सरकारी कंपनी एनएलसी इंडिया फ्लाई ऐश से दुर्लभ खनिज तत्व निकालने के लिए देश की पहली परियोजना अगले दो महीनों में आवंटित करने की योजना बना रही है। परियोजना सफल रही तो भारत के दुर्लभ खनिज क्षेत्र में यह बड़ी तकनीकी कामयाबी होगी। फ्लाई ऐश लिग्नाइट यानी भूरे कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्र से निकलती है।
यह परियोजना भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) के सहयोग से तैयार की जा रही है। इसके तहत तमिलनाडु के नेयवेली में एनएलसी की परियोजना से निकलने वाली फ्लाई ऐश से दुर्लभ खनिज हासिल करने की कोशिश होगी। परियोजना सफल रही तो यह देश को दुर्लभ खनिजों का नया स्रोत मिल सकता है। यह खबर अहम इसलिए भी है क्योंकि भारत स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी, उन्नत विनिर्माण और स्वास्थ्य सेवा के लिए जरूरी महत्त्वपूर्ण सामग्री के लिए आयात पर निर्भरता कम करने के रास्ते तलाश रहा है।
एनएलसी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक प्रसन्न कुमार मोटुपल्ली ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से खास बातचीत में कहा, ‘परीक्षण परियोजना फिलहाल निविदा चरण में है और हमें दो महीने के भीतर निविदा आवंटित करने की उम्मीद है।’
फ्लाई ऐश में दुर्लभ पृथ्वी तत्व होने की बात पहले ही साबित हो चुकी है। यह परियोजना उन्हें निकालने की आधुनिक तकनीक दिखाने के लिए बार्क के सहयोग से स्थापित की जा रही है। मोटुपल्ली ने कहा, ‘नेयवेली में लिग्नाइट से बिजली के संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश में दुर्लभ पृथ्वी तत्व होने की बात नेयवेली ने साबित कर दी है। नेयवेली फ्लाई ऐश में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की मात्रा भी बहुत अधिक है और इस परियोजना में लोगों की बहुत दिलचस्पी हो गई है।’ परीक्षण परियोजना में लगभग 600 करोड़ रुपये लगने का कंपनी का अनुमान है। एनएलसी मानती है कि सफलता मिल गई तो इसे वाणिज्यिक स्तर पर लगाने के लिए 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करना होगा। मोटुपल्ली ने कहा, ‘परीक्षण परियोजना आवंटन के 8 से 9 महीनों के भीतर चालू हो जाएगी और परीक्षण स्तर पर उत्पादन साल भर के भीतर शुरू करने का लक्ष्य है।’
फ्लाई ऐश में बेहद कीमती दुर्लभ पृथ्वी तत्व ल्यूटीशियम का भी पता चला है, जिसका इस्तेमाल परमाणु चिकित्सा, कैंसर के उपचार, मेडिकल इमेजिंग और वैज्ञानिक अनुसंधान में किया जाता है। कंपनी ने कई अन्य दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की भी पहचान की है जिन्हें बहुत कम खर्च में हासिल किया जा सकता है। इनमें सेरियम, नियोडिमियम, लैंथेनम, समेरियम, गैडोलिनियम, प्रेजोडीमियम और यूरोपियम शामिल हैं।
एनएलसी ने जो दुर्लभ पृथ्वी तत्व पहचाने हैं, उनमें कई का महत्त्वपूर्ण औद्योगिक इस्तेमाल होता है और उभरती प्रौद्योगिकी में वे अहम भूमिका निभाते हैं। नियोडिमियम और प्रेजोडीमियम का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों और विंड टरबाइन में लगने वाले हाई-परफॉरमेंस मैग्नेट में होता है। यूरोपियम का उपयोग लाइटिंग और डिस्प्ले तकनीकों में किया जाता है। सेरियम और लैंथेनम का उत्प्रेरकों, बैटरियों और ऑप्टिक्स संबंधी कार्यों में जमकर इस्तेमाल होता है। समेरियम और गैडोलिनियम का उपयोग एरोस्पेस, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और चिकित्सा प्रौद्योगिकी में किया जाता है।
नई ऊर्जा अपनाने के लिए जरूरी संसाधन हासिल करने की होड़ दुनिया भर में बढ़ी है। ऐसे में देश के भीतर ही दुर्लभ खनिज प्राप्त करने और उनके आयात के लिए चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत पिछले कुछ वर्षों से प्रयास तेज कर चुका है। हालांकि ज्यादातर कोशिशें पारंपरिक खनन तथा विदेश में संपत्ति अधिग्रहण के इर्द-गिर्द रही हैं मगर एनएलसी-बार्क की यह परियोजना उद्योग से निकले कचरे और पदार्थों का इस्तेमाल करने के लिए है।
मोटुपल्ली ने कहा कि एनएलसी के नेयवेली संयंत्र के आसपास करीब 5 से 6 हजार टन फ्लाई ऐश तैयार होती है, जिसका इस्तेमाल दुर्लभ तत्त्व निकालने में किया जा सकता है। अगर परीक्षण परियोजना को वाणिज्यिक स्तर पर चलाने की संभावना नजर आई तो दुर्लभ खनिजों का नया स्रोत और फ्लाई ऐश खपाने का नया तरीका भी मिल सकता है।