facebookmetapixel
Advertisement
राज्य की प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति की सीमाएं testtestभारत का डिफेंस प्रोडक्शन ऑल-टाइम हाई पर, FY26 में15.6% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ पर पहुंचाHCL Tech के नतीजों की तारीख तय, 13 जुलाई को आएगा रिपोर्ट कार्ड; डिविडेंड पर भी होगा फैसलारिटर्न कहीं और, निवेश कहीं और! क्या सही फंड चुन रहे हैं निवेशक? एक्सपर्ट से समझेंAI के दम पर नई छलांग की तैयारी में Coforge? शेयर में 50% तक तेजी की उम्मीद, एक्सपर्ट्स बुलिशकच्चा तेल सस्ता हो रहा है, फिर पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं?20 लाख रुपये से ज्यादा पैकेज वाली नौकरियों में उछाल, ब्रोकरेज ने बताए 4 पसंदीदा IT स्टॉक्सJio IPO का इंतजार खत्म! ₹4 अरब के मेगा IPO की तैयारी तेज, जल्द दाखिल होंगे ड्राफ्ट पेपरसरकार के आदेश के खिलाफ Telegram का पलटवार, Delhi HC पहुंची याचिकाब्राजील में पेट्रोल से 70% सस्ता, भारत में सिर्फ 20%: क्या फ्लेक्स-फ्यूल बनेगा हिट? बता रहे एक्सपर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेड यूनियनों को फटकारा, औद्योगिक विकास में रुकावट के लिए जिम्मेदार ठहराया

Advertisement

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि देश में ट्रेड यूनियनों की वजह से कितनी औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं?

Last Updated- January 29, 2026 | 11:29 PM IST
Supreme Court

उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को ट्रेड यूनियनों को फटकार लगाते हुए कहा कि देश में औद्योगिक विकास की गति रोकने के लिए इन संगठनों के नेता जिम्मेदार हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘देश में ट्रेड यूनियनों की वजह से कितनी औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं? हमें वास्तविकताएं बताइए। देश के सभी पारंपरिक उद्योग, इन झंडा यूनियनों के कारण पूरे देश में बंद हो गए हैं। वे काम नहीं करना चाहते हैं।’

सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी कहा, ‘ट्रेड यूनियन नेता देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। बेशक शोषण है, लेकिन इसे दूर करने के साधन भी हैं। लोगों को उनके व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में अधिक जागरूक किया जाना चाहिए था और उन्हें कुशल बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए था।’

न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची के सदस्यता वाला पीठ पेन थो​ज्हिलरगल संगम और अन्य ट्रेड यूनियनों द्वारा घरेलू कामगारों के लिए कल्याणकारी उपायों की मांग करने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचियों पे अन्य बातों के साथ-साथ, घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन अधिसूचना के तहत लाने की मांग की है।

शुरुआत में अदालत ने इस तरह के उपायों को न्यायिक रूप से अनिवार्य करने के बारे में अपनी सीमाओं का जिक्र किया और याचियों को चेताया कि घरेलू स्तर तक न्यूनतम वेतन नियमों को लागू करने से मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।

याचियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं पर भरोसा जताया और तर्क दिया कि घरेलू काम को पंजीकरण, अनिवार्य साप्ताहिक आराम और वेतन सुरक्षा के माध्यम से विनियमित किया जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने चेतावनी दी कि अच्छी मंशा वाले सुधारों के कभी-कभी खासकर उच्च बेरोजगारी वाले श्रम बाजार में अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मांग और आपूर्ति को ध्यान में रखे बिना वेतन तय करने से परिवार घरेलू सहायकों को रखना पूरी तरह बंद कर सकते हैं, जिससे राहत मिलने के बजाय कठिनाई और बढ़ सकती है।

Advertisement
First Published - January 29, 2026 | 11:17 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement