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RBI का सख्त प्लान, अब 1 लाख करोड़ क्लब में आते ही सरकारी NBFC पर शिकंजा; कंपनियों के लिए बदलेंगे नियम और रणनीति

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RBI के नए प्रस्ताव से बड़ी सरकारी NBFC को बैंक जैसी सख्त निगरानी में लाने की तैयारी है।

Last Updated- April 13, 2026 | 9:13 AM IST
NBFC
Representative image

भारतीय रिजर्व बैंक के गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के मसौदा मानदंड के कारण बड़ी सरकारी एनबीएफसी के ‘ऊपरी स्तर’ की श्रेणी में आने की उम्मीद है। दरअसल, ‘ऊपरी स्तर’ की एनबीएफसी के लिए परिसंपत्ति सीमा 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की तय की गई है। लिहाजा इस मानदंड के कारण सरकारी एनबीएफसी कंपनियां पहली बार बैंकिंग जैसे नियामकीय मानदंडों के तहत आ सकती हैं।

उद्योग के प्रतिभागियों ने अनुसार कि  रिजर्व बैंक के इस कदम को सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी एनबीएफसी में से कुछ पर निगरानी कसने के रूप में देखा जा रहा है। इससे ये बड़ी सरकारी एनबीएफसी बैंकों की तरह नियामकीय ढांचा के तहत आ सकती है।  मौजूदा समय में सरकारी स्वामित्व वाली एनबीएफसी को अपर लेयर में नहीं रखा गया है। उन्हें मामले के अनुसार मध्यम या निचली श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, ये प्रस्तावित मानदंड टाटा संस की दुविधा का समाधान स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं करते हैं। नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक के इस समूह की होल्डिंग कंपनी 2022 से ‘ऊपरी स्तर’ में रखी गई। भारतीय रिजर्व बैंक की जनवरी, 2025 की सूची में 15 ‘ऊपरी स्तर’ की एनबीएफसी थीं और इसमें से एक टाटा संस थी।

केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया था कि टाटा संस ने डी-रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया था और इससे पहले ही टाटा संस को इस सूची में शामिल कर लिया गया था। लिहाजा नियामक इस मामले की जांच कर रहा है। दरअसल, टाटा संस ने शुद्ध ऋण-मुक्त होने के बाद सूचीबद्धता से छूट के अनुरोध के लिए आवेदन किया था।

उद्योग के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि टाटा संस जैसी संस्थाओं के संबंध में अनिश्चितता बनी हुई है। यह संरचनात्मक रूप से एक मुख्य निवेश कंपनी के रूप में अलग हैं जबकि पहले इसे ऊपरी स्तर में शामिल किया गया था।

फाइनैंस इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल के सीईओ रमन अग्रवाल ने कहा, ‘रिजर्व बैंक ने कहा है कि वे अब सरकारी स्वामित्व वाली एनबीएफसी की परिसंपत्तियां एक लाख करोड़ रुपये के पार जाने पर उन्हें ऊपरी स्तर में रखेंगे। इसके अलावा ऐसा कोई अन्य महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं हैं जो उद्योग के पूरे कोराबार को प्रभावित कर सके।’

दरअसल, एक बार एनबीएफसी-यूएल के रूप में नामित होने के बाद कोई भी इकाई कम से कम पांच वर्षों तक बढ़ी हुई नियामक आवश्यकताओं के अधीन रहेगी, चाहे उसकी परिसंपत्तियां बाद के वर्षों में सीमा से कम हो जाए। दूसरे शब्दों में, सख्त व्यवस्था से बाहर निकलने के लिए पांच लगातार वर्षों तक वर्गीकरण मानदंडों को पूरा करने में विफल रहना होगा।

एनबीएफसी के अधिकारियों ने कहा कि परिसंपत्ति आकार के आधार पर सूचीबद्धता की प्रक्रिया को सरल बनाने और गुणात्मक कारकों को समाप्त करने का विचार बाजार में एनबीएफसी कंपनियों को अधिक नियामक निश्चितता देता है।

व्यावसायिक योजनाओं के आधार पर नियामक अपेक्षाओं पर अधिक स्पष्टता के साथ एनबीएफसी बेहतर योजना बना पाएंगी और 1 लाख करोड़ रुपये की सीमा पार करने के बाद नियामक अनुपालन के लिए तैयार रहेंगी।

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First Published - April 13, 2026 | 8:25 AM IST

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