उच्चतम न्यायालय ने मोटर दुर्घटनाओं में घर संभालने वाली महिला की मौत होने पर मुआवजे के लिए एक नई श्रेणी तैयार की है। न्यायालय ने गुरुवार को ऐसे मामलों में ‘घरेलू देखभाल का नुकसान’ नाम से एक अलग श्रेणी को मान्यता दी है। शीर्ष न्यायालय ने माना कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू एवं देखभाल के कार्यों के आर्थिक मूल्य की लंबे समय से अनदेखी होती रही है और इसे वाजिब तवज्जो नहीं दी गई।
इस कमी को दूर करने के लिए न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन के सिंह के पीठ ने निर्देश दिया कि घर संभालने वाली महिला की मौत के मामलों में न्यायाधिकरणों और न्यायालयों को ‘घरेलू देखभाल के नुकसान’ की नई श्रेणी के तहत एकमुश्त रकम देनी चाहिए। यह राशि 30,000 रुपये प्रति महीन तय की गई है जिसमें हर तीन साल में कुल 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।
पीठ ने यह फैसला हरियाणा से जुड़े वर्ष 2001 में हुई एक दुर्घटना से जुड़े मामले में दिया। न्यायालय ने इस दुर्घटना में घर संभालने वाली एक महिला की मौत से जुड़ा मुआवजा बढ़ा दिया।
महिला के काम के मूल्य से जुड़े सवालों पर शीर्ष न्यायालय ने कहा कि घर संभालने वाली महिला का योगदान आय की पारंपरिक धारणाओं से कहीं अधिक है। न्यायालय ने कहा, ‘ऐसा क्यों है कि भारतीय समाज में घर की महिला को ‘गृहस्वामिनी’का दर्जा दिए जाने के बाद भी हम अब तक अंधेरे में भटक रहे हैं?’
न्यायालय के मुताबिक ‘घरेलू देखभाल के नुकसान’ की नई श्रेणी में तीन अलग-अलग तरह के नुकसान शामिल हैं। इनमें पहला घर को सुचारू रूप से चलाने में महिला का योगदान, बच्चों को मां का सहारा छिनने से जुड़ा नुकसान और पति व माता-पिता को मिलने वाले जीवनसाथी या संतान के सहारे का नुकसान। पीठ ने कहा,‘ऐसे हालात में हमें मुआवजे के नए नियम लागू करना बिल्कुल दुरुस्त लगता है।’उन्होंने कहा कि इसका मकसद उन घरेलू महिलाओं को उस नुकसान से बचाना है जो इसलिए होता है क्योंकि मुआवजे की गणना एक विवादित काल्पनिक आय के आधार पर होती है।
इस फैसले में में घरेलू महिलाओं को “देश की सर्वांगीण प्रगति की नींव” बताया गया। इसमें यह भी कहा गया कि भले ही महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कार्य ज्यादातर घर के अंदर ही सीमित रहते हैं मगर इसी से उनके पति और बच्चे समाज और अर्थव्यवस्था में अहम योगदान दे पाते हैं।
न्यायालय ने माना कि काल्पनिक आय के पारंपरिक अनुमानों के आधार पर मुआवजे का हिसाब लगाने से घरेलू महिलाओं के काम की सही कीमत का पता नहीं चलता। न्यायालय ने कहा,‘घरेलू महिला की भूमिका न तो पूरी तरह से आर्थिक होती है और न ही पूरी तरह से गैर-आर्थिक। इसमें आर्थिक पहलुओं के साथ-साथ भावनात्मक और प्रबंधन संबंधी योगदान भी शामिल होते हैं।’अदालत ने यह भी कहा कि ‘कंसोर्टियम मुआवजा’ मुख्य रूप से भावनात्मक नुकसान की भरपाई करता है और इसमें घरेलू महिलाओं के आर्थिक योगदान का ठीक ढंग से आकलन नहीं किया जाता। अदालत के मुताबिक यह फैसला ‘महिलाओं के कार्यों को कमतर आंकने के चलन की दकियानूसी सोच के खिलाफ’ है।