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मेडिकल इमरजेंसी पर भारी पड़ रही महंगाई, 80% भारतीयों के पास इलाज के लिए पर्याप्त बचत नहीं: स्टडी

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देश में इलाज का खर्च अब एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गया है। 80% परिवारों के पास मेडिकल इमरजेंसी के लिए पर्याप्त फंड और बीमा की सही जानकारी नहीं है

Last Updated- April 06, 2026 | 7:47 PM IST
Health Insurance
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अदित्य बिरला सन लाइफ इंश्योरेंस की हालिया स्टडी ‘अ-Nishchit Index 2.0’ में एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। देश के ज्यादातर घरों में मेडिकल इमरजेंसी के लिए पैसे की तैयारी बेहद कमजोर है। लगभग 80 प्रतिशत परिवारों को लगता है कि उनके पास गंभीर बीमारी जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त बचत नहीं है। साथ ही, 82 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों से अपनी आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ने की चिंता में जी रहे हैं।

ये आंकड़े 3,583 लोगों पर किए गए एक सर्वे से आए हैं, जो देश के 20 शहरों और कस्बों में हुआ। इसके अलावा, 21 लोगों से विस्तार से बातचीत (इंटरव्यू) भी की गई। यह इंडेक्स 11 अलग-अलग पैमानों और 49 तरह के सवालों/राय पर आधारित है, जिसमें भारत का कुल अनिश्चितता स्कोर 79 दर्ज किया गया है।

स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम के संकेत

स्टडी में कई ऐसे संकेत सामने आए हैं जो बताते हैं कि बीमारी से जुड़े खर्च लोगों के लिए बड़ा आर्थिक जोखिम बन रहे हैं। करीब 80% लोगों को भरोसा नहीं है कि उनके पास इमरजेंसी, खासकर गंभीर बीमारी के समय, के लिए पर्याप्त बचत है। वहीं 82% लोग मानते हैं कि इलाज महंगा होता जा रहा है और इससे उनकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ सकता है।

करीब 79% लोगों को यह भी साफ नहीं है कि उनकी इंश्योरेंस पॉलिसी गंभीर बीमारियों में कितना कवर देती है। 81% लोगों का मानना है कि प्रदूषण और बढ़ेगा, जिससे आगे चलकर बीमारियां और खर्च दोनों बढ़ सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य भी चिंता का विषय बन रहा है। 81% लोगों ने कहा कि तनाव और मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं, लेकिन करीब 80% लोग फिर भी किसी प्रोफेशनल से मदद लेने से बचते हैं। कुल मिलाकर ये आंकड़े दिखाते हैं कि स्वास्थ्य से जुड़े खर्च का जोखिम काफी बड़ा है, लेकिन उसके लिए तैयारी अभी भी कमजोर है।

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स्टडी में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। पहले मेडिकल खर्च को अचानक आने वाला खर्च माना जाता था, लेकिन अब ये रोजमर्रा के खर्च जैसा बनता जा रहा है। प्रदूषण से जुड़ी बीमारियां, तेज गर्मी और मौसमी बीमारियां बार-बार हो रही हैं, जिससे इलाज, जांच और दवाइयों पर लगातार पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

अब पर्यावरण और मौसम से जुड़े कारण देश की चिंताओं में दूसरे नंबर पर आ गए हैं, जिसकी वजह से कुल अनिश्चितता स्कोर 79 तक पहुंच गया है। ऐसे में परिवार अब हेल्थ खर्च को बजट का एक जरूरी और नियमित हिस्सा मानने लगे हैं, न कि कोई अचानक आने वाला खर्च।

इंश्योरेंस को लेकर जागरूकता अभी भी कम है। लोग चिंतित तो हैं, लेकिन तैयारी उतनी मजबूत नहीं है। करीब 79% लोगों को अपनी पॉलिसी के कवरेज के बारे में साफ जानकारी नहीं है, खासकर कैंसर या सांस से जुड़ी पुरानी बीमारियों के इलाज के मामले में। लंबे इलाज, पॉलिसी की शर्तें, एक्सक्लूजन और लिमिट (कैप) की सही जानकारी न होने से जोखिम और बढ़ जाता है।

अलग-अलग हिस्सों में अलग तस्वीरें

देश के अलग-अलग हिस्सों में यह समस्या अलग-अलग तरह से दिख रही है। उत्तर भारत में मौसम से जुड़ी बीमारियां और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर ज्यादा देखने को मिल रहा है। पूर्वी भारत में बुजुर्गों की देखभाल और उससे जुड़े खर्च लोगों की बड़ी चिंता है।

दक्षिण भारत में ज्यादा गर्मी के चलते मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां बढ़ रही हैं, जबकि पश्चिम के बड़े शहरों में प्रदूषण और गर्मी का असर सेहत के साथ-साथ काम करने की क्षमता पर भी पड़ रहा है। इससे साफ है कि स्थानीय माहौल और आबादी की बनावट (डेमोग्राफी) के हिसाब से स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम बदलते हैं।

टियर-1 और टियर-2 शहरों के कमाने वाले परिवारों में अब व्यवहार बदलने लगा है। हीटवेव, बाढ़ और भारी बारिश को लोग अब एक बार की घटना नहीं, बल्कि बार-बार आने वाले खर्च के तौर पर देखने लगे हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में अनिश्चितता ज्यादा है, क्योंकि वहां लोगों के पास बचत या फाइनेंशियल बैकअप कम होता है।

स्टडी के मुताबिक, मानसिक स्वास्थ्य भी अब छिपा हुआ खर्च बनता जा रहा है। लोग चिंता तो महसूस कर रहे हैं, लेकिन मदद नहीं लेते, जिससे काम पर असर पड़ता है, छुट्टियां बढ़ती हैं और लंबे समय में कमाई भी प्रभावित हो सकती है।

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First Published - April 6, 2026 | 7:47 PM IST

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