उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रूप से रेत निकालने और इससे घडि़याल जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता के पीठ ने कहा कि हाल में उसके समक्ष रखी गई सामग्री से संकेत मिलता है कि वन्यजीव संरक्षण के लिए निर्धारित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन हो रहा है। अदालत ने कहा, ‘हमने हाल के कुछ समाचार पत्रों की रिपोर्टों और सीएसआर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट का संज्ञान लिया है, जिसमें बताया गया है कि जिन संरक्षित क्षेत्रों में घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम चल रहा है, वहां बड़े पैमाने पर खनन किया जा रहा है। इसके कारण घड़ियाल वहां से जा रहे हैं।’
पीठ ने संकेत दिया कि इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर व्यापक निर्देशों के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अध्यक्षता वाले पीठ के समक्ष रखा जाएगा। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। इसे लुप्तप्राय घड़ियाल के लिए सुरक्षित ठिकानों में से एक माना जाता है। इस नदी में अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों में गंगा में रहने वाली डॉल्फिन और इंडियन स्किमर या पनचीरा जैसे खूबसूरत पक्षी भी शामिल हैं।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्टों के अनुसार चंबल बेसिन में अवैध रेत खनन लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों की रिपोर्टों और जांच में यह सामने आया है कि नियामकीय प्रतिबंधों के बावजूद यहां संगठित खनन गिरोह सक्रिय हैं। इनके हौसले इतने बढ़े हुए हैं कि कई बार इस गतिविधि को रोकने की कोशिश कर रहे वन अधिकारियों और पुलिस दल पर हमले भी हुए हैं।