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UP-बिहार में तेजी से घटी प्रजनन दर, बाल विवाह में कमी और बालिका शिक्षा से सुधरे हालात: NFHS 6

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उत्तर प्रदेश में प्रजनन दर एनएफएचएस-5 में 2.4 बच्चे प्रति महिला से घटकर एनएफएचएस-6 में 2.2 हो गई वहीं, बिहार की प्रजनन दर 2019-21 में 3.0 से घटकर 2.7 हो गई

Last Updated- June 06, 2026 | 10:02 AM IST
fertility rate
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

देश के राज्यों में प्रजनन स्तर के लिहाज से समानता दिखनी शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े उत्तरी राज्यों में प्रजनन दर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। यहां यह राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंच गई है। वहीं, दक्षिणी राज्यों में कोविड-19 महामारी के बाद जन्म दर अब स्थिर हो गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) प्रति महिला 2 बच्चों पर स्थिर रही ( जो वर्ष 2019-21 के एनएफएचएस 5 के बराबर है) मगर यह प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे रही।

हालांकि, राज्यवार विश्लेषण से पता चलता है कि अधिकांश राज्य अब प्रति महिला 2 बच्चों के राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंच रहे हैं। मिसाल के तौर पर मेघालय में टीएफआर में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है। टीएफआर किसी महिला के प्रजनन काल के दौरान होने वाले शिशुओं की औसत संख्या की गणना करता है।

मेघालय में प्रजनन दर 2019-21 में 2.7 से घट कर वर्ष  2023-24 में 2.2 बच्चे प्रति महिला रह गई जो राष्ट्रीय औसत के करीब है।

बड़े राज्यों में बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रजनन दर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। उत्तर प्रदेश में प्रजनन दर एनएफएचएस-5 में 2.4 बच्चे प्रति महिला से घटकर एनएफएचएस-6 में 2.2 हो गई वहीं, बिहार की प्रजनन दर 2019-21 में 3.0 से घटकर 2.7 हो गई। हालांकि, मेघालय में जो रुझान देखने को मिले हैं वे पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में दोहराए गए हैं। एनएफएचएस-6 के आंकड़ों के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश, असम और मिजोरम में एनएफएचएस-5 के आंकड़ों की तुलना में प्रति महिला बच्चों की संख्या में 0.3 की शुद्ध गिरावट आई है।

इसी तरह, सिक्किम में प्रति महिला 1 बच्चे की दर के साथ सबसे कम प्रजनन दर दर्ज की गई जबकि त्रिपुरा की प्रजनन दर 1.7 पर स्थिर रही। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वोत्तर राज्यों में ये बदलाव संभवतः इस क्षेत्र में चल रहे व्यापक जनसांख्यिकीय और स्वास्थ्य संबंधी बदलाव की तरफ इशारा करते हैं।

इंदिरा आईवीएफ हॉस्पिटल्स के सीईओ और पूर्णकालिक निदेशक क्षितिज मुर्डिया ने कहा,‘एनएफएचएस-6 के निष्कर्षों से किशोर गर्भावस्था और बाल विवाह में बड़ी कमी के साथ-साथ संस्थागत प्रसव, कुशल प्रसव सहायता और टीकाकरण अभियान जैसे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल संकेतकों में सुधार भी सामने आया है।’

गुवाहाटी स्थित एक स्त्री रोग विशेषज्ञ ने बताया कि इन राज्यों में परिवार नियोजन विधियों को अपनाने की गति तेज हुई है जिससे गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल की दर राष्ट्रीय स्तर पर 66.7 प्रतिशत से बढ़कर 69.1 प्रतिशत हो गई है। उन्होंने कहा कि युवाओं के अन्य राज्यों में पलायन और पूर्वोत्तर राज्यों में बालिका शिक्षा का स्तर बढ़ने से भी युवा दंपतियों का परिवार नियोजन की तरफ झुकाव बढ़ा है।

दूसरी तरफ अधिकांश दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर में या तो मामूली वृद्धि हुई है या एनएफएचएस-5 के आंकड़ों की तुलना में स्थिर रही है। तेलंगाना में एनएफएचएस-6 में प्रति महिला कुल प्रजनन दर 1.9 बच्चे दर्ज की गई है जो एनएफएचएस-5 में 1.8 थी।

इसी तरह, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी एनएफएचएस-6 तक कुल प्रजनन दर बढ़कर 1.8 हो गई है जबकि एनएफएचएस-5 में यह 1.7 थी। केरल में भी एनएफएचएस-4 (2015-16) में 1.6 से बढ़कर कुल प्रजनन दर 1.8 हो गई है। यह रुझान ऐसे समय में आया है जब दक्षिणी राज्यों में कई वर्षों से कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

इस वजह से इन राज्यों के राजनीतिक नेताओं ने दंपतियों से अधिक संतान पैदा करने का आह्वान किया था क्योंकि उन्हें डर था कि कुल प्रजनन दर में गिरावट से राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासनिक प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह नया रुझान दर्शाता है कि ऐसे डर बेबुनियाद हैं। अहमदाबाद स्थित एल जे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस अमिताभ कुंडू ने कहा कि दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर लगभग उस स्तर पर पहुंच गई है जहां से इसमें और गिरावट की गुंजाइश नहीं दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा,‘उत्तरी राज्यों में भी प्रजनन दर में गिरावट के समान रुझान दिख रहे हैं जिससे उत्तर-दक्षिण अंतर खत्म हो सकता है।’

दिल्ली के सी के बिरला अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की निदेशक कीर्ति खेतान ने कहा कि दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर में मामूली वृद्धि हुई है। 

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First Published - June 6, 2026 | 10:02 AM IST

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