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सुलभ होगा उपचार, बहुराष्ट्रीय फार्मास्युटिकल को मिलेगी धार

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कैंसर और दुर्लभ बीमारियों की महंगी दवाओं पर सीमा शुल्क छूट से मरीजों को राहत, कंपनियों की मांग को सहारा

Last Updated- February 03, 2026 | 9:57 AM IST
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कैंसर की महंगी 17 दवाओं और 7 दुर्लभ बीमारियों के इलाज पर सीमा शुल्क की छूट से देश में कुछ सबसे महंगे इलाज ज्यादा सुलभ होने की उम्मीद है। साथ ही उन वैश्विक और घरेलू दवा विनिर्माताओं को मांग में भी मदद मिलेगी, जिनके पोर्टफोलियो में अधिकतर आयातित दवाएं होती हैं। 5 से 10 प्रतिशत की सीमा शुल्क दर को तुरंत खत्म करने से विनिर्माताओं और वितरकों के लिए आयातित लागत कम हो जाएगी। इससे उन मरीजों को कीमतों में थोड़ी लेकिन सार्थक राहत मिलेगी, जो मोटे तौर पर जेब से पैसे देते हैं।

कंपनी के लिहाज से किसे मिलेगा फायदा?

यह कदम उन बहुराष्ट्रीय नवप्रवर्तकों के लिए सकारात्मक है, जिनका भारत में ऑन्कोलॉजी और दुर्लभ बीमारियों के इलाज में दबदबा है। नोवार्टिस को रिबोसिस्लिब (किस्कली /क्रिजाना) के शुल्क मुक्त आयात से फायदा होगा, जो हार्मोन रिसेप्टर-पॉजिटिव ब्रेस्ट कैंसर में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला सीडीके4/6 इनहिबिटर है। इसी तरह इलाई लिली को एबेमासिस्लिब (वर्जेनियो/रैमिवेन) से फायदा होगा, जो उसी तरह के लक्षणों में एक अन्य आधार है। एस्ट्राजेनेका को ट्रेमेलिमुमैब (इम्जुडो) से लाभ होगा, जिसका उपयोग लिवर के गंभीर कैंसर के इलाज में किया जाता है, जबकि रोश से जुड़े पोर्टफोलियो को क्रोनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया की वेनेटोक्लाक्स से लाभ मिलेगा।

इस सूची में शामिल दवाओं वाली अन्य वैश्विक कंपनियों में ऐबवी (आईब्रुटिनिब), ब्लूप्रिंट मेडिसिन्स/एरियाड (पोनैटिनिब), बेयर (डारोलुटामाइड) और ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब (आईपिलिमुमैब) शामिल हैं। साथ ही इसमें कई इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर भी शामिल हैं, जो मुख्य रूप से आयात किए जाते हैं। सीमा शुल्क हटाने से कंपनियां कीमतों को नरम कर सकती हैं या फिर अस्पताल की निविदाओं और सहायता कार्यक्रमों जरिये रोगियों की पहुंच बढ़ाते हुए कीमतें स्थिर रख सकती हैं। ये दोनों ही बिक्री के लिए सहायक हैं।

दुर्लभ बीमारियों वाली श्रेणी में एल्नीलम फार्मास्युटिकल्स को प्राइमरी हाइपरोक्सालुरिया टाइप 1 के लिए लुमासिरेन (ओक्सुमो) पर छूट से फायदा होगा, जबकि हेरेडिटरी एंजियोएडेमा के लिए सी1 एस्टरेज इनहिबिटर की विनिर्माता और प्राइमरी इम्यूनोडिफिशिएंसी डिसऑर्डर (पीआईडीडी) के लिए इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन (आईवीआईजी) के आपूर्तिकर्ताओं को किफायत बढ़ने से स्थिर मांग देखने को मिल सकती है।

मरीजों के लिए इसका मतलब?

मरीजों के लिए इसका तत्काल प्रभाव यह होगा कि उन उपचारों की अंतिम लागत में कमी आएगी, जो अक्सर हर माह लाखों रुपये में होती हैं। ब्रेस्ट कैंसर में रोग नियंत्रण के लिए लंबे समय तक इस्तेमाल किए जाने वाले सीडीके 4/6 इनहिबिटर जैसे कि रिबोसिस्लिब और एबेमासिस्लिब की कीमत में मामूली कमी आने की उम्मीद है, जिससे इलाज जारी रखना आसान हो जाएगा। ट्रेमेलिमुमैब जैसी अधिक कीमत वाली इम्यूनोथेरेपी, जिसकी कीमत कई लाख रुपये प्रति वायल हो सकती है, लगातार सुलभ होती जाएगी, खास तौर पर उन निजी अस्पतालों में जहां आयात की लागत सीधे मरीजों पर डाल दी जाती है।

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First Published - February 3, 2026 | 9:57 AM IST

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