सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि रैबीज के शिकार, बीमार और खतरनाक हो चुके आवारा कुत्तों को अधिकारियों द्वारा मारा जा सकता है ताकि इंसानों को उनसे होने वाले संभावित खतरों से बचाया जा सके। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजरिया के पीठ ने कहा कि नगर निकाय उन क्षेत्रों में ऐसे कुत्तों को मार सकते हैं जहां उनकी संख्या चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है और जहां लगातार कुत्तों के काटने या आक्रामक हमले सार्वजनिक सुरक्षा के लिए स्थायी खतरा बने हुए हैं।
पीठ ने कहा कि इन कुत्तों को मारने का निर्णय पशु चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा व्यापक मूल्यांकन के बाद और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 तथा अन्य लागू वैधानिक प्रोटोकॉल के अनुसार ही लिया जाना चाहिए।
पिछले वर्ष जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। उन मीडिया रिपोर्ट में बच्चों में रैबीज जैसी बीमारियों का कारण बने आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं का उल्लेख था। बाद में अगस्त में सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्देश जारी किए जिनमें दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम से सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर निर्दिष्ट डॉग शेल्टर्स में स्थानांतरित करने का आदेश शामिल था।
स्थिति को अत्यंत गंभीर बताते हुए उस समय मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन ने कहा था कि कोई भी व्यक्ति या संगठन जो इन आवारा कुत्तों को उठाने की प्रक्रिया में बाधा डालेगा उसे न्यायालय की अवमानना का दोषी माना जाएगा।
मंगलवार को तीन-न्यायाधीशों के पीठ ने अगस्त 2025 के आदेश को वापस लेने की सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार इस बात को भी समाहित करता है कि मनुष्य बिना कुत्तों के काटने के हमलों के खतरे के स्वतंत्र रूप से घूम सके। पीठ ने कहा, ‘न्यायालय कठोर वास्तविकताओं से आंख मूंदकर नहीं रह सकता जहां बच्चे, अंतरराष्ट्रीय यात्री और बुज़ुर्ग लोग कुत्तों के काटने की घटनाओं के शिकार हुए हैं।’
देशभर में कुत्तों के काटने के मामलों में 2022 से 2024 के बीच लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। 2024 में कुल 37 लाख कुत्तों के काटने की घटनाएं रिपोर्ट हुईं, जिनमें रैबीज से मानव मृत्यु के 54 संदिग्ध मामले शामिल थे। ये आंकड़े स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के इंटीग्रेटेड डिसीज सर्विलांस प्रोग्राम (आईएसडीपी) के डेटा पर आधारित हैं।