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भू-राजनीतिक संकट बाजार के लिए सिर्फ ‘स्पीड ब्रेकर’, एनालिस्ट बोले- लॉन्ग टर्म रिटर्न पर असर नहीं

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भू-राजनीतिक संकट के दौरान भावनाओं में आकर लिए गए निर्णय अक्सर निवेशकों के लिए वास्तविक संकट से ज्यादा नुकसानदेह साबित होते हैं

Last Updated- March 12, 2026 | 7:43 PM IST
Stock Market today

भू-राजनीतिक संकट अक्सर बाजार में डर और तेज उतार-चढ़ाव पैदा करते हैं, लेकिन लंबी अवधि में निवेश के रिटर्न को स्थायी रूप से प्रभावित नहीं करते। व्हाइटओक कैपिटल म्युचुअल फंड की रिपोर्ट के मुताबिक, भू-राजनीतिक संकट के दौरान भावनाओं में आकर लिए गए निर्णय अक्सर निवेशकों के लिए वास्तविक संकट से ज्यादा नुकसानदेह साबित होते हैं। एनालिस्ट कहते हैं कि हर बड़े संकट के बाद बाजार फिर से वापसी कर लेता है। 2008 का मुंबई आतंकी हमला, कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध आदि इसके बेहतरीन उदाहरण है। ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना हैं कि संकट के समय घबराकर शेयर बेचने (पैनिक सेलिंग) से बचना चाहिए और अपने एसेट एलोकेशन पर ध्यान देना चाहिए।

लॉन्ग टर्म रिटर्न पर असर क्यों नहीं पड़ता?

रिपोर्ट बताती है कि भू-राजनीतिक घटनाएं आमतौर पर निवेशकों की भावना को प्रभावित करती हैं। इससे डर, अस्थिरता और नाटकीय सुर्खियां पैदा होती हैं, लेकिन ये अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना को बहुत कम ही तोड़ती हैं। बाजार मुख्य रूप से कुछ बुनियादी चीजों पर ध्यान देता है, जैसे कंपनियों की कमाई, ब्याज दरें और शेयरों का मूल्यांकन। भू-राजनीतिक घटनाएं आमतौर पर इन बुनियादी चीजों को स्थायी रूप से नहीं बदलतीं। इसलिए उनका असर ज्यादा समय तक नहीं टिकता है। विश्लेषकों का कहना है कि हर संकट उस समय बेहद गंभीर लगता है, लेकिन बाद में यह बाजार की लंबी यात्रा में केवल एक अस्थायी झटका साबित होता है।

उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन युद्ध को ही लें। इस युद्ध के दौरान एनर्जी की कीमतें बढ़ीं, आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई और महंगाई भी तेज हुई। इन सब कारणों से बाजार में कुछ समय के लिए अस्थिरता जरूर आई। लेकिन क्या इससे भारतीय कंपनियों की कमाई की बुनियादी दिशा बदल गई?

असल में ऐसा नहीं हुआ। TCS सॉफ्टवेयर सेवाएं देती रही, ICICI Bank कर्ज देता रहा, Asian Paints पेंट बेचती रही और Titan Company के आभूषणों की बिक्री भी जारी रही। युद्ध एक गंभीर घटना थी, लेकिन इससे लोगों ने बैंकिंग करना, घर खरीदना या शादी-ब्याह करना बंद नहीं किया।

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संकट से निकलने में लगता है थोड़ा समय

भारतीय कंपनियों ने हालात के अनुसार खुद को ढाल लिया। कंपनियों ने बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा खुद वहन किया और कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल दिया। उन्होंने नए सप्लायर और ग्राहक भी खोज लिए और अपना कारोबार जारी रखा। एक साल से कुछ ज्यादा समय में ज्यादातर कंपनियों की कमाई फिर से पहले के स्तर पर पहुंच गई या उससे भी ज्यादा हो गई।

इसकी तुलना 2008 के वित्तीय संकट से करें। यह एक भू-राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक गहरा आर्थिक संकट था। इस संकट ने अर्थव्यवस्था की बुनियादी व्यवस्था को ही बदल दिया था। बैंकिंग सिस्टम लगभग ठप हो गया, कर्ज मिलना मुश्किल हो गया और कंपनियों के लिए सामान्य तरीके से काम करना कठिन हो गया। यही वजह थी कि उस संकट से उबरने में कई साल लग गए, क्योंकि नुकसान सिर्फ भावनाओं का नहीं बल्कि पूरी आर्थिक संरचना का था।

भू-राजनीतिक संकट सिर्फ ‘सेंटिमेंट शॉक’

भू-राजनीतिक झटके अधिकतर निवेशकों की भावनाओं पर असर डालने वाले झटके होते हैं। ये डर, बाजार में अस्थिरता और नाटकीय सुर्खियां पैदा करते हैं, खासकर अगर आप टीवी न्यूज चैनलों को देखें तो हालात बहुत गंभीर लगने लगते हैं। लेकिन ज्यादातर मामलों में ये अर्थव्यवस्था की बुनियादी व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाते। इसीलिए भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव के समय सही रणनीति यह नहीं है कि निवेशक अपना पोर्टफोलियो बदल दें। बेहतर तरीका यह है कि वे अपनी तय एसेट एलोकेशन रणनीति पर अनुशासन के साथ टिके रहें और बाजार की अस्थिरता के दौर को धैर्य के साथ पार करें।

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हर संकट के बाद बाजार की जोरदार वापसी

पिछले कुछ दशकों में कई बड़े घटनाक्रम हुए, लेकिन बाजार हर बार संभल गया। उदाहरण के लिए…

1998 रूसी कर्ज संकट: इस संकट के दौरान BSE Sensex में 10% से ज्यादा गिरावट आई थी। लेकिन बाजार ने छह महीने के भीतर पूरी तरह रिकवरी कर ली। जो निवेशक निवेश में बने रहे, उन्हें अगले पांच वर्षों में औसतन करीब 15% सालाना रिटर्न मिला।

2001 के 11 सितंबर हमले: इस हमले के बाद वैश्विक बाजारों में भारी गिरावट आई। लंबे संघर्ष, आतंकवाद और आर्थिक संकट की आशंकाओं से बाजार में डर का माहौल था। NIFTY 50 दो हफ्तों में करीब 17% गिर गया था, लेकिन दिसंबर 2001 तक यह फिर से हमलों से पहले के स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद के दशक में बाजार ने मजबूत रिटर्न दिए।

2008 मुंबई आतंकी हमले: इस हमले के समय बाजार पहले से ही वैश्विक वित्तीय संकट के कारण कमजोर थे। इन नए आतंकी हमलों से बाजार और गिर गया। BSE Sensex करीब 8,500 के स्तर तक पहुंच गया था। लेकिन जिन्होंने इन स्तरों पर निवेश किया, उन्होंने 2010 तक सेंसेक्स को 21,000 के करीब पहुंचते देखा।

2016 सर्जिकल स्ट्राइक: सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया और हालात के बिगड़ने की आशंका जताई गई। इस दौरान बाजार में करीब 2-3% की गिरावट आई, लेकिन कुछ ही समय में बाजार संभल गया। बाद में यह घटना बाजार के लिए लगभग गैर-प्रभावी साबित हुई।

2019 बालाकोट एयरस्ट्राइक: एयरस्ट्राइक के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था। इस दौरान बाजार करीब दो हफ्तों तक काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। लेकिन छह महीने बाद बाजार की उस गिरावट को लगभग कोई याद नहीं कर रहा था।

2020 कोविड संकट: कोरोना महामारी के दौरान मार्च से अप्रैल के बीच बाजार में करीब 32% की गिरावट आई थी। हालांकि बाजार ने सिर्फ चार महीने में ही पूरी रिकवरी कर ली।

2022 रूस-यूक्रेन युद्ध: रूस-यूक्रेन युद्ध को उस समय एक बड़े वैश्विक संकट के रूप में देखा जा रहा था, मानो यह तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो सकती है। ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और खाद्य संकट की आशंकाएं भी बढ़ीं। परमाणु युद्ध को लेकर भी डर का माहौल था। इस दौरान NIFTY-50 18,000 से गिरकर 15,200 तक आ गया था, यानी करीब 16% की गिरावट। लेकिन सितंबर 2024 तक निफ्टी 25,000 के पार पहुंच गया।

क्या आपने इस पैटर्न पर ध्यान दिया? जब भी कोई संकट आता है, उस समय वह बेहद गंभीर और सब कुछ खत्म कर देने वाला लगता है। लेकिन बाद में वही संकट बाजार की लंबी यात्रा में सिर्फ एक स्पीड ब्रेकर साबित होता है।

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संकट में छिपा होता है अवसर

विशेषज्ञों के अनुसार, अनुशासित निवेशकों के लिए ऐसे संकट अवसर भी बन सकते हैं। जब बाजार गिरता है तो पोर्टफोलियो में इक्विटी का अनुपात कम हो जाता है और डेट या गोल्ड का हिस्सा बढ़ जाता है।

अगर किसी निवेशक का लक्ष्य 60% इक्विटी, 30% डेट और 10% गोल्ड का एसेट एलोकेशन है और गिरावट के बाद इक्विटी का हिस्सा घटकर 52% रह जाता है, तो रीबैलेंसिंग के तहत उसे इक्विटी खरीदनी पड़ती है। इस तरह निवेशक सिस्टम के जरिए कम कीमत पर खरीदारी कर पाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह रणनीति निवेशकों को तब खरीदने के लिए प्रेरित करती है जब दूसरे डर के कारण बाजार से बाहर निकल रहे होते हैं।

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First Published - March 12, 2026 | 7:43 PM IST

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