facebookmetapixel
Advertisement
राज्य की प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति की सीमाएं testtestभारत का डिफेंस प्रोडक्शन ऑल-टाइम हाई पर, FY26 में15.6% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ पर पहुंचाHCL Tech के नतीजों की तारीख तय, 13 जुलाई को आएगा रिपोर्ट कार्ड; डिविडेंड पर भी होगा फैसलारिटर्न कहीं और, निवेश कहीं और! क्या सही फंड चुन रहे हैं निवेशक? एक्सपर्ट से समझेंAI के दम पर नई छलांग की तैयारी में Coforge? शेयर में 50% तक तेजी की उम्मीद, एक्सपर्ट्स बुलिशकच्चा तेल सस्ता हो रहा है, फिर पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं?20 लाख रुपये से ज्यादा पैकेज वाली नौकरियों में उछाल, ब्रोकरेज ने बताए 4 पसंदीदा IT स्टॉक्सJio IPO का इंतजार खत्म! ₹4 अरब के मेगा IPO की तैयारी तेज, जल्द दाखिल होंगे ड्राफ्ट पेपरसरकार के आदेश के खिलाफ Telegram का पलटवार, Delhi HC पहुंची याचिकाब्राजील में पेट्रोल से 70% सस्ता, भारत में सिर्फ 20%: क्या फ्लेक्स-फ्यूल बनेगा हिट? बता रहे एक्सपर्ट

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण में आधार कार्ड भी होगा मान्य

Advertisement

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण में आधार कार्ड को मान्य किया और मतदाताओं को ऑनलाइन आवेदन से नाम जोड़ने की सुविधा देने का निर्देश चुनाव आयोग को दिया।

Last Updated- August 22, 2025 | 10:45 PM IST
supreme court of india
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के दौरान दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए आधार कार्ड को भी स्वीकार करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मतदाताओं के अनुकूल’ होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि विधानसभा चुनावों से पहले, जिन लोगों के नाम मसौदा मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, वे अब मतदाता सूची में अपना नाम जोड़ने के लिए ऑनलाइन आवेदन भी जमा कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें प्रत्यक्ष रूप से फॉर्म जमा करने की जरूरत नहीं है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जयमाल्या बागची के पीठ ने कहा, ‘हम बिहार एसआईआर के लिए हटाए गए मतदाताओं के ऑनलाइन आवेदन को आधार कार्ड या किसी अन्य मान्य दस्तावेज के साथ स्वीकार करने की अनुमति देंगे।’ शुरुआत में, निर्वाचन आयोग की 11 मान्य दस्तावेजों की सूची में, पहचान प्रमाण के रूप में आधार कार्ड शामिल नहीं था।

सुनवाई के दौरान, निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि इस संशोधन में 85,000 नए मतदाता जोड़े गए हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के बूथ स्तर एजेंटों (बीएलए) ने केवल दो आपत्ति की है। इस पर, अदालत ने उन मतदाताओं की मदद करने में राजनीतिक दलों की सीमित भूमिका पर हैरानी जताई, जिनके नाम हटा दिए गए थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि वह इस बात से हैरान हैं कि राजनीतिक दल कुछ क्यों नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘इसके लिए राजनीतिक कार्यकर्ता सबसे बेहतर हैं। आखिर आम जनता और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच इतनी दूरी क्यों है?’

इसके बाद, अदालत ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे अपने बूथ स्तर के एजेंट को निर्देश दें कि वे मतदाताओं को उनके दावे और आपत्तियां दर्ज कराने में मदद दें और साथ ही मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन दाखिल करने में मदद करें। न्यायमूर्ति बागची ने निर्वाचन आयोग को यह सुझाव भी दिया कि ‘दावे और आपत्तियां’ दर्ज कराने की प्रक्रिया में अब आधार को एक जरूरी और प्रासंगिक दस्तावेज के रूप में शामिल करने का मतलब है कि सत्यापन के लिए अधिक समय की जरूरत होगी। इस मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी। अदालत, निर्वाचन आयोग के 24 जून के उस निर्देश के खिलाफ दायर याचिकाओं की सुनवाई कर रही है जिसमें बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का आदेश दिया गया था।

इस निर्देश के अनुसार, जो मतदाता 2003 की मतदाता सूची में शामिल नहीं थे, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने होंगे। इसके अलावा, दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए लोगों को अपने माता-पिता दोनों की नागरिकता के दस्तावेज भी देने होंगे और अगर किसी के अभिभावक विदेशी नागरिक हैं तब और भी अतिरिक्त दस्तावेजों की जरूरत होगी। 

Advertisement
First Published - August 22, 2025 | 10:24 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement