जनवरी 2004 में ‘द अप्रेंटिस’ शो का पायलट एपिसोड था। डॉनल्ड ट्रंप की आवाज में एक वॉइसओवर आता है जिसमें वे कहते हैं कि उनके लिए हमेशा सब कुछ आसान नहीं रहा। 1980 के दशक के आखिर तक वे गंभीर मुश्किल में थे और अरबों डॉलर का कर्ज उन पर लदा हुआ था। ये उन गिने-चुने मौकों में से एक था जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अपनी असफलता का जिक्र किया था। लेकिन तब भी ये एक स्क्रिप्ट लिखी गई थी, ताकि दर्शकों को लगे कि वे संघर्ष से उठकर यहां तक पहुंचे हैं। इसमें उनके उस ‘जुझारू व्यक्तित्व’ की झलक दिखाने की कोशिश की गई थी, जिसके बदौलत दस साल बाद राजनीति में उनकी राह तैयार हुई।
आज ट्रंप की तस्वीर बिल्कुल अलग है। अब वे कभी हार मानने को तैयार नहीं। 2020 के चुनाव में साफ हार के बावजूद वे जीत का ऐलान करते रहे। इतनी बार दोहराया कि उनके समर्थक इसे सच मानने लगे। दोहराव की ताकत वे अच्छी तरह जानते हैं।
ट्रंप के पहले टर्म में नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर रहे जॉन बोल्टन कहते हैं कि उनके लिए दुनिया विजेताओं और हारने वालों में बंटी हुई है। और वे हमेशा उस दुनिया में खुद को विजेता ही मानते हैं।
ट्रंप की इस आदत के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उनके प्रमुख टैरिफ को रद्द कर दिया तो उन्होंने कहा कि कोर्ट के फैसले के आसपास काम करके आयात करों को और भी ताकतवर और सख्त तरीके से इस्तेमाल करेंगे।
उनके जस्टिस डिपार्टमेंट ने कुछ कोर्ट रूलिंग्स के खिलाफ अपील करना बंद कर दिया था, जो बड़े लॉ फर्म्स पर एक्जीक्यूटिव ऑर्डर्स से जुड़े थे। लेकिन जब मीडिया में इसे हार के रूप में दिखाया गया तो उन्होंने रुख बदल दिया और कानूनी लड़ाई फिर से शुरू कर दी।
ट्रंप के बेटे एरिक ने कहा कि उनके पिता को कभी ‘विजेता’ की छवि दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि वे खुद जीत की परिभाषा हैं। उनके व्यापार और कामों को देखकर ये साफ होता है।
अभी हाल में ईरान के साथ हुए संघर्ष में भी यही देखने को मिला। ट्रंप ने कुछ ही दिनों में जीत का ऐलान कर दिया। उन्होंने इसे बार-बार दोहराया, भले ही तेहरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमले जारी रखे और होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया जिससे पूरी दुनिया में आर्थिक तबियत गड़बड़ा गई। अब जब युद्धविराम हो गया है तो ट्रंप कह रहे हैं कि अमेरिका ने अपने मकसद पूरे कर लिए। लेकिन हकीकत इस दावे से मुंह मोड़ लेती है।
बोल्टन फिर कहते हैं कि चाहे स्थिति अच्छी हो या खराब, ट्रंप जीत घोषित करने से नहीं रुकते। ये उनकी सोच में रचा-बसा है।
ट्रंप के पहले टर्म में डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी रही सारा मैथ्यूज ने जनवरी 6, 2021 को कैपिटल पर हमले के बाद इस्तीफा दे दिया था। वे कहती हैं कि राष्ट्रपति का अहंकार उन्हें हार मानने नहीं देता। उनके व्हाइट हाउस में मैसेजिंग स्ट्रैटेजी यही थी कि किसी भी हार को कैसे जीत में बदला जाए।
मौजूदा व्हाइट हाउस के प्रवक्ता डेविस इंग्ल कहते हैं कि ट्रंप अमेरिका की बेजोड़ महानता को गर्व से अपने बयानों में दिखाते रहते हैं।
Also Read: Explainer: जेडी वेंस का बिना समझौते किए इस्लामाबाद से वापस लौटने के बाद अब आगे क्या होगा?
ट्रंप की ये आदत उनके शुरुआती कारोबारी दिनों से चली आ रही है। 1973 में संघीय अधिकारियों ने ट्रंप और उनके पिता पर मुकदमा किया था। आरोप था कि ब्रुकलिन और क्वींस में उनके अपार्टमेंट्स किराए पर देते समय नस्ली भेदभाव किया जाता था।
मशहूर वकील रॉय कोहन, जो 1950 के दशक में सीनेटर जो मेकार्थी के ‘रेड स्केयर’ के दौरान चर्चा में आए थे, ने ट्रंप को सलाह दी कि वे पलटवार करें और काउंटर सूट दायर करें।
दो साल बाद दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया। इसमें ट्रंप परिवार को किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव न करने की शर्त रखी गई। ट्रंप ने इसे अपनी जीत बताया क्योंकि इसमें कोई गुनाह कबूल नहीं किया गया था। जबकि जस्टिस डिपार्टमेंट ने इस समझौते को अब तक के सबसे दूरगामी समझौतों में से एक बताया था।
लेखक डेविड के जॉनस्टन, जिन्होंने ‘द मेकिंग ऑफ डॉनल्ड ट्रंप’ किताब लिखी है, कहते हैं कि कोहन ने ट्रंप को सिखाया कि कभी एक कॉमा भी मत छोड़ो। जो पोजीशन ले ली, वही सही है। जो चुनौती दे, वह गलत, घटिया, अयोग्य और मूर्ख है।
सालों में ट्रंप के कई व्यापार घाटे में चले गए। उनके नाम पर कई प्रोडक्ट्स लॉन्च हुए जो फ्लॉप साबित हुए जिसमें स्टेक, बोतलबंद पानी, वोडका, मैगजीन, एयरलाइन, होम मॉर्टगेज और ट्रंप यूनिवर्सिटी जैसे ऑनलाइन क्लासेस आदि शामिल थे।
बारबरा रेस, जो करीब दो दशक तक ट्रंप के साथ काम कर चुकी हैं, याद करती हैं कि वे टॉप एक्जीक्यूटिव्स को आपस में लड़ाते रहते थे ताकि कंपनी में सबसे ताकतवर आवाज हमेशा उनकी ही बनी रहे। घाटे बढ़ते रहने के बावजूद यही तरीका अपनाया। रेस कहती हैं कि ट्रंप के लिए कुछ भी गलत नहीं है अगर वो उनकी मदद कर रहा हो।
सिरैक्यूज यूनिवर्सिटी के टीवी और पॉपुलर कल्चर प्रोफेसर रॉबर्ट थॉम्पसन कहते हैं कि ये सब ‘द अप्रेंटिस’ की सफलता ‘द आर्ट ऑफ द डील’ किताब के घमंड से शुरू हुई थी। 1987 में छपी इस किताब में ट्रंप ने खुद को बड़ा डीलमेकर बताया। मीडिया का ध्यान खींचना और अपनी इमारतों पर नाम लगाना भी उनके स्टाइल का हिस्सा था।
थॉम्पसन के अनुसार, ट्रंप ने खुद को ‘अमेरिकन रिच गाय’ की छवि दी और लोग इसे स्वीकार करते गए। उनके कारोबार के ऊपर-नीचे उतार-चढ़ाव अब ज्यादा मायने नहीं रखते। अटलांटिक सिटी में उनके तीन कैसीनो फेल हो गए, लेकिन 2016 में एसोसिएटेड प्रेस को उन्होंने बताया कि अटलांटिक सिटी उनके लिए अच्छा समय था।
2016 के आयोवा कॉकस में जब ट्रंप, टेड क्रूज से हार गए, तो उन्होंने ट्वीट करके आरोप लगाया कि क्रूज ने ये जीत गैरकानूनी तरीके से “चुरा” ली। बाद में ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव तो जीत गए, लेकिन पॉपुलर वोट में हिलेरी क्लिंटन उनसे आगे रहीं। इस पर ट्रंप ने कहा कि अगर लाखों “अवैध वोट” हटा दिए जाएं, तो असली जीत उनकी ही होती।
डार्टमाउथ कॉलेज के प्रोफेसर रसेल मुइरहेड कहते हैं कि ट्रंप इतने लंबे समय से ये सब कर रहे हैं कि अब वे ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां वे खुद अपनी हकीकत बना लेते हैं।
ट्रंप गोल्फ के मामले में भी अक्सर खुद को विजेता ही बताते हैं। अपने क्लबों में वे कई चैंपियनशिप जीतने का दावा करते रहे हैं और कहते हैं कि वे कभी दूसरे स्थान पर नहीं आए। उन्होंने अपने क्लबों में 38 बार जीत हासिल करने की बात भी कही है।
2018 में वेस्ट पाम बीच के एक टूर्नामेंट में वे खेले ही नहीं, लेकिन बाद में विजेता को हराने का दावा करके खुद को चैंपियन बता दिया। 2023 में भी उन्होंने सीनियर चैंपियनशिप जीतने का दावा किया, जबकि वे पहला राउंड मिस कर चुके थे और पहले खेले गए स्कोर को ही गिन लिया गया था।
जॉनस्टन कहते हैं कि ट्रंप के दिमाग में एक काल्पनिक कहानी चलती रहती है। वे जैसे फिल्म के स्क्रीनराइटर हैं। जब कहानी बदलनी हो तो बस बदल देते हैं।
(एजेंसी के इनपुट के साथ)