चालू वित्त वर्ष में भारतीय बाजारों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का निवेश एक जैसा नहीं रहा है। जहां शेयरों को उनकी लगातार बिकवाली के दबाव का सामना करना पड़ रहा है, वहीं डेट सेगमेंट में उन्होंने मामूली निवेश बनाए रखा है।
चालू वित्त वर्ष में विदेशी निवेशक भू-राजनीतिक तनाव और उभरते बाजारों की मुद्राओं में बढ़ती अस्थिरता के कारण जोखिम से दूर रहे हैं और उन्होंने शेयरों से अब तक 1.37 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की है। दूसरी ओर, इसी अवधि में ऋण में उनका 13,964 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश देखा गया और इसे आकर्षक घरेलू ब्याज दरों का समर्थन मिला। यह इसके बावजूद हुआ जब भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कमी भी की और रुपये में कमजोरी भी आई।
बाजार के जानकारों का कहना है कि वित्त वर्ष के दौरान ऋण सेगमेंट में निवेश में मजबूती काफी हद तक अधिक कमाई के इच्छुक निवेशकों और पैसिव निवेशों के कारण आई जिन्होंने भारत के ब्लूमबर्ग ग्लोबल इंडेक्स में शामिल होने की उम्मीद में निवेश किए। आपूर्ति के दबाव ने भी यील्ड को ऊंचा बनाए रखा है, जिससे जोखिम-समायोजन आधार पर भारतीय ऋण अपेक्षाकृत आकर्षक बन गए। हालांकि, निवेश की मात्रा सीमित रहा। एक निजी बैंक के ट्रेजरी प्रमुख ने कहा, अभी भी कई ऐसे निवेशक हैं जो अधिक ब्याज दर के नजरिये से भारत पर ध्यान दे रहे हैं। इसीलिए कुछ पैसा आ रहा है। लेकिन इसकी मात्रा बहुत अधिक नहीं है।
घरेलू ब्याज दर निर्धारण समिति द्वारा कुल 100 आधार अंकों की कटौती के बावजूद चालू वित्त वर्ष में बेंचमार्क 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड पर यील्ड में 14 आधार अंकों की वृद्धि हुई। लेकिन मार्च में शुद्ध निवेश करीब-करीब सपाट रहने से यह गति धीमी पड़ गई है। बाजार के जानकारों का कहना है कि इससे मौजूदा स्तरों पर विदेशी निवेशकों के बीच मजबूत विश्वास की कमी का संकेत मिलता है। मार्च में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध रूप से 742 करोड़ रुपये के घरेलू ऋण की खरीद की।
बाजार के एक प्रतिभागी ने कहा, मौजूदा महीने में हुई बिकवाली केवल भारत तक सीमित नहीं है। एफपीआई आमतौर पर एक ही समय में उभरते बाजारों में अपना निवेश कम करते हैं और पहले भारत के प्रमुख लाभार्थी रहने के बावजूद उस पर भी कुछ असर पड़ा है। आगे चलकर निकासी की रफ्तार धीमी हो सकती है। लेकिन निकट भविष्य में निवेश की आवक में तीव्र वृद्धि की संभावना कम ही दिखती है।
ब्लूमबर्ग बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने के कारण मिलने वाले अप्रत्यक्ष निवेश की संभावनाओं पर बाजार के जानकारों का कहना है कि उनकी उम्मीदें कम हो गई हैं। एक जानकार ने कहा, जून में इसकी संभावना कम है और पहले बताई गई स्थितियों को देखते हुए अगर कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होता है तो इस साल आवश्यकताओं को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
जनवरी में, ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज ने परिचालन और मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी मसलों के फिर से मूल्यांकन की जरूरतों का हवाला देते हुए भारतीय बॉन्डों को अपने वैश्विक समग्र सूचकांक में शामिल करना रोक दिया था। कंपनी ने कहा कि इस संबंध में 2026 के मध्य तक जानकारी दी जाएगी।
सितंबर 2023 में जब जेपी मॉर्गन ने घोषणा की थी कि भारतीय बॉन्डों को 28 जून, 2024 से चरणबद्ध तरीके से इंडेक्स में शामिल किया जाएगा और 31 मार्च, 2025 तक प्रति माह 1 फीसदी की दर से पूर्ण 10 फीसदी वेटेज मिल जाएगा। तब विश्लेषकों ने 20 अरब से 25 अरब डॉलर के पैसिव निवेश का अनुमान लगाया था और ऐक्टिव रीपोजीशन को भी शामिल कर लें तो तेजी के परिदृश्यों में यह निवेश 30 अरब डॉलर तक पहुंच जाना था।
अधिकांश निवेश सितंबर 2023 से जून 2024 के बीच वास्तविक रूप से शामिल किए जाने से पहले के महीनों में हुआ और शुद्ध निवेश करीब 92,302 करोड़ रुपये रहा। इससे निवेशकों द्वारा समय से पहले ही निवेश का संकेत मिलता है, जिन्होंने इस कदम का अनुमान लगाया था और समय से पहले ही अपने पोर्टफोलियो को समायोजित कर लिया था।