विश्व बैंक समूह से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) ने भारत में निवेश के लिए कई नए क्षेत्र टटोले हैं। खास कर उन क्षेत्रों पर इसकी नजर टिकी है जहां कार्बन उत्सर्जन कम करना काफी पेचीदा रहा है। पिछले वित्त वर्ष भारत में 5.4 अरब डॉलर निवेश करने वाला आईएफसी हरित हाइड्रोजन, रसायन और भारी परिवहन पर ध्यान केंद्रित करेगा। इसके क्षेत्रीय प्रभाग के निदेशक इमाद एन फखूरी से सुधीर पाल सिंह ने बात की। वीडियो साक्षात्कार के प्रमुख अंश:
भारत में हरित हाइड्रोजन में आईएफसी का यह पहला निवेश है। नीतिगत महत्त्वाकांक्षाओं, बेहतर अर्थव्यवस्था और निजी क्षेत्र के उभरने के साथ भारत का हरित हाइड्रोजन क्षेत्र एक अहम मोड़ पर है। यही वह निर्णायक क्षण था जब हमने कदम रखा और हाइजेनको का चयन किया। यह एक सुनियोजित कदम है क्योंकि अब हम देख रहे हैं कि यहां बाजार विस्तार के लिए पूरी तरह तैयार है। हरित हाइड्रोजन एक नया क्षेत्र है जिसमें निजी क्षेत्र के लिए कई जोखिम मौजूद हैं। भारत सरकार के साथ साझेदारी में विश्व बैंक समूह की व्यापक पहल के तहत यह मुहिम कई साल पहले विश्लेषणात्मक कार्य, नीतिगत ढांचों को समर्थन देने और फिर वित्त पोषण की दिशा में आगे बढ़ने के साथ शुरू हुई थी। हमारा उद्देश्य हरित हाइड्रोजन तंत्र को बुनियादी तौर पर समर्थन देना है।
रसायन और भारी परिवहन जैसे क्षेत्रों में मांग प्रायोगिक परियोजना से आगे बढ़कर व्यावसायिक स्तर पर पहुंच गई है। हम हाइड्रोजन को एक सेवा ढांचे के रूप में भी देख रहे हैं जो हाइजेनको के इस प्लेटफॉर्म की खासियत है। भारत में नीतिगत माहौल भी परिपक्व हो चुका है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के साथ हाइड्रोजन उत्पादन और इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण के लिए स्पष्ट प्रोत्साहनों द्वारा समर्थित एक स्पष्ट दीर्घकालिक योजना मौजूद है। इसके अलावा, अर्थव्यवस्था में भी सुधार हो रहा है क्योंकि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा की लागत दुनिया में सबसे कम है। साथ ही, इलेक्ट्रोलाइजर की लागत भी कम हो रही है और हरित प्रौद्योगिकी के प्रदर्शन में भी सुधार हो रहा है। हरित हाइड्रोजन सौर ऊर्जा की तरह ही आगे बढ़ता जा रहा है। हाइजेनको एक विश्वसनीय उभरता हुआ प्लेटफॉर्म है जिसमें विस्तार की क्षमता है।
इसका प्रमाण तो हमारे मौजूदा क्रियान्वयन में ही मिलेगा। इसे समझने का एक तरीका यह है कि यह प्लेटफॉर्म किस प्रकार इसे खास बनाता है। हमारा मानना है कि प्लेटफॉर्म का चयन ही वह कारण है जिसके दम पर हमने जान बूझकर इस प्रारूप (मॉडल) के माध्यम से कदम रखा है। यह प्लेटफॉर्म न केवल व्यावसायिक विश्वसनीयता प्रदान करता है बल्कि बाजार की रफ्तार बदलने में भी सहायक है। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए हरित हाइड्रोजन को अपनाने में आने वाली बाधाओं को कम करता है और इसके विस्तार और विकास को संभव बनाता है। एक सेवा के रूप में हाइड्रोजन मॉडल वास्तव में बाजार की बाधा को दूर कर रहा है क्योंकि ग्राहकों को परिचालन संबंधी बोझ की चिंता नहीं होती। यह विस्तार के लिए भी अहम है, साथ ही मूल्य श्रृंखला में स्थायी रोजगार सृजन करता है। भारत में हरित हाइड्रोजन बाजार के विकास के मामले में हम अभी शुरुआती चरण में हैं।
भारत अपने नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों, औद्योगिक मांग और विनिर्माण क्षेत्र में ऊंची महत्त्वाकांक्षाओं के कारण स्वच्छ हाइड्रोजन के सबसे प्रतिस्पर्द्धी बाजारों में से एक बन सकता है। यह बात हरित हाइड्रोजन को वास्तव में बाजार में अपनी पकड़ बनाने में सक्षम बनाएगी। यह काफी हद तक भारत में सौर और पवन ऊर्जा के बाजार के विकास के समान है। आगे चलकर मांग बनाए रखने के लिए सही नीतिगत संकेतों का निरंतर इस्तेमाल करना होगा। हम प्रतिस्पर्द्धात्मकता में निरंतर सुधार का लाभ उठाएंगे और इलेक्ट्रोलाइजर की लागत में कमी देखेंगे। हम बड़े पैमाने पर पूंजी का अधिक से अधिक इस्तेमाल होता देखेंगे। हमें भंडारण से लेकर परिवहन, बंदरगाहों और प्रमाणन प्रणालियों आदि तक सहायक बुनियादी ढांचे के विकास पर भी नजर रखनी होगी। हमारा मानना है कि हमें उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां हाइड्रोजन का इस्तेमाल फिलहाल हो रहा है। इनमें रसायन, भारी परिवहन आदि शामिल हैं। फिर लागत घटने के साथ हम धीरे-धीरे हरित इस्पात, जहाजरानी और टिकाऊ विमानन ईंधन तक दायरा बढ़ाएंगे।
इस संकट ने ऊर्जा सुरक्षा के महत्त्व को उजागर किया है और यह दिखाया है कि ऊर्जा आयात देशों को कितना असुरक्षित बना देता है। आयातित एलएनजी से निर्मित हाइड्रोजन को विस्थापित कर आयात पर निर्भरता कम होगी क्योंकि इससे मूल्य श्रृंखला का स्थानीयकरण होगा। मूल्य श्रृंखलाओं और आपूर्ति श्रृंखलाओं का स्थानीयकरण और उनकी मजबूती एक अहम आर्थिक कारक बनता जा रहा है। भारत में हरित हाइड्रोजन क्षेत्र में जो प्रगति हो रही है वह अपनी ही खूबियों के दम पर हो रही है। हमने पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में कदम नहीं रखा है।
हमें नीति और अवसंरचना के क्षेत्र में निरंतर काम करने की जरूरत है। इस समय हम रसायनों और भारी परिवहन से शुरू कर विभिन्न क्षेत्रों को कार्बन मुक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हम धीरे-धीरे हरित इस्पात, जहाजरानी, टिकाऊ विमान ईंधन आदि की ओर बढ़ेंगे।
मुझे लगता है कि यह एक व्यापक विषय है। आईएफसी ऐसा प्रदर्शन ढांचा स्थापित करने का प्रयास कर रहा है जो वास्तव में यह सफलतापूर्वक दर्शाते हैं कि भारत किस तरह निवेश अपनी तरफ खींच रहा है। आईएफसी ने वर्ष 2021-22 में प्रति वर्ष 1.3 अरब डॉलर के नए निवेश से आगे बढ़ते हुए पिछले वित्त वर्ष में 5.4 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया है। यह सही दिशा में हो रहा है और यही कारण है कि हम भारत को लेकर बहुत आशावादी हैं और यहां अपने निवेश का विस्तार और वृद्धि जारी रखे हुए हैं।
मुझे लगता है कि सब कुछ समय के हिसाब से हो रहा है। भारत दुनिया के कई अन्य देशों की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाइड्रोजन की मांग, कार्बन बाजार में देरी और ऐसे ही कई मुद्दों के अनुरूप स्वयं को ढाल रहा है। आश्चर्यजनक बात यह है कि भारत इतना बड़ा है कि वह अपने घरेलू बाजार के लिए ऐसे कदम उठा सकता है जो आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्द्धी साबित हो रहे हैं। मुझे लगता है कि बाजार धीरे-धीरे विकसित हो रहा है और वैश्विक वास्तविकताओं के अनुकूल ढल रहा है। अच्छी बात यह है कि यहां एक स्पष्ट महत्त्वाकांक्षी योजना, भविष्य की कार्य योजना, प्रोत्साहन और औद्योगिक नीति मौजूद हैं। विश्व बैंक समूह के रूप में हम इस पर विचार-विमर्श से जुड़े रहे हैं और अब हम क्रियान्वयन की ओर बढ़ रहे हैं। हम ऐसे प्लेटफॉर्म की पहचान करना शुरू कर रहे हैं जिन्हें दोहराया और बढ़ाया जा सके।