अमेरिकी सेना ने ऐलान किया है कि वह सोमवार से ईरान के सभी पोर्ट और तटीय इलाकों की नाकाबंदी शुरू करेगी। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का यह कदम ईरान पर दबाव बनाने के लिए है, जिससे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं और युद्ध फिर भड़क सकता है। इस ऐलान के बाद टकराव की स्थिति बन गई है, क्योंकि ईरान ने तुरंत जवाब देते हुए फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के सभी पोर्ट को खतरे में डालने की धमकी दी।
ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कहा कि फारस की खाड़ी और ओमान सागर की सुरक्षा या तो सभी के लिए होगी या किसी के लिए नहीं। इस क्षेत्र का कोई भी पोर्ट सुरक्षित नहीं रहेगा।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि नाकेबंदी सोमवार सुबह 10 बजे (अमेरिका समय) यानी ईरान में शाम 5:30 बजे से लागू होगी। यह सभी देशों के जहाजों पर लागू होगी, जो ईरान के पोर्ट और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे या वहां से निकलेंगे। इसमें फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के सभी ईरानी पोर्ट शामिल हैं।
हालांकि, CENTCOM ने यह भी कहा कि जो जहाज ईरान के अलावा अन्य पोर्ट के बीच यात्रा कर रहे हैं, उन्हें जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति होगी। यह ट्रंप के पहले के पूरे जलडमरूमध्य को बंद करने के बयान से थोड़ा नरम रुख है।
नाकाबंदी के ऐलान के बाद युद्धविराम के बाद शुरू हुई सीमित जहाज आवाजाही फिर रुक गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, युद्धविराम के बाद करीब 40 जहाज जलडमरूमध्य से गुजरे, जबकि युद्ध से पहले रोजाना 100 से 135 जहाज गुजरते थे।
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यह कदम अमेरिका-ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई लंबी बातचीत के बिना किसी समझौते के खत्म होने के बाद उठाया गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि बातचीत इसलिए रुक गई क्योंकि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने की अमेरिकी शर्त मानने से इनकार कर दिया।
ईरान ने मांग की है कि अमेरिका-इजराइल हमलों से हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए और उसके फ्रीज अकाउंट्स जारी किए जाए। रविवार को ट्रंप ने इस मुद्दे पर पोप लियो XIV की भी आलोचना की, जिन्होंने युद्ध की निंदा करते हुए शांति वार्ता की मांग की थी। इस नाकेबंदी का मकसद ईरान पर दबाव बढ़ाना है, जो युद्ध शुरू होने के बाद भी बड़ी मात्रा में तेल निर्यात कर रहा है। इसमें कई ऐसे जहाज शामिल हैं जो ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके चलते हैं।
ट्रंप का मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण को भी कमजोर करना है। यह वही रास्ता है, जहां से युद्ध से पहले दुनिया के 20% तेल का व्यापार होता था। यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों में और अस्थिरता ला सकता है।
नाकेबंदी की घोषणा के बाद शुरुआती कारोबार में तेल की कीमतों में तेज बढ़त देखी गई। अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत 8% बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल हो गई, जबकि ब्रेंट क्रूड 7% बढ़कर 102.29 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड करीब 70 डॉलर प्रति बैरल था।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने बीबीसी रेडियो से कहा कि ब्रिटेन ईरानी पोर्ट की अमेरिकी नाकाबंदी में शामिल नहीं होगा और वह “इस युद्ध में नहीं खिंच रहा है।” उन्होंने कहा कि ब्रिटेन का ध्यान प्रमुख समुद्री मार्ग को फिर से खोलने पर है और लड़ाई खत्म होने के बाद वह माइन हटाने में मदद कर सकता है।
ईरान के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी। सैन्य सलाहकार और पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर मोहसिन रेजाई ने कहा कि ईरान के पास होर्मुज़ नाकाबंदी का जवाब देने के लिए “कई बड़े विकल्प” हैं। उन्होंने कहा कि ईरान “ट्वीट्स और काल्पनिक योजनाओं” से दबाव में नहीं आएगा।
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर कालीबाफ ने ट्रंप को संदेश देते हुए कहा, “अगर आप लड़ेंगे, तो हम भी लड़ेंगे।” ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कहा कि जलडमरूमध्य अभी भी ईरान के “पूरी तरह नियंत्रण” में है और गैर-सैन्य जहाजों के लिए खुला है, लेकिन सैन्य जहाजों को “कड़ा जवाब” दिया जाएगा।
बीते हफ्ते पाकिस्तान में 21 घंटे चली बातचीत के दौरान अमेरिकी सेना ने कहा कि उसके दो युद्धपोत जलडमरूमध्य से गुजरे, ताकि माइन हटाने का काम शुरू किया जा सके, हालांकि ईरान ने इससे इनकार किया। रविवार को खत्म हुई ये आमने-सामने की बातचीत 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सबसे उच्च स्तर की बातचीत थी।
ट्रंप ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम बातचीत विफल होने का मुख्य कारण है। उन्होंने फॉक्स न्यूज से कहा कि अगर ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ा, तो अमेरिका नागरिक ढांचे पर भी हमला कर सकता है। उन्होंने कहा, “आधे दिन में उनके पास एक भी पुल या बिजली संयंत्र नहीं बचेगा और वे फिर पाषाण युग में पहुंच जाएंगे।”
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि वॉशिंगटन को “स्पष्ट आश्वासन चाहिए कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।” एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि ईरान अमेरिकी “रेड लाइन्स” को मानने को तैयार नहीं था। इन शर्तों में परमाणु हथियार न बनाना, यूरेनियम संवर्धन बंद करना, प्रमुख परमाणु संयंत्रों को खत्म करना और अपने संवर्धित यूरेनियम को सौंपना शामिल था। इसके अलावा होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलना और हमास, हिज़्बुल्लाह व हूती विद्रोहियों को फंडिंग बंद करना भी शर्तों में शामिल था।
ईरान के अधिकारियों ने कहा कि बातचीत 2-3 बड़े मुद्दों पर अटक गई और इसके लिए उन्होंने अमेरिका की “ज्यादा मांगों” को जिम्मेदार ठहराया। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि समझौता लगभग होने ही वाला था, लेकिन अमेरिका की वजह से बातचीत विफल हो गई।
उन्होंने कहा, “हमें अधिकतम दबाव, बदलती शर्तें और नाकाबंदी का सामना करना पड़ा।” अभी तक न तो ईरान और न ही अमेरिका ने बताया है कि 22 अप्रैल को युद्धविराम खत्म होने के बाद क्या होगा। ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस संघर्ष का मुख्य कारण रहा है, जो 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने से पहले भी तनाव का कारण था।
इस युद्ध में अब तक ईरान में कम से कम 3,000, लेबनान में 2,055, इजराइल में 23 और खाड़ी देशों में एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। कई देशों में बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। ईरान लंबे समय से परमाणु हथियार बनाने से इनकार करता रहा है, लेकिन वह नागरिक परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की बात करता है।
2015 का परमाणु समझौता, जिससे ट्रंप ने अमेरिका को बाहर निकाल लिया था, एक साल से ज्यादा की बातचीत के बाद हुआ था। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम अभी हथियार स्तर का नहीं है, लेकिन वह वहां तक पहुंचने से ज्यादा दूर भी नहीं है।