पश्चिम एशिया संकट के बाद पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को लेकर लोगों की सोच बदलनी शुरू कर दी है। अब ग्राहक सिर्फ गाड़ी की शुरुआती कीमत नहीं, बल्कि उसके पूरे खर्च यानी “टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप” पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
मई महीने में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। इसकी वजह पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही में आई दिक्कतें हैं, जिससे कच्चे तेल के दाम बढ़ गए।
ऑटो इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि अब EV खरीदने की वजह सिर्फ पर्यावरण, नई टेक्नोलॉजी या सरकारी सब्सिडी नहीं रह गई है। खासकर शहरों में रोज ज्यादा दूरी तय करने वाले ग्राहक अब हर महीने का ईंधन खर्च, पांच साल का कुल खर्च और रीसेल वैल्यू जैसी चीजों की तुलना कर रहे हैं।
इस बदलाव का असर बिक्री के आंकड़ों में भी दिख रहा है। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (Fada) के मुताबिक, 2025-26 में कुल पैसेंजर व्हीकल बिक्री में EV की हिस्सेदारी बढ़कर 4.25 प्रतिशत हो गई, जो पिछले साल 2.61 प्रतिशत थी। अप्रैल 2026 में यह हिस्सेदारी और बढ़कर 5.77 प्रतिशत पहुंच गई।
Fada ने यह भी कहा कि बढ़ती ईंधन कीमतें ग्राहकों के फैसलों को प्रभावित कर रही हैं। मार्च 2026 के सर्वे में 36.5 प्रतिशत डीलरों ने माना कि पेट्रोल-डीजल के महंगे होने से ग्राहक CNG और EV की तरफ ज्यादा झुक रहे हैं।
इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि 11-12 लाख रुपये की कारों में EV की शुरुआती कीमत पेट्रोल या CNG कारों से थोड़ी ज्यादा है, लेकिन लंबे समय में चलाने का खर्च काफी कम पड़ता है।
हालांकि EV अपनाने में अभी भी कुछ दिक्कतें हैं। जाटो डायनेमिक्स के रवि भाटिया के मुताबिक, भारत के मिड-सेगमेंट बाजार में EV मॉडल अभी कम हैं। साथ ही चार्जिंग की परेशानी, असली ड्राइविंग रेंज और रीसेल वैल्यू को लेकर लोगों में चिंता बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि फिलहाल EV शहरों में दूसरी कार के रूप में ज्यादा पसंद की जा रही हैं, खासकर उन परिवारों में जहां घर पर चार्जिंग की सुविधा है।
प्राइमस पार्टनर्स के अनुराग सिंह का कहना है कि EV की तरफ बदलाव सिर्फ पश्चिम एशिया संकट की वजह से नहीं हो रहा। बैटरी की लागत कम होना, सरकारी नीतियां और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का बढ़ना भी बड़ी वजहें हैं। लेकिन अगर ईंधन कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो EV की मांग और तेज हो सकती है।
वहीं सेकेंड हैंड EV बाजार में ग्राहकों की चिंता अभी भी बनी हुई है। लोग बैटरी लाइफ, चार्जिंग और रीसेल वैल्यू को लेकर सतर्क हैं।
यूज्ड कार प्लेटफॉर्म स्पिन्नी के सीईओ नीरज सिंह के मुताबिक, शुरुआती EV मॉडल्स की रीसेल वैल्यू कम थी, लेकिन अब धीरे-धीरे स्थिति सुधर रही है। चार्जिंग नेटवर्क बढ़ने और कंपनियों के सपोर्ट से ग्राहकों का भरोसा बढ़ रहा है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी की वजह से पुराने EV मॉडल्स की कीमत तेजी से गिर सकती है।
फिलहाल लागत के हिसाब से CNG कारें अभी भी EV का सबसे मजबूत विकल्प बनी हुई हैं। अप्रैल 2026 में पैसेंजर व्हीकल बाजार में CNG की हिस्सेदारी 22.62 प्रतिशत रही, जबकि पेट्रोल की 45.95 प्रतिशत और डीजल की 17.39 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो ग्राहक अब सिर्फ गाड़ी की कीमत नहीं, बल्कि हर महीने का खर्च, चार्जिंग सुविधा, रीसेल वैल्यू और इस्तेमाल के तरीके को देखकर फैसला लेंगे।