अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपनी हरकतों से हमेशा चर्चा में रहते हैं। अब उन्होंने मुद्रा व्यवस्था में भी हस्तक्षेप करने की तैयारी कर ली है। अमेरिका के ट्रेजरी विभाग ने 26 मार्च को एक बड़ा ऐलान किया है। इसके मुताबिक, 4 जुलाई से अमेरिकी करेंसी पर ट्रंप का हस्ताक्षर दिखने लगेगा। ये तारीख अमेरिका का 250वां स्वतंत्रता दिवस है, इसलिए इसे खास मौका माना जा रहा है।
अमेरिका में कागजी नोटों पर हमेशा दो हस्ताक्षर होते रहे हैं। एक ट्रेजरी सचिव का और दूसरा ट्रेजरी के खजाने के अधिकारी का। राष्ट्रपति कभी भी इन नोटों पर अपना सिग्नेचर नहीं लगाते। ये परंपरा दशकों से चली आ रही है, भले ही नोटों के डिजाइन या सुरक्षा फीचर्स कितने भी बदल गए हों।
अभी चल रहे डॉलर नोटों पर ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का सिग्नेचर है, साथ में खजाने के अधिकारी का भी साइन है। नोटों पर बने चेहरे जैसे जॉर्ज वॉशिंगटन या अब्राहम लिंकन सिर्फ प्रतीक हैं। असली कानूनी अधिकार तो उन सिग्नेचर से आता है जो जारी करने वाले अधिकारियों के होते हैं। ट्रंप का ये फैसला इस पुरानी रिवाज को तोड़ने वाला पहला कदम है।
दुनिया के ज्यादातर देशों में बैंकनोट्स पर सिग्नेचर सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि संस्थागत जिम्मेदारी का प्रतीक होते हैं। ये कानूनी बैकिंग और विश्वसनीयता दिखाते हैं।
ब्रिटेन में बैंक ऑफ इंग्लैंड के नोटों पर गवर्नर का सिग्नेचर होता है। यूरो क्षेत्र में यूरोपीय सेंट्रल बैंक के अध्यक्ष का साइन होता है। हर जगह एक ही बात साफ है कि सिग्नेचर उसी अधिकारी का होता है जो मुद्रा जारी करने के लिए जिम्मेदार है। कोई भी सक्रिय राजनेता या राष्ट्रपति खुद को इस प्रक्रिया से नहीं जोड़ता।
बैंकनोट दरअसल एक वादे का कागज होता है। पुराने जमाने में ये वादा होता था कि धारक को सोना या चांदी दी जाएगी। आज फिएट मुद्रा है, यानी कोई कमोडिटी नहीं, फिर भी कानूनी ढांचा वैसा ही है।
सिग्नेचर कानूनी वैधता, जवाबदेही और भरोसा देता है। ये बताता है कि नोट कानूनी शक्तियों के तहत जारी किया गया है। सिग्नेचर किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि पद का होता है। मुद्रा को राजनीतिक नेतृत्व से अलग रखा जाता है ताकि स्थिरता बनी रहे।
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भारत भी सेंट्रल बैंक वाली व्यवस्था पर चलता है। हर नोट पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर का हस्ताक्षर होता है। नोट पर लिखा होता है – “मैं धारक को … रुपये देने का वादा करता हूं” और नीचे गवर्नर का सिग्नेचर होता है। ये सब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 के तहत है। सिर्फ आरबीआई को ही नोट जारी करने का अधिकार है। यहां भी राजनीतिक नेता खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखते हैं।
सिग्नेचर वाली परंपरा 17वीं सदी के यूरोप से शुरू हुई। उस समय कागजी मुद्रा नई चीज थी। बैंक ऑफ इंग्लैंड 1694 में बना तो इस सिस्टम को औपचारिक रूप मिला।
शुरुआत में नोट्स पर बैंक अधिकारियों के हाथ से लिखे सिग्नेचर होते थे। ये नोट वादे की चिट्ठी जैसे थे जैसे धारक को सोना या चांदी देने का। उस दौर में जालसाजी बहुत आम थी, इसलिए सिग्नेचर सुरक्षा का भी काम करता था और कानूनी प्रमाण भी। जब प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी बेहतर हुई तो हाथ के सिग्नेचर की जगह प्रिंटेड सिग्नेचर आ गया। लेकिन परंपरा आज भी वैसी ही है।
व्यावहारिक रूप से सिग्नेचर से नोट की कीमत या खरीदारी की ताकत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सौ रुपए का नोट हो या सौ डॉलर का बिल, उसकी वैल्यू पूरी अर्थव्यवस्था और कानूनी ढांचे से आती है, किसी व्यक्ति के नाम से नहीं।
फिर भी, सिग्नेचर असल में सिस्टम की निरंतरता दिखाता है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन सेंट्रल बैंक या ट्रेजरी ही मुद्रा को स्थिर रखते हैं। इसलिए ज्यादातर देशों में मौजूदा नेता को सीधे तौर पर मुद्रा जारी करने से दूर रखा जाता है।
जब नया गवर्नर या ट्रेजरी सेक्रेटरी आता है, तो नए नोटों पर सिग्नेचर बदल जाता है, लेकिन पुराने नोट चलते रहते हैं। इससे साफ होता है कि सिस्टम किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि संस्था पर टिका होता है।
ट्रंप का यह कदम अमेरिका की मुद्रा परंपरा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। 4 जुलाई से आने वाले नए नोटों पर उनका सिग्नेचर देखना दिलचस्प होगा। दुनिया भर के अर्थशास्त्री और एक्सपर्ट इस पर नजर बनाए हुए हैं।