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श्रम बाजार में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी, लेकिन वेतन में पुरुषों से अब भी बड़ा अंतर

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शहरी महिलाएं विनिर्माण क्षेत्र में अधिक हैं, लेकिन शहरी महिला एलएफपीआर 2025 में मात्र 27.7 प्रतिशत है, जो 2022 के स्तर से केवल तीन अंक अधिक है।

Last Updated- May 01, 2026 | 9:08 AM IST
Equality

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की बुधवार को जारी ‘भारत में महिलाएं और पुरुष 2025’ रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था में महिला कार्यबल की भागीदारी में भारी वृद्धि हुई है। श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 2022 के 33.9 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 40 प्रतिशत हो गई है। यह वृद्धि लगभग पूरी तरह से ग्रामीण महिलाओं के कारण हुई है। हालांकि कम वेतन, कृषि कार्य में लगे होने और बगैर वेतन काम के पड़ने वाले बोझ की वजह से उनकी प्रगति बाधित हो रही है।

आंकड़ों के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में राष्ट्रीय महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 2022 के 33.9 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 40 प्रतिशत हो गई है। ग्रामीण महिलाओं ने इस वृद्धि में मुख्य भूमिका निभाई, जिनकी एलएफपीआर इसी अवधि में 37.5 प्रतिशत से बढ़कर 45.9 प्रतिशत हो गई।

इसके बावजूद आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि यह प्रगति ढांचागत रूप से कमजोर बनी हुई है। पुरुषों की एलएफपीआर 2022 के 78 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 79.1 प्रतिशत हो गई है, जो लगभग 40 प्रतिशत अंक का अंतर है और इसमें बहुत कम बदलाव आया है।

साथ ही करीब तीन चौथाई या 72.7 प्रतिशत ग्रामीण महिला श्रमिक खेतों में काम करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2025 तक ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि में महिला श्रमिकों का केंद्रीकरण अधिक है, और लगभग तीन-चौथाई (72.7 प्रतिशत) ग्रामीण महिला श्रमिक इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।’ शहरी महिलाएं विनिर्माण क्षेत्र में अधिक हैं, लेकिन शहरी महिला एलएफपीआर 2025 में मात्र 27.7 प्रतिशत है, जो 2022 के स्तर से केवल तीन अंक अधिक है।

वेतन की स्थिति देखें तो रिपोर्ट के मुताबिक लैंगिक भेदभाव साफ नजर आता है। गैर सार्वजनिक क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूरों का वेतन देखें तो पुरुषों को 435 रुपये, जबकि महिलाओं को 305 रुपये रोजाना भुगतान किया जाता है। शहरों में पुरुष 552 रुपये कमाते हैं जबकि महिलाएं 363 रुपये कमाती हैं, जो लगभग 34 प्रतिशत का अंतर है।

इसके अलावा समय के इस्तेमाल के सर्वे से पता चलता है कि गांव में महिलाएं रोजाना 389 मिनट घरेलू काम पर खर्च करती हैं, जिनका उन्हें भुगतान नहीं मिलता है, जबकि पुरुष सिर्फ 88 मिनट अवैतनिक घरेलू काम करते हैं।

राष्ट्रीय व्यावसायिक वर्गीकरण (एनसीओ) 2015 का उपयोग करते हुए रिपोर्ट में व्यवसाय के मुताबिक प्रति घंटा मजदूरी निकाली गई है। इसके मुताबिक महिलाएं अधिकांश श्रेणियों में पुरुषों की तुलना में कम कमाती हैं। हालांकि विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों की शीर्ष-स्तरीय श्रेणी में, शहरी महिलाएं वास्तव में पुरुषों से अधिक कमाती हैं, पुरुषों के 217 रुपये प्रति घंटे की तुलना में उन्हें 234 रुपये प्रति घंटे मिलते हैं।

15 से 29 वर्ष की आयु के युवा श्रमिकों में बेरोजगारी सबसे गंभीर है। 2025 में शहरी युवा महिलाओं में बेरोजगारी दर 18.9 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि शहरी युवा पुरुषों के लिए यह 11.8 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘15 से 29 वर्ष की आयु की युवा आबादी में बेरोजगारी सबसे अधिक बनी हुई है, जिसमें शहरी क्षेत्रों में इसकी गंभीरता विशेष रूप से अधिक है।’

सकारात्मक बदलाव यह हुआ है कि महिला-प्रधान एकमात्र स्वामित्व वाले प्रतिष्ठान अब 2023-24 में असंगठित क्षेत्र में सभी एकमात्र स्वामित्व वाले उद्यमों का 26.2 प्रतिशत हैं, जो 2021-22 में 24 प्रतिशत से अधिक है।

रिपोर्ट के अनुसार विनिर्माण वह क्षेत्र है जहां महिलाओं के उद्यमों का स्वामित्व सबसे अधिक है, जिसमें तेलंगाना (73 प्रतिशत), कर्नाटक (70 प्रतिशत) और गुजरात (61 प्रतिशत) आगे हैं। बिहार में विशेष रूप से एक नाटकीय उछाल आई है और 3 वर्षों में महिला प्रधान विनिर्माण उद्यम 31.2 प्रतिशत से बढ़कर 63 प्रतिशत हो गए।
इसके अतिरिक्त वित्त वर्ष 2026 के अनुसार महिलाएं निवेशकों का 24.7 प्रतिशत हैं, जो पिछले वर्ष के 24.3 प्रतिशत से मामूली वृद्धि है।

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First Published - May 1, 2026 | 9:08 AM IST

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