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होर्मुज पर संकट के बीच बड़ा प्लान! गल्फ देशों ने खोजे नए तेल रास्ते, क्या बदल जाएगी पूरी ग्लोबल सप्लाई?

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ते तनाव के कारण खाड़ी देशों ने वैकल्पिक पाइपलाइन और निर्यात रास्तों को तेज किया है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों में अस्थिरता बढ़ रही है।

Last Updated- April 05, 2026 | 5:11 PM IST
Strait of hormuz West Asia War
Representative image

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच गल्फ देशों ने अपने तेल निर्यात को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता से कम करने के प्रयास तेज कर दिए हैं। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। हाल के समय में शिपिंग पर हमलों और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैकल्पिक रास्तों की जरूरत को और बढ़ा दिया है।

सामान्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल का परिवहन होता है। ऐसे में किसी भी तरह की बाधा का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसी कारण क्षेत्र के देश लंबे समय से पाइपलाइन और अन्य विकल्पों पर काम कर रहे हैं, जो अब मौजूदा हालात में तेजी से आगे बढ़ते दिख रहे हैं।

कौन से मौजूदा पाइपलाइन होर्मुज से बचने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं?

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पहले से ही अपने तेल निर्यात के लिए ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कर रहे हैं जो होर्मुज से होकर नहीं गुजरता।

सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जिसे पेट्रोलाइन भी कहा जाता है, लगभग 1200 किलोमीटर लंबी है। यह देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के यानबू बंदरगाह से जोड़ती है। इसकी क्षमता करीब 70 लाख बैरल प्रतिदिन है और मौजूदा हालात में यह एक अहम विकल्प बन गई है।

Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) की अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (ADCOP) हबशान से फुजैरा तक जुड़ी हुई है, जिससे तेल निर्यात को होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बायपास करने का विकल्प मिलता है। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 1.8 मिलियन बैरल तक की क्षमता संभाल सकती है, हालांकि वर्तमान में इसका उपयोग पूर्ण क्षमता से कम है। विश्लेषकों के अनुसार, दोनों पाइपलाइनों के संयुक्त उपयोग से खाड़ी क्षेत्र के तेल प्रवाह में किसी बड़े व्यवधान के प्रभाव को केवल आंशिक रूप से ही कम किया जा सकता है।

विस्तार की किन योजनाओं पर विचार किया जा रहा है?

सऊदी अरब अपनी तेल निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए नए विकल्पों पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, देश Saudi Arabia में मौजूदा East-West Pipeline का विस्तार करने या इसके समान नए मार्ग बनाने की संभावना पर काम चल रहा है, ताकि तेल का अधिक हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर से भेजा जा सके।

इसके साथ ही, लाल सागर तट पर नए निर्यात टर्मिनल बनाने पर भी चर्चा हो रही है। इनमें Neom Project क्षेत्र में प्रस्तावित सुविधाएं भी शामिल हैं, जिन्हें भविष्य में तेल निर्यात के लिए एक अहम केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

संयुक्त अरब अमीरात में भी अधिकारी फुजैरा तक एक अतिरिक्त पाइपलाइन बनाने की संभावना तलाश रहे हैं, जिससे निर्यात क्षमता को बढ़ाया जा सके। इन कदमों को ऐसे व्यावहारिक उपाय माना जा रहा है, जिन्हें जटिल अंतरराष्ट्रीय निर्माण कार्यों के बिना अपेक्षाकृत जल्दी लागू किया जा सकता है।

क्या विस्तार योजनाएं विचाराधीन हैं?

केवल मौजूदा ढांचे के विस्तार तक ही बात सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र में नए और बड़े पाइपलाइन नेटवर्क पर भी विचार हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग मार्गों को जोड़ने वाला एक व्यापक नेटवर्क क्षेत्र की ऊर्जा आपूर्ति को अधिक सुरक्षित और मजबूत बना सकता है।

कुछ प्रस्तावों में इराक को भूमध्य सागर के बंदरगाहों से जोड़ने वाले मार्ग शामिल हैं, जो जॉर्डन, सीरिया या तुर्किये से होकर गुजर सकते हैं। इसके अलावा ओमान के बंदरगाहों तक वैकल्पिक रास्तों पर भी चर्चा हो रही है। साथ ही भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे में ऊर्जा परिवहन को शामिल करने की संभावना भी देखी जा रही है, जिसमें पाइपलाइन के साथ रेल और व्यापार मार्गों का संयोजन हो सकता है।

इन परियोजनाओं को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

इन तरह की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले लागत का मुद्दा है। कुछ आसान मार्गों के लिए भी खर्च करीब 5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जबकि अगर कई देशों से होकर गुजरने वाले बड़े कॉरिडोर बनाए जाएं तो यह लागत 20 अरब डॉलर तक जा सकती है।

इसके अलावा भौगोलिक कठिनाइयाँ भी एक बड़ी बाधा हैं। रेगिस्तानी इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में पाइपलाइन बिछाना तकनीकी रूप से काफी जटिल होता है और इसके लिए विशेष इंजीनियरिंग की जरूरत पड़ती है।

सुरक्षा को लेकर भी जोखिम बना रहता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां संघर्ष या अस्थिरता है जैसे इराक और सीरिया। ऐसे इलाकों में परियोजनाओं की सुरक्षा और संचालन चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

कैट ग्रुप के मुख्य कार्यकारी क्रिस्टोफर बुश के अनुसार, युद्ध शुरू होने से पहले भी इन परियोजनाओं में रुचि थी। उनका कहना है कि अगर आज के समय में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन जैसी किसी परियोजना को दोबारा बनाया जाए तो इसकी लागत कम से कम 5 अरब डॉलर होगी। उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह की संभावनाओं पर पहले भी चर्चा हो चुकी है और आगे भी इसके लिए अवसर मौजूद हैं।

इसके साथ ही राजनीतिक सहयोग भी एक बड़ी चुनौती है। कई देशों के बीच समन्वय जरूरी होगा ताकि सीमा पार बुनियादी ढांचे को सही तरीके से प्रबंधित किया जा सके और आपूर्ति पर संतुलित नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।

वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर क्या असर पड़ रहा है?

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता ने कच्चे तेल के बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा दिया है। हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज़ बदलाव देखने को मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति लंबे समय तक ऐसी ही बनी रहती है तो भंडारण क्षमता भरने के कारण उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है।

ऊर्जा बाजार विश्लेषक Sasha Foss ने CNBC से बातचीत में कहा कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है तो उत्पादन घटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा।

हालांकि पाइपलाइनों के जरिए कुछ हद तक राहत मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये विकल्प समुद्री मार्गों की पूरी तरह जगह नहीं ले सकते, खासकर अल्पकाल में। इसके बावजूद मौजूदा संकट खाड़ी देशों को ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अपनी दीर्घकालिक रणनीतियों में बदलाव करने के लिए प्रेरित कर रहा है।

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First Published - April 5, 2026 | 5:04 PM IST

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