अप्रैल में ट्रेडिंग गतिविधियों में बड़ा अंतर देखने को मिला। नकदी बाजार का टर्नओवर 7 फीसदी बढ़ा और इसे इक्विटी में आई ज़ोरदार तेजी का सहारा मिला। दूसरी ओर सिक्योरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) में बढ़ोतरी के कारण डेरिवेटिव के टर्नओवर में 6 फीसदी की गिरावट आई।
1 अप्रैल से वायदा कारोबार पर एसटीटी 0.02 फीसदी से बढ़ाकर 0.05 फीसदी कर दिया गया जबकि ऑप्शंस के लिए यह 0.1 फीसदी से बढ़कर 0.15 फीसदी हो गया।
इक्विटी में बड़े पैमाने पर आई तेजी के कारण नकदी सेगमेंट का रोज का औसत टर्नओवर (एडीटीवी) इस महीने बढ़कर करीब दो साल के उच्चतम स्तर 1.44 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। बेंचमार्क सूचकांकों ने एक साल से भी ज्यादा समय में अपनी सबसे मजबूत मासिक रिकवरी दर्ज की। इस दौरान सेंसेक्स में 6.9 फीसदी जबकि निफ्टी में 7.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यह दिसंबर 2023 के बाद से उनका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। यह मार्च की भारी गिरावट के बाद हुआ है, जब सूचकांक 11 फीसदी से भी ज्यादा गिर गए थे, जो मार्च 2020 में महामारी के कारण हुई बिकवाली के बाद उनमें सबसे बड़ी गिरावट थी।
व्यापक बाजारों में यह तेजी और भी ज्यादा स्पष्ट दिखाई दी। निफ्टी मिडकैप 100 में 13.6 फीसदी की बढ़त हुई, जो नवंबर 2020 के बाद का इसका सबसे अच्छा प्रदर्शन है। निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 18.4 फीसदी की जबरदस्त उछाल आई। यह मई 2014 के बाद का उसका सबसे ऊंचा स्तर है।
जियोजित फाइनैंशियल सर्विसेज के कार्यकारी निदेशक सतीश मेनन ने कहा, कैश सेगमेंट में निवेशकों का आधार ज्यादातर बदलता रहता है जबकि डेरिवेटिव ट्रेडिंग ज्यादातर अनुभवी निवेशकों का क्षेत्र है। नकदी कारोबार में बढ़ोतरी का मुख्य कारण बाजार का बेहतर प्रदर्शन है। मार्च में आई गिरावट के बाद अप्रैल में बेंचमार्क और व्यापक बाजार दोनों तरह के सूचकांकों ने कई महीनों में अपनी सबसे अच्छी बढ़त दर्ज की। इन बढ़त के कारण ही शायद ज्यादा निवेशक नकदी बाजारों में फिर से आने के लिए आकर्षित हुए ताकि वे नए दांव लगा सकें या अपना नुकसान कम कर सकें।
इस सेगमेंट में रोजाना का औसत टर्नओवर (एडीटीवी) 486 लाख करोड़ रुपये रहा जो जनवरी के 592 लाख करोड़ रुपये के स्तर के मुकाबले करीब 18 फीसदी कम है। ब्रोकरों ने डेरिवेटिव कारोबार में गिरावट की वजह ज्यादा उतार-चढ़ाव, कर में बदलाव और सख्त नियमों को बताया।
सोअरिंग पीक्स कैपिटल के संस्थापक प्रकाश गगडानी ने कहा, यह डेरिवेटिव में एसटीटी बढ़ने का असर है। इस बढ़ोतरी का असर एल्गो ट्रेडरों पर ज्यादा पड़ेगा। आरबीआई के कैपिटल एक्सपोजर नियमों को भले ही तीन महीने के लिए टाल दिया गया हो, लेकिन डेरिवेटिव ट्रेडिंग में इसे महसूस किया जा रहा है। पहले ब्रोकर बैंक गारंटी लेते थे और प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग में ट्रेडरों को सुविधा देते थे। लेकिन अब उनके पास वितरण के लिए उपलब्ध राशि कम हो जाएगी और लागत बढ़ जाएगी। ट्रेडरों के लिए भी नकदी घट जाएगी।
डेरिवेटिव वॉल्यूम में नरमी के बावजूद बीएसई ने इस सेगमेंट में अपनी बाजार हिस्सेदारी में बढ़ोतरी जारी रखी। इस महीने के दौरान एक्सचेंज का नोशनल मार्केट शेयर पहली बार 50 फीसदी के आंकड़े को पार कर गया। नोशनल आधार पर डेरिवेटिव में बीएसई का रोजाना का औसत टर्नओवर (एडीटीवी) 269 लाख करोड़ रुपये रहा जबकि नैशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ़ इंडिया (एनएसई) के मामले में यह आंकड़ा 217 लाख करोड़ रुपये था। प्रीमियम टर्नओवर के मामले में बीएसई की बाजार हिस्सेदारी करीब 31 फीसदी रही।
गगडानी ने कहा, ट्रेडरों के लिए अंतर्निहित स्तर पर कुछ भी हो सकता है, उन्हें बस उतार-चढ़ाव, मजबूती और वॉल्यूम चाहिए। यह बात सिर्फ बीएसई की नहीं है, एमसीएक्स का भी टर्नओवर बढ़ रहा है। साप्ताहिक एक्सपायरी की फ्रीक्वेंसी कम हो गई है और अब लोगों के पास ट्रेड करने के कम मौके हैं। यही वजह है कि वॉल्यूम बीएसई की तरफ जा रहा है।
निवेशकों की भागीदारी में कमी एक्सचेंज के आंकड़ों में भी साफ दिखती है। वित्त वर्ष 26 में एनएसई के ऐक्टिव क्लाइंट आधार में 35 लाख की कमी आई और यह घटकर 4.52 करोड़ रह गया। यह इस बात का संकेत है कि छोटे कारोबारियों ने बाजार से दूरी बना ली है, जो हाल के वर्षों में डेरिवेटिव वॉल्यूम को मुख्य रूप से योगदान दे रहे थे। इसके अलावा, बाजार नियामक ने डेरिवेटिव ट्रेडिंग के नियमों को सख्त किया जिससे भी डेरिवेटिव सौदों की संख्या में भारी गिरावट आई है। इन नियमों में साप्ताहिक एक्सपायरी को केवल दो दिन सीमित करना भी शामिल है।