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Capital Gains Tax: सैलरी क्लास के लिए कमाई बचाने का ‘स्मार्ट’ फॉर्मूला, जानें कैसे बचाएं अपना टैक्स

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प्रॉपर्टी और शेयर बेचने पर होने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स को सेक्शन 54, 54F और सही प्लानिंग से बचाया जा सकता है। जानें एक्सपर्ट्स की खास टैक्स-सेविंग टिप्स

Last Updated- April 20, 2026 | 5:32 PM IST
Income Tax
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत में नौकरीपेशा लोगों के लिए निवेश केवल बचत नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा है। लेकिन जब इन निवेशों को बेचने और मुनाफा कमाने की बारी आती है, तो ‘कैपिटल गेन्स टैक्स’ एक बड़ी चुनौती बन जाता है। अक्सर जानकारी के अभाव में लोग अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में चुका देते हैं। टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर सही प्लानिंग और नियमों का तालमेल बिठाया जाए, तो इस टैक्स बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

टैक्स छूट के सबसे असरदार हथियार: धारा 54, 54F और 54EC

पूंजीगत लाभ (Capital Gains) पर टैक्स बचाने के लिए इनकम टैक्स लॉ में कुछ खास नियम दिए गए हैं। Agnam Advisor के फाउंडर और CEO, प्रशांत मिश्रा कहते हैं, “नौकरीपेशा लोगों के लिए सबसे असरदार तरीका रीइन्वेस्टमेंट यानी दोबारा निवेश से जुड़ी छूट है। अगर सेक्शन 54, 54EC और 54F का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स काफी हद तक कम या पूरी तरह खत्म भी किया जा सकता है।”

जबकि ध्रुव एडवाइजर्स के पार्टनर, दीपेश छेड़ा इसे आसान शब्दों में समझाते हैं, “ये सभी सेक्शन अलग-अलग काम के लिए बने हैं। सेक्शन 54 तब लागू होता है जब आप एक घर बेचकर दूसरा घर खरीदते हैं। वहीं, सेक्शन 54F तब काम आता है जब आप शेयर या सोना जैसी दूसरी संपत्ति बेचकर उस पैसे से घर खरीदते हैं।”

छेड़ा यह भी बताते हैं कि इन सेक्शंस के तहत मिलने वाली छूट की एक अधिकतम सीमा होती है, जो 10 करोड़ रुपये तक है। इसके अलावा, सेक्शन 54EC एक और विकल्प देता है, जिसमें जमीन या बिल्डिंग बेचने से हुए मुनाफे को खास बॉन्ड्स में निवेश किया जा सकता है, जिसकी सीमा 50 लाख रुपये है।

छेड़ा के मुताबिक, अगर किसी वजह से निवेशक तुरंत दोबारा निवेश नहीं कर पाता, तो ‘कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम’ (CGAS) एक काम का विकल्प है। इसमें तय समय के भीतर पैसा जमा करके टैक्स छूट का फायदा सुरक्षित रखा जा सकता है। 

दोनों एक्सपर्ट्स इस बात पर जोर देते हैं कि कई लोग यह मान लेते हैं कि 80C में निवेश करने से कैपिटल गेन्स टैक्स बच जाएगा, जबकि ऐसा नहीं है। 80C सिर्फ आपकी नियमित आय, जैसे सैलरी या किराए की इनकम पर ही लागू होता है।

Also Read: इनकम टैक्स के नए नियम लागू: अब 24Q और 26Q की छुट्टी, फॉर्म 138 और 140 से TDS भरना होगा आसान!

नए बदलाव और FY 2025-26 के लिए खास नियम

टैक्स के नियम लगातार बदल रहे हैं, इसलिए उन्हें समझना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। प्रशांत मिश्रा के मुताबिक, 23 जुलाई 2024 के बाद हुए बदलावों के चलते लिस्टेड इक्विटी पर 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के लॉन्ग टर्म मुनाफे पर अब 10% की जगह 12.5% टैक्स देना होगा। वहीं, शॉर्ट टर्म गेन्स पर टैक्स बढ़ाकर 20% कर दिया गया है।

दीपेश छेड़ा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में कैपिटल गेन्स की छूट या डिडक्शन में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन कुछ राहत जरूर दी गई है। ‘इनकम टैक्स एक्ट, 2025’ (जो 1 अप्रैल 2026 से लागू हो चुका है) के तहत अब ‘कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम’ में पैसा जमा करने की समयसीमा बढ़ाकर बिलेटेड रिटर्न की तारीख तक कर दी गई है। इससे उन लोगों को फायदा मिलेगा, जो समय की कमी की वजह से तुरंत निवेश नहीं कर पाते।

साथ ही, प्रॉपर्टी के मामले में अब टैक्सपेयर्स के पास दो विकल्प हैं, या तो बिना इंडेक्सेशन के 12.5% टैक्स दें या इंडेक्सेशन के साथ 20% टैक्स चुनें, ऐसे में अब टैक्स प्लानिंग पहले से ज्यादा हिसाब किताब पर निर्भर हो गई है, वहीं सेक्शन 54EC का दायरा अब सिर्फ जमीन या बिल्डिंग तक सीमित कर दिया गया है, इसलिए निवेश से पहले ध्यान से फैसला लेना जरूरी है।

टैक्सपेयर्स की आम गलतियां और एक्सपर्ट्स की सलाह

अक्सर टैक्सपेयर्स छोटी-छोटी गलतियों के कारण बड़े लाभ से हाथ धो बैठते हैं। प्रशांत मिश्रा कहते हैं कि सबसे बड़ी गलती हर साल मिलने वाली 1.25 लाख रुपये की टैक्स-फ्री छूट का उपयोग न करना है। इसके अलावा, कई लोग लॉस हार्वेस्टिंग यानी घाटे को मुनाफे से एडजस्ट करने का सही इस्तेमाल नहीं करते। वे बताते हैं कि शॉर्ट टर्म घाटे को शॉर्ट और लॉन्ग टर्म दोनों मुनाफे से एडजस्ट किया जा सकता है, जबकि लॉन्ग टर्म घाटा सिर्फ लॉन्ग टर्म मुनाफे से ही एडजस्ट होगा।

कई सैलरी क्लास निवेशक ESOPs या बोनस शेयरों के मामले में होल्डिंग पीरियड की गलत गणना कर देते हैं। इससे टैक्स की गलत कैटेगरी बन जाती है। वहीं, एडवांस टैक्स को नजरअंदाज करना भी एक बड़ी गलती है, क्योंकि सैलरी पर कटने वाला TDS अक्सर कैपिटल गेन्स टैक्स को कवर नहीं कर पाता। देरी से रिटर्न फाइल करना भी महंगा साबित होता है, क्योंकि इससे घाटे को आगे के वर्षों में ले जाने (Carry Forward) का फायदा नहीं मिलता।

वहीं, दीपेश छेड़ा का कहना है कि लोग अक्सर शॉर्ट टर्म मुनाफे पर छूट क्लेम करने की कोशिश करते हैं, जबकि ये लाभ केवल लॉन्ग टर्म मुनाफे पर ही मिलते हैं। जॉइंट प्रॉपर्टी के मामले में भी कई लोग अपनी हिस्सेदारी के बजाय पूरी छूट अकेले ही क्लेम कर लेते हैं, जो गलत है।

छेड़ा यह भी बताते हैं कि 5 लाख रुपये तक की आय पर मिलने वाली रिबेट (पुराना टैक्स सिस्टम) या 12 लाख रुपये तक की आय पर मिलने वाली रिबेट (नया सिस्टम) कैपिटल गेन्स टैक्स पर लागू नहीं होती। हालांकि, अगर बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट का कुछ हिस्सा बचा हुआ है, तो उसे कैपिटल गेन्स के साथ एडजस्ट किया जा सकता है।

Also Read: Explainer: 1 अप्रैल से बदलेगी आपकी सैलरी व टैक्स की दुनिया — नए वेज कोड और इनकम टैक्स एक्ट की पूरी ABCD

साल भर की रणनीति: कैसे बचाएं अपनी मेहनत की कमाई

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि टैक्स प्लानिंग आखिरी समय का काम नहीं है। प्रशांत मिश्रा की सलाह है कि निवेशकों को साल भर अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करते रहना चाहिए और जरूरत के हिसाब से मुनाफा और घाटे को मैनेज करना चाहिए। खासकर जिन लोगों के पास ESOPs या बड़े ट्रांजैक्शन होते हैं, उन्हें अपने मुनाफे को अलग अलग सालों में बांटने पर विचार करना चाहिए, ताकि अचानक टैक्स का बोझ न बढ़े।

दीपेश छेड़ा इस बात पर जोर देते हैं कि समय का सही पालन सबसे ज्यादा जरूरी है। प्रॉपर्टी की खरीद और बिक्री की तय समय सीमा में थोड़ी सी देरी भी बड़ी छूट छीन सकती है। वे सलाह देते हैं कि खरीद बिक्री के एग्रीमेंट, सुधार की लागत के बिल और दोबारा निवेश के सभी सबूतों का सही रिकॉर्ड रखना चाहिए। आज के दौर में जब इनकम टैक्स विभाग डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर रहा है, तब सही डॉक्यूमेंटेशन और समय पर टैक्स प्लानिंग ही आपको सुरक्षित रख सकती है।

अंत में, दोनों एक्सपर्ट इस बात से सहमत हैं कि अगर आप अपनी होल्डिंग अवधि को थोड़ा बढ़ा देते हैं, तो आपका मुनाफा शॉर्ट टर्म से लॉन्ग टर्म में बदल सकता है। इससे आपको कम टैक्स देना पड़ता है और कुल टैक्स बोझ काफी घट जाता है।

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First Published - April 20, 2026 | 5:32 PM IST

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