facebookmetapixel
Advertisement
राज्य की प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति की सीमाएं testtestभारत का डिफेंस प्रोडक्शन ऑल-टाइम हाई पर, FY26 में15.6% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ पर पहुंचाHCL Tech के नतीजों की तारीख तय, 13 जुलाई को आएगा रिपोर्ट कार्ड; डिविडेंड पर भी होगा फैसलारिटर्न कहीं और, निवेश कहीं और! क्या सही फंड चुन रहे हैं निवेशक? एक्सपर्ट से समझेंAI के दम पर नई छलांग की तैयारी में Coforge? शेयर में 50% तक तेजी की उम्मीद, एक्सपर्ट्स बुलिशकच्चा तेल सस्ता हो रहा है, फिर पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं?20 लाख रुपये से ज्यादा पैकेज वाली नौकरियों में उछाल, ब्रोकरेज ने बताए 4 पसंदीदा IT स्टॉक्सJio IPO का इंतजार खत्म! ₹4 अरब के मेगा IPO की तैयारी तेज, जल्द दाखिल होंगे ड्राफ्ट पेपरसरकार के आदेश के खिलाफ Telegram का पलटवार, Delhi HC पहुंची याचिकाब्राजील में पेट्रोल से 70% सस्ता, भारत में सिर्फ 20%: क्या फ्लेक्स-फ्यूल बनेगा हिट? बता रहे एक्सपर्ट

Explainer: शांतिवाद से सैन्य ताकत की ओर, जापान ने तोड़ी 80 साल पुरानी कसम; क्या बदल जाएगी वैश्विक रणनीति

Advertisement

80 साल पुराना शांति का संकल्प तोड़कर जापान अब दूसरे देशों को घातक हथियार बेचेगा। ताकाइची के इस फैसले से दुनिया की भू-राजनीति पूरी तरह बदल जाने की संभावना जताई जा रही है

Last Updated- April 24, 2026 | 3:33 PM IST
Japan Self-Defense Forces
जापानी सेल्फ डिफेंस फोर्स के जवान | फोटो क्रेडिट: X/@ModJapan_en

‘उगते सूरज के देश’ जापान से एक ऐसी खबर आई है, जिसने 80 साल पुराने उस ‘शांति के संकल्प’ की नींव हिला दी, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लिया गया था। दशकों तक जापान ने जिस विचार से तौबा कर रखा था, आज उसी ने अपनी म्यान से वापस तलवार बाहर निकाल ली है। प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के एक ऐतिहासिक फैसले ने जापान को वापस अब दुनिया के ‘हथियार’ की रेस में लाकर खड़ा कर दिया है। 

जापान के संविधान के अनुच्छेद 9 में साफ लिखा गया था कि उसका देश कभी युद्ध नहीं करेगा और न ही युद्ध की क्षमता रखने वाली सेना बनाएगा और खतरनाक हथियार बेचेगा। लेकिन 2026 के इस दौर में जापान ने अपनी उसी पहचान को पीछे छोड़ते हुए एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरी दुनिया, खासकर एशिया की भू-राजनीति में चर्चा छेड़ दी है। ताकाइची की सरकार ने दशकों पुराने उस प्रतिबंध को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जो जापान को घातक हथियारों के निर्यात से रोकता था।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि जापान की आत्मा का एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है। अब टोक्यो केवल रडार या निगरानी उपकरण नहीं, बल्कि फाइटर जेट्स, घातक मिसाइलें और जंगी जहाज भी दुनिया के बाजारों में बेचेगा। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में जापान अब केवल अमेरिका के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठने को तैयार नहीं है।

रणनीतिक यू-टर्न: क्या यह शांतिवाद का अंत है?

जापान की इस नई नीति को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है। कई दशकों तक जापान का रक्षा निर्यात सिर्फ पांच तरह की चीजों तक सीमित था, जैसे बचाव, ट्रांसपोर्ट, निगरानी, चेतावनी और माइन हटाने से जुड़ा काम आदि-इत्यादि। लेकिन ताकाइची सरकार के इस फैसले ने इन पुरानी सीमाओं को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब जापान उन 17 देशों को घातक हथियार भी बेच सकेगा, जिनके साथ उसके रक्षा समझौते हैं। इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

प्रधानमंत्री ताकाइची ने इस बदलाव को ‘मजबूरी’ और ‘जरूरत’ का नाम दिया है। उनका तर्क है कि आज के दौर में कोई भी देश अकेले अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता। लेकिन आलोचक इसे जापान के ‘सैन्यीकरण’ की वापसी मान रहे हैं। यह बदलाव इसलिए बड़ा है क्योंकि यह जापान की उस छवि को बदल देता है जो उसने पिछले 80 सालों में बनाई थी। अब जापान एक ‘शांतिप्रिय राष्ट्र’ के साथ-साथ एक ‘सैन्य निर्यातक’ की भूमिका में भी नजर आएगा। हालांकि, सरकार का कहना है कि वे अभी भी शांति के सिद्धांतों पर कायम हैं और हथियार केवल उन्हीं को दिए जाएंगे जो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का पालन करते हैं, लेकिन ‘घातक’ हथियारों की मंजूरी अपने आप में एक बहुत बड़ी लकीर खींचती है।

Also Read: भारत-जापान ने शुरू किया AI संवाद, दोनों देशों के तकनीक और सुरक्षा सहयोग को मिलेगी नई रफ्तार

इंडो-पैसिफिक का तनाव और ‘ड्रैगन’ की चुनौती

डिफेंस एक्सपर्ट की नजर में इस पूरे फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण चीन है। ‘चाइनाज वॉर क्लाउड्स: द ग्रेट चाइनीज चेकमेट’ के लेखक और ग्लोबल स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस न्यूज के एडिटर लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी (रिटायर्ड) कहते हैं, “बीजिंग की तेजी से बढ़ती सैन्य ताकत और दक्षिण चीन सागर से लेकर पूर्वी चीन सागर तक उसका आक्रामक रुख टोक्यो के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गया है। जापान के लिए सेनकाकू द्वीप का विवाद अब सिर्फ जमीन का मामला नहीं रहा, बल्कि यह सीधे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ गया है। वहीं चीन जिस तरह ताइवान पर दबाव बना रहा है, उसने जापान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगर भविष्य में ताइवान पर हमला होता है, तो उसका असर जापान पर भी पड़ेगा।”

चीन ने भी इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि यह फैसला जापान के ‘अंधाधुंध सैन्यीकरण’ को दिखाता है। लेकिन जापान का नजरिया अलग है। जापान को लगता है कि चीन की परमाणु शक्ति और उसकी नौसेना का विस्तार एक ऐसा खतरा है जिससे निपटने के लिए उसे अपने मित्र देशों को मजबूत करना ही होगा। इसी सोच ने जापान को फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के करीब ला दिया है। पहली बार जापान के सैनिक फिलीपींस में युद्धक भूमिका में नजर आ रहे हैं, जो यह बताता है कि टोक्यो अब केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से सक्रिय होने की तैयारी कर चुका है। उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण और रूस के साथ कुरील द्वीपों का विवाद भी इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।

रक्षा बजट में भी ऐतिहासिक बदलाव

ORF की रिपोेर्ट के मुताबिक, जापान ने वित्त वर्ष 2026 के लिए 8.9 ट्रिलियन येन यानी करीब 58 अरब डॉलर का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा बजट मंजूर किया था। यह लगातार 12वां साल था, जब टोक्यो ने अपना सैन्य खर्च बढ़ाया। प्रधानमंत्री ताकाइची ने इस वित्त वर्ष यानि FY27 में रक्षा बजट को GDP के 2% तक ले जाने की बात कही है, जो साफ दिखाता है कि जापान अपनी रक्षा प्राथमिकताओं को बदल रहा है। पहले कई दशकों तक जापान अपना रक्षा खर्च GDP के 1% के अंदर ही रखता था। लेकिन अब चीन और उत्तर कोरिया से बढ़ते तनाव को देखते हुए वह लगातार बजट बढ़ा रहा है। 

SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक जापान अब दुनिया के सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाले टॉप 10 देशों में शामिल है, अक्सर 9वें स्थान के आसपास रहता है। SIPRI का एनालिसिस बताता है कि जापान अब सिर्फ रक्षात्मक नीति तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि जवाबी हमले की क्षमता विकसित करने, हाइपरसोनिक मिसाइलें बनाने और आधुनिक युद्धपोत तैयार करने पर भी जोर दे रहा है, जिसके चलते रक्षा बजट में भी लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

जापान का डिफेंस बेस: क्या मंदी से उबरेगा उद्योग?

एक और बड़ा सवाल यह है कि क्या इस फैसले से जापान की अपनी कंपनियों को फायदा होगा? सोढ़ी कहते हैं, “सच तो यह है कि जापान का रक्षा उद्योग लंबे समय से दम तोड़ रहा था। जापानी कंपनियां बेहतरीन तकनीक तो बनाती थीं, लेकिन उनके पास खरीदार केवल जापान की अपनी ‘सेल्फ डिफेंस फोर्स’ थी। कम मांग के कारण हथियारों की लागत बहुत ज्यादा आती थी और इनोवेशन की रफ्तार धीमी थी।”

अब, निर्यात की मंजूरी मिलने से इन कंपनियों के लिए पूरी दुनिया का बाजार खुल गया है। बीत दिनों ऑस्ट्रेलिया के साथ हुआ 7 अरब डॉलर का युद्धपोत सौदा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब जापान की कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियार बेचेंगी, तो उनके पास रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए ज्यादा पैसा होगा। इससे जापान का ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस’ न केवल मजबूत होगा, बल्कि उसे नई संजीवनी मिलेगी। यह जापान को एक ऐसी स्थिति में ले जाएगा जहां वह अपनी रक्षा जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद एक सप्लायर बन सकेगा।

Also Read: GLP-1 दवाओं का बढ़ा क्रेज: चीन और जापान में अरबों का निवेश, भारत में कीमत बनी बड़ी चुनौती

वैश्विक हथियार बाजार का नया खिलाड़ी

क्या जापान अब अमेरिका, रूस या फ्रांस की तरह एक प्रमुख हथियार निर्यातक बन सकता है? सोढ़ी दावा कहते हैं कि इस राह में तकनीक जापान का सबसे मजबूत पक्ष है। जापान की इलेक्ट्रॉनिक्स, रडार सिस्टम और मैरीटाइम तकनीक दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। हालांकि, जापान को ग्लोबल मार्केट में पैर जमाने में समय लगेगा क्योंकि पहले से मौजूद प्लेयर्स के पास दशकों का अनुभव और सर्विस नेटवर्क है।

सोढ़ी समझाते हैं, “जापान का एक फायदा यह है कि उसकी छवि एक विश्वसनीय और बेहतर तकनीक वाले देश की है। कई देश जो चीनी हथियारों पर भरोसा नहीं करते और अमेरिकी हथियारों की शर्तों से बचना चाहते हैं, उनके लिए जापान एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरेगा। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश पहले से ही जापान की तकनीक में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अगर जापान अपने लड़ाकू विमानों और पनडुब्बियों की मार्केटिंग सही ढंग से करता है, तो अगले एक दशक में वह दुनिया के टॉप रक्षा निर्यातकों की सूची में शामिल हो सकता है।”

एशिया में हथियारों की होड़ और असुरक्षा का खतरा

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जापान के इस कदम ने एशिया में ‘हथियारों की होड़’ शुरू होने का डर पैदा कर दिया है। सोढ़ी कहते हैं कि जब जापान जैसा देश, जिसने 80 साल तक शांति की वकालत की, अपनी सेना को आधुनिक बना रहा है और हथियार बेच रहा है, तो इसका असर पड़ोसी देशों पर पड़ना तय है। चीन इसे अपनी घेराबंदी के रूप में देख सकता है और वह अपनी सैन्य गतिविधियों को और तेज कर सकता है।

साथ ही उत्तर कोरिया जैसे देश भी उकसावे की कार्रवाई मानकर और ज्यादाृा मिसाइल परीक्षण कर सकते हैं। दक्षिण कोरिया के साथ जापान के ऐतिहासिक घाव अभी भरे नहीं हैं, इसलिए सियोल में भी इसे लेकर एक अनकही बेचैनी है। जानकारों का मानना है कि इससे क्षेत्र में एक ‘सुरक्षा दुविधा’ (Security Dilemma) पैदा हो सकती है, जहां एक देश की सुरक्षा की तैयारी दूसरे देश के लिए असुरक्षा का कारण बन जाती है। ऐसे में तनाव कम होने के बजाय और बढ़ सकता है।

Also Read: होर्मुज के लिए ट्रंप ने मांगी मदद, ब्रिटेन-जापान-ऑस्ट्रेलिया ने भेजने से मना किए युद्धपोत

भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग और बढ़ेगा?

भारत के नजरिए से जापान का यह फैसला एक बड़े मौके की तरह साबित हो सकता है। भारत और जापान के रिश्ते ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक और ग्लोबल पार्टनरशिप’ के स्तर पर हैं। दोनों ही देश चीन की विस्तारवादी नीति से परेशान हैं। अब तक जापान की संवैधानिक पाबंदियां भारत और जापान के बीच रक्षा व्यापार में सबसे बड़ी बाधा थीं। हम जानते हैं कि कैसे ‘यू-एस 2’ (US-2) एम्फीबियन एयरक्राफ्ट का सौदा सालों तक चर्चाओं में रहने के बाद भी परवान नहीं चढ़ सका था।

सोढ़ी बताते हैं कि लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। भारत और जापान ‘यूनिकॉर्न’ रडार को मिलकर बनाने और विकसित करने पर गंभीरता से काम कर रहे हैं, जिसे युद्धपोतों के लिए बेहद अहम और आधुनिक तकनीक माना जाता है। जापान की नई नीति के बाद भारत के लिए रास्ते और खुल सकते हैं, यानी अब वह सिर्फ रडार ही नहीं, बल्कि पनडुब्बी तकनीक और एडवांस मिसाइल सिस्टम भी जापान से हासिल करने की दिशा में बढ़ सकता है।

इसके अलावा ‘मेक इन इंडिया’ पहल के लिहाज से भी जापान एक मजबूत और भरोसेमंद साझेदार बन सकता है, जो सिर्फ उपकरण बेचने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि तकनीक ट्रांसफर करने के लिए भी तैयार हो सकता है, क्योंकि दोनों देशों के हित काफी हद तक एक जैसे हैं।

घरेलू राजनीति और संविधान का पेच

जापान के भीतर भी सब कुछ इतना आसान नहीं है। प्रधानमंत्री ताकाइची भले ही एक ‘हॉक’ (सख्त नेता) के रूप में उभरी हैं, लेकिन जापान की जनता का एक बड़ा हिस्सा अभी भी शांतिवादी संविधान से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। जापान में शांतिवाद केवल एक नीति नहीं, बल्कि उसकी पहचान का हिस्सा है। अनुच्छेद 9 में संशोधन की बात करना जापान में आज भी एक संवेदनशील मुद्दा है।

सोढ़ी बताते हैं कि विपक्ष और कई नागरिक संगठन इस फैसले का अभी से विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि घातक हथियारों का निर्यात जापान को अनचाहे विवादों में घसीट सकता है।

इसके साथ ही बीते दिनों ताकाइची का ‘यासुकुनी मंदिर’ जाना और वहां भेंट चढ़ाना भी घरेलू राजनीति में ध्रुवीकरण पैदा कर रहा है। आने वाले समय में, अगर जापान द्वारा बेचा गया कोई हथियार किसी विवादित युद्ध में इस्तेमाल होता है, तो ताकाइची सरकार को भारी राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है। जापान की जनता यह सवाल जरूर पूछेगी कि क्या आर्थिक लाभ के लिए अपनी ‘शांतिवादी साख’ को दांव पर लगाना सही है?

सोढ़ी के मुताबिक, जापान आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ उसका गौरवशाली शांतिवादी इतिहास है और दूसरी तरफ भविष्य की कठोर वास्तविकताओं से निपटने की चुनौती। यह फैसला केवल व्यापार का नहीं, बल्कि इस बात का है कि जापान दुनिया में अपनी भूमिका को किस तरह देखता है। क्या वह केवल एक मूकदर्शक बना रहना चाहता है या एक ऐसी शक्ति बनना चाहता है जो अपने और अपने सहयोगियों के हितों की रक्षा के लिए हथियार उठाने और बांटने की हिम्मत रखती है? लेकिन जापान ने अपना नया रास्ता चुन लिया है, और अब इसकी गूंज भविष्य में पूरे इंडो-पैसिफिक में सुनाई दे सकती है।

Advertisement
First Published - April 21, 2026 | 8:25 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement