उच्चतम न्यायालय ने ऐसे संकेत दिए हैं कि गर्भपात संबंधित नियमों पर पुनर्विचार की जरूरत है। न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि खासकर बलात्कार की शिकार नाबालिग लड़कियों से जुड़े मामलों में नियमों पर दोबारा विचार जरूरी हो जाता है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में गर्भावस्था की कठोर समय सीमा उचित नहीं मानी जा सकती।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की अध्यक्षता वाले पीठ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एआईएमएस), नई दिल्ली द्वारा दायर एक उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान दो न्यायाधीशों के पीठ के उस पूर्व आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें 15 वर्षीय लड़की के 30 सप्ताह के गर्भ को गिराने की अनुमति दी गई थी।
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने बताया कि गर्भावस्था 24 सप्ताह की वैधानिक समय सीमा को पार कर चुकी थी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा,‘कृपया अपने कानून में संशोधन करें ताकि नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के कारण अनचाहे गर्भ के मामलों में समय सीमा की जटिलता न रहे।’ न्यायालय ने ऐसे मामलों में विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया।
पीठ ने गौर किया कि नाबालिग पीड़िता अक्सर गर्भावस्था की जांच देर से कराती हैं या इसकी जानकारी देर से देती हैं और तब तक वैधानिक समय सीमा समाप्त हो चुकी होती है। पीठ ने यौन शोषण का खुलासा करने में कई पीड़ितों की झिझक से जुड़े पहलू पर भी विचार किया और आगाह किया कि ऐसी स्थितियों में कानूनी उपायों का अभाव नहीं होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई होनी चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि वैधानिक गर्भकाल की सीमा चिकित्सकों पर बाध्यकारी हैं मगर अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले संवैधानिक न्यायालय के निर्णयों को प्रभावित नहीं कर सकते। न्यायालय ने एम्स की याचिका खारिज कर दी और कहा कि कोई भी चिकित्सा संस्थान नाबालिग की स्वायत्तता का उल्लंघन नहीं कर सकता। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि गर्भावस्था जारी रखने या समाप्त करने का निर्णय उसी का होता है।
गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन (गर्भपात) अधिनियम में गर्भपात की सामान्य ऊपरी सीमा 20 सप्ताह निर्धारित है। इस अधिनियम में अंतिम संशोधन 2021 में हुआ था। बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं, नाबालिगों, वैवाहिक स्थिति में बदलाव का सामना कर रही महिलाओं, विकलांग या मानसिक रूप से बीमार महिलाओं और भ्रूण में गंभीर विकृतियों से जुड़े मामलों सहित कुछ श्रेणियों के लिए दो पंजीकृत चिकित्सा चिकित्सकों की राय से इसे 24 सप्ताह तक बढ़ाया जा सकता है। 24 सप्ताह बाद गर्भपात की अनुमति तभी दी जा सकती है जब महिला का जीवन बचाना तत्काल आवश्यक हो या राज्य स्तरीय चिकित्सा बोर्ड को भ्रूण में गंभीर विकृतियों का पता चला हो। ‘ए’ (एक्स की मां) बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) मामले में उच्चतम न्यायालय ने बलात्कार और अनाचार की शिकार नाबालिग महिलाओं के लिए कानून में लचीलेपन की कमी पर चिंता व्यक्त की थी।