सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को देश भर के उच्च न्यायालयों को निर्देश दिए कि आदेश सुरक्षित करने के बाद 3 महीने के भीतर निर्णय सुनाया जाना चाहिए। इससे अधिक समय बिल्कुल नहीं लगना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि फैसले में देरी के कारण वादियों को अपूरणीय क्षति होती है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अधिक तत्परता की आवश्यकता पर जोर देते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची के पीठ ने कहा कि जमानत आवेदनों पर यथासंभव उसी दिन निर्णय लिया जाना चाहिए और उसे उसी दिन वेबसाइट पर अपलोड भी किया जाना चाहिए। यदि कोई आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कई निर्देश जारी करते हुए यह भी कहा कि जमानत देने या सजा के निलंबन का आदेश सुनाए जाने के तुरंत बाद जेल प्राधिकारियों को इसकी सूचना दी जानी चाहिए और विचाराधीन कैदी या दोषी को यथासंभव उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि आपराधिक अपीलों और मौत की सजा के संदर्भों में जहां अपीलकर्ता हिरासत में है, निर्णय सुरक्षित रखे जाने के बाद किसी भी तरह का स्पष्टीकरण सात दिन के भीतर मांगा जाना चाहिए। अन्य मामलों में इसमें अधिकतम एक महीने का समय दिया जा सकता है।
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शीर्ष अदालत ने बेहद जरूरी मामलों में उच्च न्यायालयों को आदेश के कार्यात्मक हिस्से को सुनाने की अनुमति दे दी। हालांकि, तर्कसंगत निर्णय को आम तौर पर सात दिनों के भीतर अपलोड किया जाना चाहिए और असाधारण परिस्थितियों में इसमें पंद्रह दिन से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि खुली अदालत में सुनाए गए निर्णयों को 24 घंटे के भीतर हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। जवाबदेही में सुधार के मद्देनजर शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया कि सुरक्षित रखे गए फैसलों की निगरानी के लिए ठोस प्रणाली बनाएं।
उच्च न्यायालयों की वेबसाइटों पर लंबित मामलों की पहचान करने वाली स्वचालित मासिक रिपोर्ट तैयार करने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि तीन महीने से अधिक समय तक निर्णय नहीं सुनाया जाता है, तो रजिस्ट्रार जनरल उस मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करें। वह इसे संबंधित पीठ के संज्ञान में लाएंगे। यदि इसके बावजूद निर्णय नहीं सुनाया जाता है, तो मुख्य न्यायाधीश पक्षों को सूचित करने के बाद मामले को दूसरी पीठ को सौंप सकते हैं।
अदालत ने वादियों के लिए भी कुछ उपाय सुझाए हैं। यदि तीन महीने से अधिक समय तक कोई निर्णय लंबित रहता है तो पक्षकार आवेदन दायर कर निर्णय सुनाए जाने की मांग कर सकते हैं। साथ ही यदि निर्णय सुरक्षित रखने जाने के 4 महीने बाद भी फैसला नहीं आता है तो पक्षकार इसकी नए सिरे से सुनवाई के लिए दूसरी पीठ को स्थानांतरित करने की मांग कर सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि नीट-यूजी से संबंधित मूल समस्या तब तक समाप्त नहीं होगी जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं हो जाती। उसने यह भी कहा कि हमें अपने युवाओं को निराश नहीं करना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को बताया कि सरकार युवाओं की चिंताओं को लेकर गंभीर है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से स्थिति की निगरानी कर रहे हैं।
मेहता ने न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे के पीठ को बताया कि 21 जून को होने वाली नीट-यूजी परीक्षा के लिए कुछ नई व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। पीठ ने कहा, ‘जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होगी तब तक असल समस्या का समाधान नहीं होगा।’