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विवादों के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा ने छोड़ा पद, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा अपना इस्तीफा

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दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा ने नकद विवाद और महाभियोग की कार्रवाई के बीच इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप दिया

Last Updated- April 10, 2026 | 10:43 PM IST
Yashwant Varma
दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा | फाइल फोटो

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा सौंप दिया है। अपने पत्र में उन्होंने लिखा, ‘मैं आपके प्रतिष्ठित कार्यालय को उन कारणों से बोझिल नहीं करना चाहता जिनके चलते मुझे यह पत्र लिखने के लिए विवश होना पड़ा है। गहरे दुःख के साथ मैं माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा देता हूं। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।’

न्यायमूर्ति वर्मा, जिन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किए जाने से पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया था, उस समय विवादों में घिर गए थे जब उनके आधिकारिक आवास पर आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को नकदी के बंडल मिले थे। 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित आवास के बाहरी हिस्से में आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों ने जली हुई नकदी की बड़ी मात्रा देखी। इसके बाद वीडियो भी सामने आए जिनमें जला हुआ कमरा और नकदी दिखाई दे रही थी।

उस समय न्यायमूर्ति वर्मा और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश की यात्रा कर रहे थे, जबकि उनकी बेटी और बुजुर्ग मां घर पर मौजूद थीं। नकदी मिलने के बाद भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जिन्हें वर्मा ने साजिश करार देते हुए खारिज किया।

इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आंतरिक जांच का आदेश दिया। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायाधीश अनु शिवरामन की तीन सदस्यीय समिति बनाई गई। समिति ने मार्च 2025 में कार्यवाही शुरू की और मई में अपनी रिपोर्ट सौंपी।

रिपोर्ट की समीक्षा के बाद  मुख्य न्यायाधीश  ने वर्मा से इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने को कहा। इस्तीफा न देने पर रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी गई।

इस बीच वर्मा को दिल्ली उच्च न्यायालय से उनके मूल इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया और उनके न्यायिक कार्य वापस ले लिए गए। अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने औपचारिक महाभियोग प्रक्रिया शुरू की और न्यायाधीशों की जांच समिति गठित की।

इस समिति में प्रारंभ में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनीन्द्र मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वासुदेव आचार्य शामिल थे। श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त होने पर बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर को शामिल किया गया।

इस वर्ष की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने जांच प्रक्रिया रोकने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की प्रक्रिया का पालन किया गया है और मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

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First Published - April 10, 2026 | 10:43 PM IST

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