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India-EU FTA: यूरोपीय बाजार तक देसी दवा, चिकित्सा उपकरण फर्मों की होगी तरजीही पहुंच

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नए ढांचे के तहत, यूरोपीय संघ 12.8 फीसदी तक के शुल्क को घटाकर शून्य कर देगा, जिससे थोक और विशेष रसायनों के व्यापार में वृद्धि होने की उम्मीद है

Last Updated- January 27, 2026 | 10:24 PM IST
Pharma

यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा भारतीय रसायनों के निर्यात के 97.5 फीसदी हिस्से पर टैरिफ घटाकर शून्य करने की पेशकश से भारत की दवा और चिकित्सा उपकरण कंपनियों को यूरोपीय बाजारों में तरजीही पहुंच मिलने की संभावना है। नए ढांचे के तहत, यूरोपीय संघ 12.8 फीसदी तक के शुल्क को घटाकर शून्य कर देगा, जिससे थोक और विशेष रसायनों के व्यापार में वृद्धि होने की उम्मीद है।

इसी तरह, 90 फीसदी चिकित्सा और शल्य चिकित्सा उपकरणों पर लगने वाला शुल्क 27.5 फीसदी से घटकर शून्य हो जाएगा। इसके फलस्वरूप, यूरोपीय संघ से निर्यात होने वाली दवाओं और रसायनों पर भारतीय टैरिफ मौजूदा 11 फीसदी और 22 फीसदी से घटकर शून्य हो जाएगा।

इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस (एपीआई) के महासचिव सुदर्शन जैन ने कहा, यूरोपीय संघ द्वारा दवाओं पर लगाए गए 11 फीसदी तक के टैरिफ को हटाए जाने से व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और भारतीय रोगियों को नवोन्मेषी दवाओं तक ज्यादा व आसान पहुंच हासिल करने में मदद मिलेगी।

हालांकि भारतीय दवा कंपनियों को पहले से ही यूरोपीय संघ में शून्य शुल्क पर प्रवेश मिलता है, लेकिन यह समझौता यूरोपीय संघ के फार्मा बाजार में तरजीही पहुंच और चिकित्सा उपकरणों के लिए बेहतर प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करेगा।

लगभग शून्य टैरिफ पहुंच से यूरोपीय संघ में भारतीय दवाओं, ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इनग्रेडिएंट्स (एपीआई) और मूल्यवर्धित दवाओं की स्थिति को मजबूती मिलने की भी उम्मीद है।

वित्त वर्ष 2025 में यूरोप को भारत के फार्मा निर्यात का अनुमान करीब 5.8 बिलियन डॉलर था, जो भारत के कुल फार्मास्यूटिकल निर्यात का लगभग 19 से 21 फीसदी था।

उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, जेनेरिक दवा फॉर्मुलेशन और बायोसिमिलर निर्यात का 75 से 80 फीसदी हिस्सा थे, इसके बाद बल्क ड्रग्स (एपीआई) और टीके आते हैं। इसी प्रकार, यह भारतीय जेनेरिक दवा निर्माताओं को यूरोपीय संघ के 2 अरब डॉलर के बायोसिमिलर और कॉम्प्लेक्स जेनेरिक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने का अवसर भी प्रदान करता है।

फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट्स प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फैमएक्ससिल) के अध्यक्ष नमित जोशी ने कहा, यह विकास विशेष रूप से भारत के फार्मा एमएसएमई के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें से कई के पास मजबूत गुणवत्ता क्षमताएं हैं, लेकिन अत्यधिक विनियमित बाजारों में लागत और पहुंच संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आयात शुल्क में कमी, आसान नियामक प्रक्रियाएं और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गहरा सहयोग भारतीय रोगियों के लिए उन्नत उपचारों की लागत को काफी कम कर सकता है।

इबेरिया फार्मास्युटिकल्स के सह-संस्थापक और पूर्णकालिक निदेशक सौरभ ओझा ने कहा, अल्पकालिक रूप से हम कीमतों में 10 से 20 फीसदी की मामूली कमी की उम्मीद करते हैं, लेकिन वास्तविक प्रभाव अगले दो से तीन वर्षों में सामने आएगा, जिसमें स्थानीय उत्पादन बढ़ने, बायोसिमिलर के बाजार में प्रवेश करने और पेटेंट की समय सीमा समाप्त होने के साथ कीमतों में संभावित रूप से 40 से 70 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। 

जोशी ने कहा कि टैरिफ के अलावा, गैर-टैरिफ बाधाओं, नियामक पारदर्शिता और सीमा शुल्क सुविधा पर बेहतर सहयोग से मतभेद और समय-सीमा को कम करके कारोबारी सुगमता में काफी सुधार होगा, जिससे अधिकांश छोटे निर्यातकों को मदद मिलेगी।

इस सौदे पर फार्मा कंपनियों की बाजार प्रतिक्रिया सकारात्मक रही और निफ्टी फार्मा में 0.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। लाभ हासिल करने वाली प्रमुख कंपनियों में जेबी फार्मा और टोरेंट फार्मा (दोनों में 1.7 फीसदी की वृद्धि) शामिल हैं, इसके बाद ग्लेनमार्क (1.6 फीसदी की वृद्धि) और जाइडस लाइफसाइंसेज (1.3 फीसदी की वृद्धि) का स्थान रहा।

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First Published - January 27, 2026 | 10:08 PM IST

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