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स्वेज नहर के रास्ते मालवाहक जहाजों पर हमले के बढ़ते खतरे से भारत पर असर

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अक्टूबर से ही हूती समूह ने समुद्री जहाजों पर दर्जनों हमले किए हैं और इनमें से ज्यादातर हमले लाल सागर के निचले इलाके और अरब सागर के क्षेत्रों में किए गए हैं।

Last Updated- January 15, 2024 | 11:21 PM IST
Red Sea Crisis:

स्वेज नहर के रास्ते अमेरिका और यूरोप जाने वाले मालवाहक जहाजों पर हमले के बढ़ते खतरे से अब भारत भी अछूता नहीं है। उद्योग के सूत्रों का कहना है कि इसका असर भारतीय मालवाहक जहाजों पर भी पड़ना शुरू हो गया है। फेडरेशन ऑफ फ्रेट फॉरवार्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष दुष्यंत मुलानी ने कहा, ‘पिछले हफ्ते जब अमेरिका और ब्रिटेन ने संयुक्त तौर पर हूती बागियों पर बमबारी शुरू की तब स्थिति थोड़ी स्थिर हो गई थी लेकिन हूती विद्रोहियों ने पिछले कुछ दिनों से हमले बढ़ा दिए हैं।’

‘हम यह उम्मीद कर रहे हैं कि मालवाहक जहाजों के मार्ग में बदलाव किया जा रहा है और जहाज अफ्रीका के आसपास केप ऑफ गुड होप की तरफ से जा रहा है।’ अमेरिका और ब्रिटेन की सेना ने शुक्रवार से ही हूती के जमीनी और समुद्री ठिकानों पर हवाई हमले कर उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया है।

इसके बाद आई रिपोर्ट में हूती के वरिष्ठ नेतृत्वकर्ता के हवाले से कहा गया कि इस समूह ने स्वेज नहर से गुजरने वाले अमेरिकी और ब्रितानी मालवाहक जहाजों को निशाना बनाने का फैसला किया है। अक्टूबर से ही हूती समूह ने समुद्री जहाजों पर दर्जनों हमले किए हैं और इनमें से ज्यादातर हमले लाल सागर के निचले इलाके और अरब सागर के क्षेत्रों में किए गए हैं।

इस समूह की मौजूदगी स्वेज नहर और स्वेज की खाड़ी के दोनों तरफ नहीं है जो मिस्र से जुड़ा हुआ है। लेकिन इस तरह के हमले के बढ़ते खतरे के चलते ज्यादातर मालवाहक जहाज स्वेज नजर के बजाय अफ्रीका के रास्ते लंबी दूरी तय कर रहे हैं।

मुलानी ने कहा, ‘माल ढुलाई की दरों में अंतर, जहाज कंपनी और उसके जलमार्ग के आधार पर भी होता है लेकिन भारत में आने वाले और यहां से जाने वाले जहाज का माल ढुलाई शुल्क पिछले एक हफ्ते में 15-65 प्रतिशत के बीच बढ़ चुका है।’

लाल सागर के संकट का असर, व्यापक तौर पर माल ढुलाई पर पड़ता है। उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘कई जहाज कंपनियों ने तो प्रभावित क्षेत्र से दूर के जलमार्ग के लिए भी शुल्क बढ़ा दिए हैं।’ वैश्विक समुद्री कारोबार का 12 फीसदी कारोबार, लाल सागर के माध्यम से होता है और करीब 40 फीसदी कारोबार एशिया और यूरोप के बीच होता है।

सोमवार को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मिली खबर के मुताबिक कतर ने लाल सागर से एलएनजी टैंकरों को भेजने से मना कर दिया। कतर दुनिया में एलएनजी का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है।

हालांकि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि इस फैसले का असर भारत पर नहीं पड़ेगा क्योंकि एलएनजी फारस की खाड़ी से पश्चिमी घाट के गैस टर्मिनल तक आती है। हालांकि ऐसी उम्मीद है कि एलएनजी को लाने-ले जाने की लागत बढ़ सकती है।

बढ़ेगी आयात लागत

वाणिज्य विभाग ने कहा कि लाल सागर में जहाजों पर बढ़ते खतरे से माल ढुलाई, बीमा प्रीमियम की लागत बढ़ने के साथ ही जहाजों के आने-जाने में भी लंबा वक्त लगेगा जिससे आगे आयातित सामानों पर अधिक प्रभाव पड़ेगा और ये महंगे होंगे।

हालांकि अब तक कंटेनर की उपलब्धता की दिक्कत नहीं आई है क्योंकि ये पर्याप्त मात्रा में खाली हैं। विभाग के अतिरिक्त सचिव एल सत्या श्रीनिवास ने कहा कि 95 फीसदी जहाजों को केप ऑफ गुड होप के मार्ग से भेजा जा रहा है ऐसे में 14-20 दिनों का सफर बढ़ सकता है।

 

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First Published - January 15, 2024 | 11:21 PM IST

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