गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए स्व-नियामकीय संगठन (एसआरओ) फाइनैंस इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल (एफआईडीसी) ने भारतीय रिजर्व बैंक से आग्रह किया है कि छोटे ऋण के लिए प्रमाणित रिकवरी एजेंटों की अनिवार्यता को खत्म किया जाए। उसका कहना है कि ऐसे पेशेवर सीमित संख्या में उपलब्ध हैं, खास तौर पर छोटे शहरों -कस्बों में जहां ऐसे ऋण की अधिक मांग होती है।
पिछले महीने ऋण वसूली एजेंटों पर जारी मसौदा नियमों में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने प्रस्ताव रखा था कि ऋण वसूली एजेंट बनने के लिए पेशेवरों को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग ऐंड फाइनैंस (आईआईबीएफ) से या आईआईबीएफ के साथ करार वाले किसी अन्य संस्थान से प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरा करने के बाद प्रमाण पत्र हासिल करना चाहिए।
एफआईडीसी ने मसौदा प्रस्तावों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, ‘आईआईबीएफ से प्रमाणित कर्मियों और प्रशिक्षण बुनियादी ढांचे की उपलब्धता सीमित है। ऐसा खास तौर पर टियर-3, टियर-4 तथा टियर-5 शहरों और कस्बों में देखा जा सकता है जहां ऐसे ऋण की गतिविधियां अधिक होती हैं।’ एसआरओ ने कहा कि छोटे और लघु अवधि के ऋण सीमित मार्जिन मॉडल पर काम करते हैं। ऐसे में आईआईबीएफ से प्रमाणित रिकवरी एजेंटों को नियुक्त करने की अनिवार्यता वास्तव में परिचालन व्यवहार्यता के लिए अहम चुनौती पेश कर सकती है।
विकल्प के तौर पर एफआईडीसी ने प्रस्ताव दिया है कि ऐसे रिकवरी एजेंटों को नियुक्त करने की अनुमति दी जानी चाहिए जिन्होंने ऋणदाता संस्था द्वारा आयोजित व्यापक आचार संहिता प्रशिक्षण को पूरा किया हो। साथ ही जिन्हें उचित प्रथाओं और ग्राहक सुरक्षा मानकों के अनुपालन की जानकारी हो।
एक मझोले आकार की एनबीएफसी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि प्रमाणन अनिवार्यता को छोटे शहरों में लागू करना बेहद मुश्किल हो सकता है। उन्होंने कहा, ‘मानकीकृत प्रशिक्षण का इरादा स्वागत योग्य है लेकिन ऐसे कई बाजारों में प्रमाणित कर्मियों की उपलब्धता एक चुनौती बनी हुई है जहां छोटे ऋण की अधिक गतिविधियां होती हैं। ऐसे में आंतरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम वाला दृष्टिकोण संचालन को बाधित किए बिना अनुपालन सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है।’
एफआईडीसी ने बैंकिंग नियामक से यह भी आग्रह किया है कि बकाये के भुगतान के बाद मोबाइल ऐक्सेस को बहाल न किए जाने के लिए प्रति घंटे 250 रुपये के जुर्माने के प्रस्ताव पर भी नए सिरे से विचार किया जाए। मसौदा प्रस्ताव के तहत चूक के मामले में ऋणदाताओं को मोबाइल को डिसेबल करने की अनुमति दी गई है।
एफआईडीसी ने कहा कि ऋणदाता के नियंत्रण से बाहर के कारकों के कारण असाधारण मामले पैदा हो सकते हैं जिससे मोबाइल ऐक्सेस को बहाल करने में देरी हो सकती है। एफआईडीसी ने प्रति घंटे 250 रुपये के जुर्माने के बजाय 250 रुपये के एकमुश्त जुर्माने का सुझाव दिया है।
एनबीएफसी एसआरओ ने आरबीआई से यह भी अनुरोध किया है कि पहली वसूली के लिए विजिट से पहले उधारकर्ताओं को सूचित करने की आवश्यकता वाले प्रस्ताव पर भी नए सिरे से विचार किया जाए। उसने कहा कि ऐसे मामलों में पहले से सूचित किए जाने पर वसूली प्रभावित हो सकती है। इसे लागू करना परिचालन के लिहाज से कठिन हो सकता है।
एफआईडीसी ने कहा कि नोटिस जारी करने के लिए 60 दिन की अवधि और उसके बाद सुधारात्मक कार्रवाई के लिए 90 दिन की अवधि बेवजह लंबी लगती है। इससे चूक बढ़ सकता है, वसूली लागत बढ़ सकती है और वित्तपोषित उपकरणों को तीसरे पक्ष को बेचे जाने का जोखिम बढ़ सकता है।