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3 साल में सिर्फ 3% पुराने वाहन हुए स्क्रैप, करोड़ों कबाड़ गाड़ियां अब भी सड़कों पर दौड़ रहीं

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नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में देश के 1.2 करोड़ पुराने वाहनों में से 3% से भी कम वाहनों को अधिकृत स्क्रैपिंग केंद्रों पर कबाड़ में बदला जा सका।

Last Updated- June 16, 2026 | 7:42 AM IST
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देश की सड़कों पर अपना जीवन पूरा कर चुके पुराने वाहनों (ईएलवी) में से 3 प्रतिशत से भी कम वाहनों को अगस्त 2022 से जुलाई 2025 के दौरान अधिकृत चैनलों के माध्यम से कबाड़ में बदला गया। वित्तीय प्रोत्साहनों की कमी, वाहन मालिकों में जागरूकता के अभाव, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और कमजोर क्रियान्वयन की वजह से ऐसा हुआ। नीति आयोग की एक रिपोर्ट से यह जानकारी मिली है।

देश की सड़कों पर लगभग 1.2 करोड़ ऐसे पुराने वाहन हैं, जिनका समय पूरा हो चुका है। लेकिन तीन साल की इस अवधि के दौरान वाहनों को कबाड़ में तब्दील करने वाली पंजीकृत इकाइयों (आरवीएसएफ) के माध्यम से केवल 3,50,000 वाहनों को ही कबाड़ में बदला गया। पिछले सप्ताह ऑटो कंपनियों और वाहन स्क्रैप केंद्रों की बैठक में दी गई प्रस्तुति में यह जानकारी सामने आई।

नीति आयोग ने पाया है कि भारत का वाहन स्क्रैप तंत्र इस समय दो तरीकों से संचालित होता है। जहां सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की कबाड़ नीति पुराने वाहनों की पहचान और उन्हें सड़कों से हटाने पर केंद्रित होती है, वहीं पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के ईएलवी नियम, 2025 व्यापक उत्पादक जिम्मेदारी (ईपीआर) तंत्र के माध्यम से वाहन विनिर्माताओं पर रीसाइकलिंग की जिम्मेदारी डालते हैं।

नीति आयोग ने कहा कि सड़क परिवहन मंत्रालय का वाहन डेटाबेस और पर्यावरण मंत्रालय का ईपीआर पोर्टल एक-दूसरे से जुड़ा नहीं है। इस कारण वाहनों का पंजीकरण रद्द होने से लेकर अंतिम कबाड़ तक के शुरू से आखिर तक के सफर का पता लगाना मुश्किल हो गया है। नीति आयोग ने टिप्पणी के बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुरोध का जवाब नहीं दिया।

ईपीआर व्यवस्था के तहत वाहन विनिर्माताओं के लिए हर साल पुराने वाहनों से न्यूनतम मात्रा में स्टील को रीसाइकल करना जरूरी होता है। आरवीएसएफ को कबाड़ में तब्दील वाहनों से प्राप्त स्टील की मात्रा के आधार पर ईपीआर प्रमाणपत्र प्राप्त होते हैं और वाहन विनिर्माता अपनी रीसाइकलिंग जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए ये प्रमाणपत्र खरीद सकते हैं।

ईपीआर नियमों के तहत वित्त वर्ष 2026-30 के बीच न्यूनतम 8 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है और वित्त वर्ष 2036 से इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया जाएगा।

इस प्रस्तुति में नीति आयोग ने भारत में वाहन कबाड़ के सामने आने वाली कई अन्य चुनौतियों की पहचान की। इनमें कमजोर निगरानी ढांचा भी शामिल है, जैसे अपर्याप्त डैशबोर्ड, जियो-टैगिंग का अभाव और जांच का सीमित तंत्र, जो शुरू से आखिर तक पता लगाने की क्षमता और अनुपालन की निगरानी में बाधा डालता है। नीति आयोग ने कहा कि आरवीएसएफ, स्वचालित परीक्षण स्टेशनों (एटीएस) और श्रेडिंग इकाइयों की कमी है और अधिकांश मौजूदा बुनियादी ढांचा बड़े शहरों में केंद्रित है। उसने यह भी पाया कि वाहनों के रीसाइलिंग क्षेत्र में अनौपचारिक बाजार हावी है। उसने सिफारिश की है कि प्रशिक्षण, लाइसेंसिंग और एकत्रीकरण तंत्र के जरिये अनौपचारिक कारोबारियों को औपचारिक तंत्र में शामिल किया जाए।

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First Published - June 16, 2026 | 7:42 AM IST

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