जब भी समाज में ‘स्किल्ड प्रोफेशनल’ की बात होती है, तो ज्यादातर लोगों के दिमाग में इंजीनियर, डॉक्टर या IT सेक्टर में काम करने वाले लोग आते हैं। वहीं खेतों में मेहनत करने वाले कृषि मजदूरों को अक्सर सिर्फ ‘मजदूर’ मान लिया जाता है, जैसे यह काम बिना किसी खास हुनर के किया जा सकता हो। लेकिन भारत इंटेलिजेंस के चीफ ऑफ स्टाफ परीक्षित राजुरकर इस सोच को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि खेती से जुड़ा काम सिर्फ शारीरिक मेहनत नहीं, बल्कि बेहद सटीक तरीके और लंबे अनुभव से जुड़ी एक खास स्किल है।
खेती का काम सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि समझ और अनुभव का भी काम है। खेती से जुड़े कामगार को ‘अकुशल’ कहना उन लोगों के हुनर को नजरअंदाज करना है, जो सालों से खेतों में काम करते आ रहे हैं। राजुरकर कहते हैं, “कृषि मजदूर सिर्फ खेत में मेहनत नहीं करते, बल्कि उन्हें यह भी अच्छी तरह पता होता है कि फसल की छंटाई कब और कैसे करनी है, कटाई का सही समय क्या है और थिनिंग कितनी करनी चाहिए। ये ऐसे काम हैं जिनके लिए सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि मौसम की समझ, सही समय पर फैसला लेने की क्षमता और लंबे अनुभव की जरूरत होती है।”
राजुरकर का कहना है कि यह हुनर किसी कॉलेज की डिग्री से नहीं आता, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और खेतों में काम करते हुए जोखिम उठाकर सीखने से विकसित होता है। उनके मुताबिक, जब नीतियों और रोजमर्रा की भाषा में कृषि श्रमिकों को सिर्फ ‘मजदूर’ कह दिया जाता है, तो इससे उनके काम और सम्मान दोनों को कम करके आंका जाता है। वह कहते हैं कि संविधान हर व्यक्ति को सम्मान के साथ आजीविका कमाने का अधिकार देता है और कृषि मजदूर भी इसके बराबर हकदार हैं।
उनका मानना है कि जब तक खेती से जुड़े काम को एक स्किल-आधारित पेशे के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक बेहतर ट्रेनिंग, सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर गंभीर चर्चा आगे नहीं बढ़ पाएगी।
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भारत में हर साल लाखों कृषि मजदूर काम की तलाश में अपना गांव और घर छोड़कर दूसरे राज्यों में जाते हैं। आमतौर पर इसे सिर्फ गरीबी की मजबूरी मान लिया जाता है, लेकिन राजुरकर इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि काम और कमाई की अनिश्चितता के बीच पलायन कई परिवारों के लिए एक सोच-समझकर लिया गया आर्थिक फैसला होता है। जैसे कोई पढ़ा-लिखा प्रोफेशनल बेहतर नौकरी और ज्यादा सैलरी के लिए शहर बदलता है, वैसे ही कृषि मजदूर भी बेहतर काम और ज्यादा सुरक्षा की उम्मीद में महाराष्ट्र से गुजरात या बिहार से पंजाब तक जाते हैं।
राजुरकर कहते हैं, “समस्या प्रवासन से ज्यादा उस दौरान होने वाली असुरक्षा की है। ज्यादातर प्रवासी मजदूरों के पास न तो सामाजिक सुरक्षा होती है और न ही ऐसी पक्की पहचान, जिससे उन्हें नई जगह पर अपने कानूनी अधिकार मिल सकें। इसका सबसे ज्यादा असर उनके बच्चों पर पड़ता है, जिन्हें माता-पिता के साथ बार-बार जगह बदलने की वजह से पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ती है। परीक्षित राजुरकर का कहना है कि प्रवासन को रोकने के बजाय उसे सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने की जरूरत है। इसके लिए मजदूरों के कौशल का सही रिकॉर्ड, पहचान पत्र और ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिससे उन्हें हर जगह दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े।”
आज के समय में कृषि श्रम को बेहतर तरीके से संगठित करने के लिए तकनीक की मदद लेना जरूरी हो गया है। परीक्षित राजुरकर का कहना है कि खेती से जुड़े काम को भी उतनी ही गंभीरता और व्यवस्था के साथ देखा जा सकता है, जितना किसी औपचारिक नौकरी वाले सेक्टर को देखा जाता है। अभी कुछ जगहों पर डेटा और तकनीक की मदद से मजदूरों के कौशल और उनकी उपलब्धता का रिकॉर्ड तैयार करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं।
कृषि मजदूरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनका काम पूरी तरह मौसम पर निर्भर होता है। ऐसे में उन्हें रोजगार के साथ बीमा, सुरक्षित रहने की जगह, साफ-सफाई और बच्चों की पढ़ाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। राजुरकर का मानना है कि कृषि मजदूरों को सिर्फ खेती की लागत के तौर पर नहीं देखना चाहिए। वे देश की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाले कुशल पेशेवर हैं।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारा समाज और हमारी नीतियां कृषि मजदूरों को वही सम्मान देने के लिए तैयार हैं, जो हम इंजीनियर या डॉक्टर जैसे पेशों को देते हैं? राजुरकर कहते हैं कि सरकार को कृषि नीतियां बनाते वक्त यही सोच होनी चाहिए। जब कृषि श्रमिक को सिर्फ मजदूर नहीं, बल्कि अपने फैसले खुद लेने वाले एक सम्मानित नागरिक के रूप में देखा जाएगा, तभी सही मायनों में समावेशी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा जा सकेगा।