सर्वोच्च न्यायालय ने ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर लगाए जाने वाले दांव के समूचे अंकित मूल्य पर पिछली तारीख से 28 फीसदी माल एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के केंद्र के फैसले को आज बरकरार रखा। ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े एक अन्य मामले में शीर्ष अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र में पैसों वाले ऑनलाइन गेमिंग को प्रतिबंधित करने का कानून बनाने के राज्य सरकारों के अधिकार को भी बरकरार रखा।
इन दो निर्णयों से भारत में बाकी बची गेमिंग कंपनियों के संचालन बंद होने का खतरा है। भारत में अधिकतर ऑनलाइन गेमिंग कंपनियां पहले ही अपना कारोबार समेट चुकी हैं या उसे कम कर दिया है अथवा अगस्त 2025 में ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी पर प्रतिबंध लगाने के सरकारी फैसले के बाद अन्य क्षेत्रों में कदम रख चुकी हैं। ऑनलाइन गेमिंग नियम, 2026 का प्रचार और विनियमन नामक नया कानून 1 मई से लागू हुआ है।
गेमिंग कंपनियों पर पिछली तारीख से प्रभावी कर लगाने की अनुमति देने वाले अपने फैसले में न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन के पीठ ने कहा कि यह कर संवैधानिक रूप से वैध है और जीएसटी को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है।
पीठ ने कहा, ‘ऑनलाइन गेमिंग गतिविधियां, जिनमें फैंटेसी स्पोर्ट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खेले जाने वाले अन्य खेल शामिल हैं और जिनमें अनिश्चित परिणामों पर दांव लगाया जाता है, जीएसटी ढांचे के उद्देश्य से सट्टेबाजी और जुए की श्रेणी में आते हैं।’
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत जानकारी के अनुसार ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर कुल करीब 91,684.81 करोड़ रुपये और कसीनो पर 16,820.19 करोड़ रुपये का कर बकाया है। जुर्माने और ब्याज सहित यह राशि संभावित रूप से दोगुनी हो सकती है। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘सट्टेबाजी और जुए से होने वाले कार्रवाई योग्य दावों पर जीएसटी लगाना संवैधानिक रूप से वैध है और संविधान के अनुच्छेद 366(12) और 366(12ए) का उल्लंघन नहीं करता है।’
अदालत ने कहा कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म को महज मध्यस्थ नहीं माना जा सकता और ऐसी गतिविधियां जीएसटी व्यवस्था के तहत कानूनी कार्रवाई के दायरे में आती हैं। अदालत ने कहा कि कर को वैध ठहराने वाले संशोधन स्पष्ट प्रकृति के थे और वे पिछली तारीख से लागू होंगे।
गेमिंग कंपनियों ने 28 फीसदी जीएसटी को पिछली तारीख से लागू करने को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि कर ढांचे के तहत जुए की केंद्र की व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा दशकों से स्थापित न्यायिक मिसालों के विपरीत है।
जुलाई 2023 में जीएसटी परिषद ने ऑनलाइन गेमिंग, कसीनो और घुड़दौड़ के अंकित मूल्य पर 28 फीसदी की समान दर से कर लगाने का फैसला किया था। इसके बाद सीजीएसटी और आईजीएसटी अधिनियमों में संशोधन पेश किए गए, जो 1 अक्टूबर, 2023 से प्रभावी हुआ। संशोधनों में यह प्रावधान था कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर शुरुआती दांव पर जीएसटी लगाया जाएगा न कि खिलाड़ियों द्वारा बाद के खेलों में अपनी जीत से दांव लगाई गई पूरी राशि पर।
ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों ने उस समय संशोधनों को चुनौती दी थी लेकिन 2023 में शीर्ष अदालत ने जीएसटी मांग नोटिस के खिलाफ अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा था कि वह दांव पर लगे पूर्ण मूल्य पर न कि सकल गेमिंग राजस्व पर, 28 प्रतिशत जीएसटी लगाने के सरकार के फैसले की जांच करेगी। अदालत ने कहा था कि वह सरकार के उस फैसले की जांच करेगी जिसमें 28 फीसदी जीएसटी को कुल जुए के राजस्व के बजाय दांव के पूरे मूल्य पर पूर्वव्यापी रूप से लागू किया गया है।
कंपनियों ने तर्क दिया था कि 28 फीसदी जीएसटी 1 अक्टूबर, 2023 से आगे के लिए लागू हो सकती है। हालांकि सरकार का कहना था कि 1 अक्टूबर के बदलाव केवल मौजूदा कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हैं और इसमें पूर्वव्यापी कर की मांग शामिल नहीं है।
केंद्र सरकार ने अगस्त 2023 में जीएसटी कानून में भी संशोधन किया था। उसके तहत विदेशी ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों के लिए उस साल 1 अक्टूबर से भारत में पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया था।
सीएनके ऐंड एसोसिएट्स एलएलपी के पार्टनर सीए पंकज गोयल ने कहा, ‘सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह सवाल हमेशा के लिए खत्म हो गया है कि क्या ऑनलाइन गेमिंग पर 28 फीसदी जीएसटी लगता है। इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है कि हां लगता है। इसके अलावा अब कौशल या संयोग के बीच का अंतर कराधान के मामले में कोई बचाव नहीं करता। इस फैसले ने सैद्धांतिक तौर पर कर लगाने के अधिकार की पुष्टि की है। अब हर मामले में केवल कर की वास्तविक रकम तय करना बाकी है।’
वेद जैन ऐंड एसोसिएट्स के पार्टनर अंकित जैन ने कहा कि यह फैसला ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों से पिछली तारीख से जीएसटी वसूलने के सरकार के अधिकार की पुष्टि करता है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि अब तक जारी किए गए सभी कारण बताओ नोटिस सीधे तौर पर कर अदायगी के अंतिम आदेश में बदल जाएंगे।
जैन ने कहा कि गेमिंग कंपनियों के पास अभी भी संबंधित अधिकारियों के सामने कुछ मुद्दों पर अपनी बात रखने का मौका हो सकता है। उदाहरण के लिए, वे गणना संबंधी खामियों, पूर्ण अंकित मूल्य के आकलन, समय-सीमा में विसंगतियों और कर संबंधी अन्य मांग के मामले में अपनी बात रख सकते हैं।
क्रीड़ा लीगल के मैनेजिंग पार्टनर विदुषपत सिंघानिया ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आज के दूसरे फैसले में राज्यों को ऑनलाइन गेमिंग एवं जुए पर कानून बनाने और उस पर रोक लगाने का अधिकार दिया गया है। इससे वैध स्किल-गेमिंग कारोबार के लिए अनिश्चितता पैदा होती है।
सिंघानिया ने कहा, ‘इस उद्योग के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात अदालत की यह टिप्पणी है कि जिन खेलों के नतीजे पक्के नहीं होते उन पर पैसे लगाना सट्टेबाजी और जुए के दायरे में आ सकता है भले ही वह गेमिंग कौशल वाली हो या अवसर वाली। यह बात कौशल और जोखिम वाले गेम को लंबे समय से मिली कानूनी मान्यता से अलग है। साथ ही यह वैध ऑनलाइन स्किल-गेमिंग प्लेटफॉर्म और जुए की गतिविधियों के बीच के फर्क को धुंधला कर देती है।’
बिज़नेस स्टैंडर्ड से बात करने वाले कई अधिकारियों ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा झटका है। यह खास तौर पर उन कंपनियों के लिए झटका है जिन्होंने असली पैसे वाले खेलों से हटकर माइक्रो-ड्रामा और कैजुअल गेम्स जैसे उत्पाद पर ध्यान देना शुरू कर दिया था।
उद्योग के एक सूत्र ने बताया कि इस क्षेत्र पर कुल जीएसटी मांग (जुर्माना सहित) 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। मगर इस उद्योग की किसी भी कंपनी में इतनी बड़ी देनदारी चुकाने की क्षमता नहीं है।