अमेरिका-इजरायल के ईरान के साथ संघर्ष के बीच पश्चिम एशियाई देशों में काम कर रहे भारतीयों के समक्ष कई तरह की मुसीबतें खड़ी हो गई हैं। यदि वे वहां रुके रहते हैं तो युद्ध के साये में हैं और भारत आते हैं तथा यहां तय समय-सीमा से अधिक रुक जाते हैं तो कर संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। कर विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी परेशानी केवल पेशेवरों के समक्ष ही नहीं आएगी, कंपनियों को भी उसी उलझन से गुजरना पड़ेगा।
खाड़ी क्षेत्र में यात्रा में व्यवधान या सुरक्षा चिंताओं के कारण पेशेवर और उद्यमी अपेक्षा से अधिक समय तक भारत में ठहरने को मजबूर हो सकते हैं। ऐसे में उनकी कर निवास (टैक्स रेजिडेंसी) की स्थिति बदल सकती है, जिससे उनकी कर देनदारियां सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती हैं। आयकर अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति की आवासीय स्थिति (रेजिडेंशियल स्टेटस) मुख्यतः इस बात पर निर्भर करती है कि वह किसी वित्त वर्ष में भारत में कितने दिन रहा है।
सामान्य तौर पर यदि कोई व्यक्ति एक वित्त वर्ष के दौरान 182 दिन या उससे अधिक भारत में रहता है, तो ऐसे में यह माना जाएगा कि वह यहीं रहता है। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति संबंधित वित्त वर्ष में 60 दिन या उससे अधिक और पिछले चार वित्त वर्षों में कुल मिलाकर 365 दिन या उससे अधिक भारत में रहा है, तो भी वह यहां का निवासी माना जा सकता है। लेकिन कर विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारत आने वाले भारतीय या भारतीय मूल के लोगों के मामले में रेजिडेंशियल स्टेटस के लिए 60 की सीमा 182 दिनों में बदल जाती है और यदि उनकी आय भारत में 15 लाख रुपये को पार कर जाती है तो यह अवधि 120 दिन हो जाती है।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि केवल निवासी बन जाने से यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति की वैश्विक आय पर स्वतः कर लग जाएगा। कर कानून के तहत व्यक्ति को आगे रेजिडेंट ऐंड ऑर्डिनरिली रेजिडेंट (आरओआर) तथा रेजिडेंट बट नॉट ऑर्डिनरिली रेजिडेंट (आरएनओआर) में वर्गीकृत किया जाता है। यह वर्गीकरण पिछले वर्षों में भारत में उनकी उपस्थिति के अनुसार किया जाता है।
अब जो व्यक्ति आरओआर की श्रेणी में आ जाते हैं, उन्हें अपनी वैश्विक आय पर भारत में कर देना होगा। यही नहीं, उन्हें आयकर रिटर्न में अपनी विदेशी संपत्तियों का खुलासा भी करना होगा। इसके विपरीत आरएनओआर श्रेणी में आने वाले लोगों पर सामान्यत: केवल भारत में अर्जित आय तथा भारत से नियंत्रित व्यवसाय या पेशे से प्राप्त विदेशी आमदनी पर ही कर लगाया जाता है। ग्रांट थॉर्नटन भारत में पार्टनर ऋचा साहनी ने कहा कि ईरान संकट के कारण भारत वापस आने वाले लोगों को अपनी रेजिडेंशियल स्टेटस का बहुत ही सावधानी से पुनर्मूल्यांकन करना होगा।
उन्होंने कहा, ‘ऐसे व्यक्तियों को यह जरूर देखना होगा कि वे वित्त वर्ष 2025–26 में ही नहीं, इससे पिछले वर्षों में कितने दिन भारत में रहे। सबसे अधिक प्रभाव तब पड़ेगा जब उनकी स्थिति आरओआर में बदल जाती है, क्योंकि ऐसे मामलों में वैश्विक आय भी भारत में कर योग्य मानी जाएगी।’ उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई कर संधि लाभ उपलब्ध है, तो उसे अलग से देखना होगा, लेकिन यह पूरी तरह तथ्यों पर निर्भर करेगा। इसलिए बेहद सावधानी से अपनी स्थिति का आकलन करें।
कर विशेषज्ञ कहते हैं कि मामला केवल पेशेवरों से ही जुड़ा नहीं है, यदि विदेशी कंपनियों के कर्मचारी लंबे समय तक भारत से काम करते रहते हैं, तो इससे उन कंपनियों के लिए भी कर संबंधी जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।
साहनी ने कहा कि जो लोग भारत में रहकर विदेशी कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं, वे संबंधित कर संधियों में निर्धारित अवधि की सीमा पार करने पर अपने नियोक्ता के समक्ष सर्विस परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट (सर्विस पीई) का जोखिम पैदा कर सकते हैं। सर्विस पीई उस स्थिति में उत्पन्न होता है जब कोई विदेशी कंपनी किसी मेजबान देश में अपने पेशेवरों के माध्यम से निश्चित, लंबी अवधि तक सेवाएं प्रदान करती हैं। इससे संबंधित देश को उस कंपनी पर कर लगाने का अधिकार मिल जाता है।