भारत में वजन काबू रखने का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और उसमें पहले से ज्यादा हलचल है। चाय, पाउडर, सप्लीमेंट और गोलियों के बाद, वजन घटाने वाले इंजेक्शन सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। वजन घटाने वाली दवाओं में सक्रिय घटक सेमाग्लूटाइड का पेटेंट भारत में 20 मार्च को समाप्त हो जाने के बाद, एक दर्जन से अधिक देसी कंपनियां इसके किफायती संस्करण बाजार में उतारने की होड़ में लग गई हैं।
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बाजार अनुसंधान फर्म आईमार्क के अनुसार, भारत का वजन प्रबंधन बाजार 2025 में 27.4 अरब डॉलर का था और उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसका कारण यह है कि देश में लगभग हर चार वयस्कों में से एक मोटापे का शिकार है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के अनुसार, अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त बच्चों की संख्या के मामले में भारत अब दूसरे स्थान पर है। एक और कारण ऐसे विज्ञापन हैं जो वजन घटाने के बारे में झूठे दावे करते हैं। विज्ञापन उद्योग जागरूकता बढ़ाने और बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
मुंबई की क्रिएटिव एजेंसी देंत्सू क्रिएटिव वेबचटनी के मैनेजिंग पार्टनर-नॉर्थ, उज्ज्वल आनंद ने कहा, ‘भारत में वजन घटाने से संबंधित विज्ञापनों के लिए लेखन करना आकांक्षा, असुरक्षा, नियमन और सांस्कृतिक सच्चाई के चौराहे पर है। यह सबसे संवेदनशील श्रेणियों में से एक है।’
सेमाग्लूटाइड के पेटेंट की समय सीमा समाप्त होने से एक सप्ताह पहले, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने फार्मा कंपनियों को कानून द्वारा वजन घटाने वाली प्रतिबंधित प्रिस्क्रिप्शन दवाओं को बढ़ावा देने के खिलाफ चेतावनी जारी करते हुए एक सलाह जारी की।
सीडीएससीओ ने 11 मार्च को जारी एक सलाह में कहा, ‘यह जानकारी मिली है कि कुछ दवा कंपनियां जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट और मोटापे और चयापचय संबंधी विकारों के लिए निर्धारित इसी तरह की दवाओं से संबंधित प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (सरोगेट) प्रचार गतिविधियों में संलग्न हो सकती हैं, जिनमें रोग जागरूकता अभियान, डिजिटल मीडिया आउटरीच और अन्य संचार शामिल हैं।’ जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाओं का एक वर्ग है जिसका उपयोग मधुमेह और मोटापे के इलाज के लिए किया जाता है। औपचारिक सलाह जारी होने से पहले ही चिकित्सा जगत के पेशेवर ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों के प्रभाव के प्रति आगाह कर रहे थे।
दिल्ली के बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. अतुल पीटर्स ने कहा, ‘महज एक साल में ही ये इंजेक्शन किसी ‘जादुई दवा’ की तरह बाजार में छा गए हैं और इनके इस्तेमाल के बारे में आम जनता को अभी भी सीमित जानकारी है। किसी भी विज्ञापन में यह नहीं बताया जाता कि इसके लिए ठोस आहार, व्यायाम और निगरानी की आवश्यकता होती है।’ उन्होंने कहा, ‘लगभग 50 प्रतिशत मरीज, जिन्हें अत्यधिक मोटापे के कारण सर्जरी करानी चाहिए, हमसे ये दवाएं लिखवाने के लिए कह रहे हैं।’
औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 और औषधि नियम, 1945 के तहत नुस्खे वाली दवाओं का प्रचार निषिद्ध है। प्रिंट और टेलीविजन जैसे पारंपरिक मीडिया वजन घटाने के बारे में विशिष्ट दावे करने से परहेज करते हैं, लेकिन डिजिटल और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग प्लेटफॉर्म अक्सर उस अस्पष्ट क्षेत्र का फायदा उठाते हैं जिसे ग्रे एरिया कहा जाता है।
पीटर्स ने कहा, ‘प्रभावित करने का तरीका यह है कि सर्जरी करवा चुके लोग वीडियो बनाकर कह रहे हैं कि उन्होंने बदलाव के लिए एक्स, वाई या जेड इंजेक्शन का इस्तेमाल किया। यह प्रत्यक्ष विज्ञापन नहीं है, लेकिन ये भ्रामक दावे हैं और लोगों को प्रभावित कर सकते हैं।’
इन दवाओं के अनियंत्रित सेवन के दुष्प्रभाव गैस्ट्रोएंटेराइटिस से शुरू हो सकते हैं, जिसमें उल्टी, मतली और पेट दर्द शामिल हैं, और कुछ मामलों में ये गंभीर हो सकते हैं, जिससे अग्न्याशय और आंखों जैसे महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं।
विश्व स्तर पर, लोकप्रिय वजन घटाने वाले इंजेक्शन ओजेम्पिक और वेगोवी बनाने वाली कंपनी नोवो नॉर्डिस्क, उन 1,800 से अधिक मुकदमों का सामना कर रही है जो उन उपयोगकर्ताओं द्वारा दायर किए गए हैं जिन्हें कथित तौर पर दुष्प्रभाव के रूप में पेट का पक्षाघात, उल्टी और यहां तक कि दृष्टि हानि जैसी समस्याएं हुई हैं। संभावित नुकसान 2 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है।
पीटर्स ने कहा, ‘कभी-कभी, दवाएं ऐसे डॉक्टरों द्वारा लिखी जाती हैं जो मोटापे या मधुमेह के मामलों को संभालने के लिए योग्य भी नहीं होते हैं।’
हालांकि ये इंजेक्शन भारतीय बाजार में अभी भी नए हैं, लेकिन वजन घटाने का दावा करने वाले ओवर-द-काउंटर उत्पाद लंबे समय से मौजूद हैं, और साथ ही झूठे दावों को लेकर चिंताएं भी बनी हुई हैं।
भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) की अप्रैल-सितंबर 2025 की छमाही रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में उसके द्वारा निपटाए गए 332 मामलों में से 81.6 प्रतिशत मामले औषधि और जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 का उल्लंघन करते पाए गए।
इसमें कहा गया है कि सट्टेबाजी और व्यक्तिगत देखभाल के बाद, स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र विज्ञापन के मामले में तीसरा सबसे अधिक उल्लंघन करने वाला क्षेत्र बना हुआ है। एएससीआई की मुख्य कार्याधिकारी और महासचिव मनीषा कपूर ने कहा, ‘बिना डॉक्टर के पर्चे वाले उत्पादों को अक्सर खाद्य, हर्बल या स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों के रूप में बेचा जाता है, लेकिन कभी-कभी वे चिकित्सीय या रोग संबंधी दावे भी कर सकते हैं।’
अगस्त 2025 में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने अमेरिकी खाद्य एवं औषधि एजेंसी द्वारा अनुमोदित ‘कूलस्कल्प्टिंग’ फैट-फ्रीजिंग प्रक्रिया/मशीन के उपयोग से संबंधित भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए वेलनेस फर्म वीएलसीसी पर लगभग 3 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। सीसीपीए ने मुंबई की ब्यूटी क्लिनिक काया लिमिटेड पर भी वजन घटाने का इसी तरह का दावा करने के लिए जुर्माना लगाया।
दिलचस्प है कि डिजिटल विज्ञापन के बढ़ते चलन के कारण अब भ्रामक विज्ञापन को हटाने की लागत और गति दोनों कम हो गई हैं। यदि कोई दावा भ्रामक साबित होता है, तो ब्रांड उस पोस्ट को तुरंत हटा सकता है।
मुंबई की गैराज वर्ल्डवाइड के पार्टनर और चीफ क्रिएटिव ऑफिसर आशिष चक्रवर्ती ने कहा, ‘प्रिंट और टेलीविजन के दौरान यह इतना आसान नहीं था, इसलिए गारंटीशुदा परिणामों के बजाय ‘वजन प्रबंधन’ जैसी अधिक तटस्थ भाषा का इस्तेमाल किया गया।’
डेंट्सू के आनंद के अनुसार, असली चुनौती त्वरित समाधान के वादों, मशहूर हस्तियों द्वारा किए गए समर्थन और संदिग्ध दावों वाली वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों से निपटने में है।
हालांकि यह सब चिंताजनक बना हुआ है, लेकिन वजन प्रबंधन बाजार की निरंतर वृद्धि ने विज्ञापनदाताओं को इससे निपटने का रास्ता खोजने के लिए प्रेरित किया है।
आनंद ने कहा, ‘वजन घटाने के विज्ञापन लिखना सिर्फ कॉपीराइटिंग नहीं है, इसमें व्यवहार विज्ञान, नियमन और कहानी कहने की कला का समावेश होता है।’ उन्होंने कहा कि विज्ञापन एजेंसियों को परिणाम को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करके, दावे को झूठा साबित किए बिना, प्रामाणिकता और अतिशयोक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, यानी चमत्कार का वादा किए बिना आशा का उपयोग करना होता है।
आनंद ने कहा, ‘आजकल, समझदार ब्रांड ’10 दिनों में 10 किलो वजन घटाएं’ के बजाय ‘स्थायी, विज्ञान-आधारित परिवर्तन’ की ओर बढ़ रहे हैं।’ हाल ही में, वजन घटाने वाली दवा निर्माता कंपनी इलाई लिली ने एक विज्ञापन जारी किया जिसमें इस संवेदनशील विषय को दर्शाते हुए दिखाया गया कि कैसे मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति यह समझे बिना आलोचना को स्वीकार कर लेता है कि यह एक बीमारी है जिसके लिए चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
आनंद ने कहा, ‘वे लोगों से मोटापे को एक बीमारी के रूप में देखने के लिए कह रहे हैं, न कि केवल जीवनशैली की समस्या के रूप में।’
इन दावों और शिकायतों ने नियामक संस्थाओं को व्यस्त रखा है। सीसीपीए और एएससीआई पूरी तरह सतर्क हैं। कपूर ने कहा, ‘जब शिकायतें प्राप्त होती हैं और किए गए दावों के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रदान नहीं किए जाते हैं, तो एएससीआई आमतौर पर विज्ञापनदाता से विज्ञापन को संशोधित करने या वापस लेने के लिए कहता है।’
हालांकि, कुछ मामलों में, यदि विज्ञापनों को औषधि एवं जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम जैसे वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए पाया जाता है, तो एएससीआई उन्हें आयुष मंत्रालय या अन्य संबंधित नियामक संस्थाओं को भेज देती है।
निश्चित रूप से, झूठे दावों से निपटने की कोशिशें तब से ही शुरू हो सकती हैं, जब कोई प्रोडक्ट मंजूरी के लिए भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएबाई) के पास जाता है।
प्राधिकरण की एक न्यूट्रिशनल साइंटिस्ट ने कहा, ‘किसी भी न्यूट्रास्यूटिकल प्रोडक्ट के लिए, यह प्रक्रिया नौ विशेषज्ञों की एक टीम, प्राधिकरण के कुछ सदस्यों और एक चेयरपर्सन के साथ शुरू होती है। प्रोडक्ट के सभी दावों और पहलुओं का अध्ययन किया जाता है, जिसके बाद किसी विशेषज्ञ – जैसे एंडोक्रिनोलॉजिस्ट या डायबेटोलॉजिस्ट – के साथ एक और मीटिंग होती है; यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रोडक्ट के बारे में क्या दावा किया गया है।’
उन्होंने बताया कि अगले चरण में सभी सवालों को प्रोडक्ट बनाने वालों के पास भेजा जाता है, जिन्हें 21 विशेषज्ञों और पांच बाहरी सदस्यों की एक टीम को जवाब देना होता है। अंतिम चरणों में प्रोडक्ट का सैंपल स्वास्थ्य सचिवालय को भेजना और टिप्पणियों के लिए ड्राफ्ट को वेबसाइट पर डालना शामिल है।
उन्होंने कहा, ‘ज्यादातर मामलों में, यह 10-12 चरणों वाली एक कड़ी प्रक्रिया होती है।’ मंजूरी के लिए आने वाले वजन घटाने वाले उत्पादों की संख्या में पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ोतरी हुई है।
विज्ञापन देने वाले भी कुछ जिम्मेदारी लेने का दावा करते हैं। उनका कहना है कि विज्ञापन की स्क्रिप्ट में कोई भी दावा जोड़ने से पहले ब्रांड के साथ चर्चा की जाती है।
आनंद ने कहा, ‘हम क्लिनिकल ट्रायल, सामग्री के स्तर पर सबूत, सलाहकार बोर्ड वगैरह के बारे में पूछते हैं। यह दावों का मैदान बन जाता है कि कानूनी और वैज्ञानिक रूप से किस बात का बचाव किया जा सकता है।’
उन्होंने कहा कि सामग्री की अंतिम ज़िम्मेदारी विज्ञापन देने वाले की होती है, और यह भी माना कि कोई भी भरोसेमंद एजेंसी किसी दावे को आंख मूंदकर नहीं दोहराएगी। उन्होंने कहा, ‘वे अवास्तविक दावों का विरोध करेंगे, बचाव योग्य भाषा का सुझाव देंगे और जहां भी जरूरी होगा, वहां अस्वीकरण (डिसक्लेमर) जोड़ने पर ज़ोर देंगे।’
विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें जोखिम और प्रभाव के बीच एक तालमेल होता है, जहां ईमानदार तरीका यह है कि आप भले ही थोड़े उबाऊ, लेकिन सुरक्षित वाक्य चुनें — जैसे कि ‘यह उत्पाद वजन प्रबंधन में मदद करता है’, न कि ‘कुछ ही हफ्तों में अपने शरीर को बदलें।’
वजन घटाने वाले उत्पादों के उद्योग में हो रही बढ़ोतरी का मतलब है कि विज्ञापन क्षेत्र भी इसमें एक सहयोगी की भूमिका निभा रहा है। जैसे-जैसे भारत मोटापे से जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने की तैयारी कर रहा है और बाजार में कई नए उत्पाद आ रहे हैं, वैसे-वैसे गुमराह करने वाले दावों और सरोगेट विज्ञापनों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। और इसके चलते नियामकों को संदिग्ध दावों पर कड़ी नजर रखनी होगी।