसान के खिलाफ है, जिसने इस शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
गलियों में आम दिनों के मुकाबले कम भीड़-भाड़ थी। कुछ वर्कशॉप में सन्नाटा पसरा था तो कुछ के शटर गिरे हुए थे। फिरोजाबाद के बाहरी इलाके में राजा का ताल औद्योगिक क्षेत्र में चल रही एक फैक्टरी के भीतर कामगार पिघले हुए कांच की नारंगी चमक और भट्ठियों से निकलती झुलसा देने वाली गर्मी के बीच कड़ी मेहनत कर रहे थे।
पूजा ग्लास वर्क्स के निदेशक आशीष बंसल ने कहा, ‘कांच की चूड़ी के कई कारखाने बंद हो गए हैं। हमारे जैसे बड़े संयंत्र अपनी क्षमता से कम पर काम कर रहे हैं।’
रीसाइक्लिंग के लिए कांच के टूटने या उसे वापस असेंबली लाइन में डाले जाने की आवाज और भारी मशीनों की घरघराहट ने उनकी आवाज को लगभग दबा दिया था।
क्लस्टर में एक और बड़े संयंत्र ओम ग्लास वर्क्स ने अपने दो कारखानों में से एक को बंद कर दिया है। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी बंद पड़े संयंत्र के बगल में बने एक कार्यालय में बैठे थे जहां मशीनें खामोश खड़ी थीं और जो ट्रक कभी तैयार माल ले जाते थे, वे भी खड़े थे। कारखाने में बारह मशीनों में से केवल पांच चल रही हैं।
ओम ग्लास वर्क्स के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘हमने अपनी उत्पादन क्षमता में 30 फीसदी की कटौती की है। समस्या केवल छोटे कारखानों के लिए नहीं है यह पूरे उद्योग के लिए है। हमें कुछ मशीनों को चालू रखना पड़ा है क्योंकि बाद में मशीनों को फिर से चालू करना महंगा पड़ता है।’
उपभोक्ता वस्तुओं की कंपनियों के लिए बोतलें और कांच के अन्य सामान बड़े कारखाने में बनाए जाते हैं जबकि चूड़ियां अपेक्षाकृत छोटी इकाइयों में बनाई जाती हैं। बड़े कारखाने स्वचालित हैं मगर चूड़ी उत्पादन अभी भी काफी हद तक मानव श्रम पर निर्भर करता है।
ईस्टर्न ग्लास इंडस्ट्रीज का बड़ा कारखाना है जो कांच की बोतलें बनाता है और उसकी एक छोटी इकाई कांच की चूड़ियां बनाती है। ईस्टर्न ग्लास इंडस्ट्रीज के सुपरवाइजर प्रदीप शर्मा ने कहा, ‘निश्चित रूप से हमारे दोनों संयंत्रों पर असर पड़ा है और हम अपनी कुल क्षमता के लगभग 70 फीसदी पर काम कर रहे हैं। चारों ओर डर का माहौल है।’
ईंधन आपूर्ति पर ताजा दबाव विनिर्माण क्लस्टर की परेशानियों को बढ़ा रहा है। पश्चिम एशिया और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण एलएनजी और एलपीजी शिपमेंट में व्यवधान के बाद सरकार ने उद्योगों की बजाय घरों, परिवहन ईंधन और अन्य आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है जिससे उद्योगों को गैस की आपूर्ति सीमित हो गई है।
कांच विनिर्माताओं की भट्ठियां लगातार चलती हैं और स्थिर ईंधन आपूर्ति पर निर्भर करती हैं। कुछ कारखाने दूसरों की तुलना में अधिक खराब स्थिति में हैं।
श्री इंदिरा साइंटिफिक ग्लास वर्क्स के प्रबंधक अंकुर मित्तल ने कहा, ‘हमारे उत्पादन में 50 फीसदी की कमी आई है। हमारा संयंत्र अपनी क्षमता के आधे पर चल रहा है।’ उन्होंने कहा कि सीमित गैस आपूर्ति के अलावा निर्माण के लिए आवश्यक रसायनों की कीमतें भी बढ़ गई हैं।
जूपिटर ग्लास वर्क्स के प्रबंधक राम कुमार ने कहा, ‘सरकार के हाथ भी युद्ध से बंधे हैं। जब तक युद्ध समाप्त नहीं हो जाता, तब तक हमारे कारोबार के अस्तित्व पर जोखिम है।’
फिरोजाबाद की कांच की भट्ठियां लंबे समय से प्राकृतिक गैस से चल रही हैं जहां सैकड़ों इकाइयों की भट्ठियों को चौबीसों घंटे चलाने के लिए लगातार गैस की आपूर्ति आवश्यक है। ताज ट्रेपेजियम जोन के आसपास के उद्योगों के कारखानों को कोयला छोड़ने और ताजमहल के आसपास प्रदूषण कम करने में मदद करने के लिए प्रतिदिन लगभग 11 लाख स्टैंडर्ड घनमीटर गैस आवंटित की गई थी। यह गैस गेल (इंडिया) की सहायक कंपनी गेल गैस लिमिटेड द्वारा संचालित सिटी गैस नेटवर्क के माध्यम से आपूर्ति की जाती है।
राजा का ताल में गेल का संचालन और रखरखाव कार्यालय उन औद्योगिक इकाइयों से कुछ ही दूरी पर स्थित है जो इस पर निर्भर हैं। गेल कार्यालय के एक कर्मचारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, ‘हमें सब्सिडी वाली गैस के उपयोग को 60 फीसदी तक सीमित करने का दिशानिर्देश प्राप्त हुआ है। इस सीमा से परे कारखानों को बाजार दर पर रीगैसिफाइड एलएनजी प्राप्त करना होगा।’
औद्योगिक इकाइयों को आम तौर पर सस्ती ईंधन का सीमित हिस्सा ही मिलता है, बाकी व्यावसायिक दरों पर आपूर्ति की जाती है। आपूर्ति में दबाव के दौरान वितरक खपत को सीमित कर सकते हैं और अतिरिक्त गैस की आपूर्ति एलएनजी से जुड़ी कीमतों पर कर सकते हैं, जिससे कांच विनिर्माण जैसे ऊर्जा-गहन क्षेत्रों की लागत बढ़ जाएगी।
पीतांबर ग्लास वर्क्स के प्रबंधक अशोक अग्रवाल ने कहा, ‘जब तक गेल हमें गैस आपूर्ति पर कुछ भरोसा नहीं देती, हम अपने कर्मचारियों या ग्राहकों को कोई आश्वासन नहीं दे सकते। हमें प्रतिदिन 4,000 घनमीटर मीटर गैस की आवश्यकता है। आपूर्ति में कटौती के बाद से, हमें लगभग 2,800 घनमीटर मीटर गैस मिल रही है। यह हमारे सभी संयंत्रों को चालू रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। हम अधिक से अधिक 100 से 200 घनमीटर की कटौती को सहन कर सकते हैं। हमने अपनी छह मशीनों में से दो को बंद कर दिया है।’
फिरोजाबाद के कांच कारखानों में कार्यबल में आम तौर पर स्थायी कर्मचारियों की संख्या कम होती है और ज्यादातर दैनिक श्रमिक होते हैं। स्थायी कर्मचारी भट्ठियों, मशीनों और फिनिशिंग का कामकाज देखते हैं और उत्पादन में मंदी के दौरान भी नियमित मजदूरी प्राप्त करते रहते हैं। इसके विपरीत दैनिक कामगारों को कच्चे माल ले जाने, कांच छांटने या तैयार चूड़ियां पैक करने जैसे कामों में पाली के आधार पर रखा जाता है।
जब कारखाने में उत्पादन कम होता है तो सबसे पहले दिहाड़ी कामगार ही प्रभावित होता है। काम कम होने की वजह से कई श्रमिक अपने गांव लौट गए हैं।
दशकों से यहां की भट्ठियों और वर्कशॉप ने देश को रंग-बिरंगी चूड़ियां, कांच के सामान, मोती और सजावटी चीजें उपलब्ध कराई हैं। भारत का ‘कांच का शहर’ कहे जाने वाले फिरोजाबाद के ईकोसिस्टम ने हजारों की संख्या में लोगों को रोजगार दिया है।
ओम ग्लास के एक वरिष्ठ कार्याधिकारी ने कहा, ‘हमारे जैसे बड़े प्लांट तो किसी तरह अभी तक टिके हुए हैं लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे तो हमें कुछ लोगों को नौकरी से निकालना पड़ सकता है। हालात किस तरफ जाएंगे, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध कितने समय तक चलता है। नौकरियां जाएंगी और प्लांट बंद होंगे क्योंकि हमारा उद्योग पूरी तरह से गैस आपूर्ति पर निर्भर है।’
कारखाने के अंदर कई मशीनें बंद पड़ी थीं, उनकी कन्वेयर बेल्ट नहीं चल रही थीं। कारखानों के चालू हिस्सों में श्रमिक पिघले हुए कांच वाली लंबी धातु की छड़ों को ले जाते हुए, मशीनों के बीच तेजी से घूम रहे थे। प्रदीप शर्मा ने कहा कि उन्होंने अभी तक कर्मचारियों को नहीं निकाला है लेकिन उन्होंने बैचों में श्रमिकों को बुलाना शुरू कर दिया है। यदि व्यवधान जारी रहा तो छंटनी की जा सकती है।
अंकुर मित्तल ने कहा, ‘कांच की चूड़ी बनाने वाले कारखाने श्रम पर निर्भर करता है और स्वचालन लगभग नगण्य है। हमारे पास आम तौर पर प्रतिदिन लगभग 160 से 170 मजदूर काम करते हैं लेकिन अब हमने लोगों को एक-दिन छोड़कर यानी बारी-बारी से बुलाना शुरू कर दिया है, जिससे दैनिक संख्या लगभग 100 से 120 मजदूर रह गई है।’
क्लस्टर के ठीक बाहर छोटी सड़क किनारे बने ढाबे आम तौर पर कारखाने के कमागारों से भरे रहते थे मगर अब वहां असामान्य शांति थी। इसी इलाके में ढाबा चलाने वाले अजित शर्मा ने कहा, ‘पहले रोज सैकड़ों ग्राहक आते थे लेकिन अब मुश्किल से टेबल भर पाता है। बहुत से परिचित चेहरे थे जो अब नजर नहीं आ रहे हैं।’
उनके ढाबे के पीछे रचना इंडस्ट्रीज के एक प्लांट का शटर गिरा हुआ था। प्रबंधन कर्मचारी बाहर जमा थे और अगले हफ्ते प्लांट को फिर से खोलने पर चर्चा कर रहे थे।
एक चूड़ी फैक्टरी में काम करने वाले मुकेश कुमार ने कहा, ‘मेरे कई सहकर्मी चले गए हैं। वे या तो अपने गांव लौट गए हैं या फिर दूसरा काम तलाश रहे हैं। ये सड़कें कभी लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहती थीं मगर अब यहां एक अजीब सी खामोशी छाई हुई है।’
मित्तल ने कहा, ‘पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म होने के बाद भी आपूर्ति श्रृंखला ठीक होने में समय लगेगा। यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि युद्ध कब खत्म होता है बल्कि यह भी अहम है कि हम सबके लिए हालात कब पूरी तरह से सामान्य होते हैं।’