RBI MPC Meet, April 2026: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपनी अगली मौद्रिक नीति 9 अप्रैल को घोषित करेगा। मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की हर बैठक पर नजर होती है लेकिन इस बार इस पर विशेष रूप से नजर होगी क्योंकि पश्चिम एशिया में संघर्ष चल रहा है। भले ही एमपीसी ब्याज दर में कोई बदलाव न करे, लेकिन उसकी घोषणा वित्तीय बाजारों में शांति लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, खासतौर पर जब अनिश्चितता अधिक है। बाजार भी स्पष्ट दिशानिर्देशों के आने का इंतजार करेगा कि आखिर एमपीसी इस अनिश्चितता को कैसे देख रहा है और भविष्य की मौद्रिक नीति के लिए इसके क्या मायने हैं।
महंगाई को लक्षित करने वाली अर्थव्यवस्थाओं जैसे कि भारत में मौद्रिक नीति का एक महत्त्वपूर्ण साधन संचार या सूचना होती है। वित्तीय बाजार एमपीसी के बयानों और आरबीआई गवर्नर की टिप्पणियों को भविष्य में ब्याज दरों के मार्गदर्शन के संकेत के रूप में देखते हैं। जब केंद्रीय बैंक की सूचना जटिल या अस्पष्ट होती है तब बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है (सेनगुप्ता और माथुर, 2019)। यह स्थिति तब और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है जब अनिश्चितता का दौर हो क्योंकि निवेशक और कंपनियां अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर स्पष्ट उम्मीदें नहीं रख पाती हैं। अगले दिनों में होने वाली एमपीसी बैठक के निर्णय की पृष्ठभूमि में दो मुख्य अनिश्चितताएं होंगी।
पहली अनिश्चितता पश्चिम एशिया में युद्ध से संबंधित है। हाल तक, भारत की वृहद अर्थव्यवस्था की स्थिति स्थिर नजर आ रही थी क्योंकि मजबूत वृद्धि के साथ ही महंगाई मध्यम स्तर की थी। लेकिन अब यह स्थिरता खत्म हो गई है। युद्ध ने प्रमुख वस्तुओं जैसे कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की आपूर्ति बाधित की है। भारत लगभग 90 फीसदी कच्चा तेल, आधी प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की एक-चौथाई से एक-तिहाई मात्रा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो घरेलू ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है जो बाद में खाद्य कीमतों और समग्र महंगाई को प्रभावित कर सकती है।
महंगाई इन झटकों से पहले ही बढ़ रही थी। फरवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई 3.2 फीसदी तक पहुंच गई, जो नौ महीने का उच्चतम स्तर था। हालांकि यह अब भी आरबीआई के 4 फीसदी के लक्ष्य से कम है लेकिन सुगमता की सीमा पहले की तुलना में कम हो गई है, खासतौर पर जून 2025 से जनवरी 2026 की तुलना में, जब महंगाई औसतन लगभग 1.5 फीसदी रही थी।
वहीं दूसरी ओर, वैश्विक व्यापार मार्गों में रुकावटों से भारत के निर्यात और उत्पादन को भी नुकसान हो सकता है क्योंकि भारत के कुल निर्यात में पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी लगभग 15 फीसदी है। अधिक ऊर्जा लागत उत्पादन और वृद्धि को और कमजोर कर सकती है। आपूर्ति में कमी से अक्सर मांग में भी कमी आती है। सरकार ने देसी गैस उत्पादकों से गैस आपूर्ति में घरेलू उपयोगकर्ताओं को तरजीह देने के लिए कहा है, जिससे प्लास्टिक, रसायन, उर्वरक और एल्युमीनियम जैसे उद्योगों के लिए गैस की उपलब्धता कम हो सकती है। रेस्तरां और अन्य सेवा क्षेत्र जो गैस पर निर्भर हैं, उन्हें अधिक लागत और कम बिक्री का सामना करना पड़ सकता है। उधर, विमान ईंधन की बढ़ती कीमतें, हवाई यात्रा के किराये को बढ़ा रही हैं, जिससे यात्रा और पर्यटन की मांग पर असर पड़ सकता है।
यह स्थिति एमपीसी के लिए एक नीतिगत दुविधा पैदा करती है। क्या उसे महंगाई को नियंत्रित करने को प्राथमिकता देनी चाहिए और सख्त नीति अपनानी चाहिए या फिर बढ़ती अनिश्चितता के बीच वृद्धि को सहारा देना चाहिए? समिति को यह भी स्पष्ट करना होगा कि हाल में बना महंगाई का दबाव अस्थायी है या यह दूसरे चरण का प्रभाव हो सकता है जिसके लिए नीतिगत कदम की आवश्यकता हो सकती है। बाजार यह देखेंगे कि एमपीसी इन जोखिमों को किस तरह से संतुलित करता है क्योंकि इसके बिना सूचना में अस्पष्टता बनी रहती है, जिससे नीति की दिशा को लेकर भी अनिश्चितता बनी रहती है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भले ही आरबीआई ने 2025 में वृद्धि को सहारा देने के लिए रीपो दर में कुल 125 आधार अंक की कटौती की, लेकिन लंबी अवधि के बॉन्ड यील्ड में गिरावट नहीं आई। 10 साल की सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड बढ़कर लगभग 7 फीसदी तक पहुंच गई है जो उस स्तर के करीब है जहां यह दर कटौती शुरू होने से पहले थी। सामान्य तौर पर जब नीतिगत दरें घटती हैं तब बॉन्ड यील्ड भी कम हो जाती हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ जो यह दिखाता है कि वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ रही है। ऐसे समय में अगर एमपीसी व्यापक अर्थव्यवस्था से जुड़े जोखिमों का स्पष्ट आकलन सामने रखे तब इससे बाजार की उम्मीदें स्थिर हो सकती हैं और इस अस्थिर दौर में यील्ड को और बढ़ने से रोका जा सकता है।
दूसरी बड़ी अनिश्चितता फरवरी में पेश किया गया नया उपभोक्ता मूल्य सूचकांक है। इस संशोधन में न केवल विभिन्न वस्तुओं के भार में बदलाव किया गया है बल्कि खपत का दायरा भी बढ़ाकर 299 से 358 वस्तुओं तक कर दिया गया है। इसमें खाद्य पदार्थों का हिस्सा काफी घटकर लगभग 46 फीसदी से 37 फीसदी रह गया है।
खाद्य श्रेणी के भीतर भी बदलाव हुए हैं और अनाज जैसी ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली वस्तुओं की हिस्सेदारी कम हुई है जबकि प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों का महत्त्व बढ़ा है जो अपेक्षाकृत स्थिर रहते हैं। खाद्य पदार्थों का कम भार होने से समग्र महंगाई पर अस्थायी झटकों, जैसे मॉनसून के असर का प्रभाव कम हो सकता है। अगर महंगाई में उतार-चढ़ाव कम होता है तब मौद्रिक नीति भी अधिक स्थिर और अनुमान लगाने योग्य बन सकती है।
हालांकि, इसके प्रभाव खुद ब खुद स्पष्ट नहीं होंगे। बाजार यह समझना चाहेंगे कि एमपीसी इस नए सूचकांक को कैसे देखती है। क्या भार में बदलाव से महंगाई के आकलन का तरीका बदलेगा? क्या खाद्य कीमतों के झटकों का असर अब नीति निर्णयों में कम होगा? क्या मुख्य महंगाई (यानी खाद्य एवं ईंधन को छोड़कर) में बदलाव आएगा? इन सभी सवालों पर स्पष्ट जानकारी देना जरूरी होगा ताकि नई सीपीआई के आधार पर बाजार की अपेक्षाएं स्थिर रह सकें।
जब एमपीसी 9 अप्रैल के अपने बयान की तैयारी कर रही है तब केवल नीतिगत निर्णय ही नहीं बल्कि उसकी स्पष्ट और सटीक सूचना भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होगी। कम से कम चौंकाने वाले फैसले और स्पष्ट संकेत ही यह सुनिश्चित करेंगे कि आने वाले अस्थिर महीनों में मौद्रिक नीति प्रभावी बनी रहे।
(लेखिका आईजीआईडीआर मुंबई में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)