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Health Insurance vs NPS Swasthya: हेल्थकेयर प्लानिंग में दोनों की भूमिका को समझना क्यों जरूरी है?

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एक्सपर्ट का मानना है कि हेल्थ इंश्योरेंस ही अब काफी नहीं रहा है, भविष्य की गंभीर बीमारियों और रिटायरमेंट के खर्चों के लिए NPS Swasthya को अपने ढाल बनाएं

Last Updated- May 11, 2026 | 3:54 PM IST
Health Insurance
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

Halth Insurance vs NPS Swasthya: आज के दौर में जब मेडिकल साइंस ने तरक्की की है, तो इलाज के खर्चे भी उसी रफ्तार से आसमान छू रहे हैं। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक गंभीर बीमारी का इलाज उनकी जीवन भर की कमाई को कुछ ही दिनों में साफ कर सकता है। अक्सर लोग अपनी सुरक्षा के लिए हेल्थ इंश्योरेंस को ही आखिरी समाधान मान लेते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि बदलती अर्थव्यवस्था और बढ़ती उम्र की जरूरतों के बीच अब एक नई रणनीति की जरूरत है।

एक्सपर्ट्स की राय: अब क्यों जरूरी है दोहरी सुरक्षा?

हेल्थ और फाइनेंशियल सेक्टर से जुड़े दिग्गज इसे एक अलग नजरिए से देखते हैं। रोइनेट सॉल्यूशन के MD और फाउंडर समीर माथुर कहते हैं, “NPS Swasthya को हेल्थ इंश्योरेंस की जगह नहीं, बल्कि उसके साथ इस्तेमाल होने वाली सुविधा समझना चाहिए। हेल्थ इंश्योरेंस अचानक अस्पताल के बड़े खर्चों को कवर करता है, जबकि NPS Swasthya लंबे समय के लिए हेल्थ फंड बनाने में मदद करता है, खासकर रिटायरमेंट के बाद जब इलाज और दवाइयों का खर्च बढ़ जाता है।”

इसी पर Staywell.Health के को-फाउंडर, अरुण राममूर्ति कहते हैं, “हेल्थ इंश्योरेंस ऐसी आर्थिक सुरक्षा देता है, जो लोगों को अस्पताल में भर्ती होने, अचानक बीमारी आने या किसी मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में भारी खर्च के बोझ से बचाने में मदद करता है। यह इलाज के दौरान आने वाले बड़े मेडिकल बिलों को संभालने का काम करता है, ताकि मरीज और उसका परिवार आर्थिक दबाव में न आए। वहीं अब स्वास्थ्य सेवाओं के नए मॉडल, जैसे NPS Swasthya, तेजी से उभर रहे हैं। इनके आने से लोग सिर्फ इलाज के समय खर्च उठाने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि भविष्य के मेडिकल खर्चों और रिटायरमेंट के बाद की स्वास्थ्य जरूरतों के लिए भी पहले से योजना बनाने लगे हैं।”

हेल्थ इंश्योरेंस: आपकी पहली सुरक्षा

हेल्थ इंश्योरेंस एक तरह का रिस्क मैनेजमेंट टूल है, जिसका मकसद मेडिकल इमरजेंसी के समय आर्थिक सुरक्षा देना होता है। यानी अगर आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को अचानक अस्पताल में भर्ती होना पड़े, तो इलाज का बड़ा खर्च आपकी जेब या बचत पर भारी असर न डाले।

  • कैशलेस सुविधा: अस्पताल के भारी-भरकम बिलों का भुगतान सीधे इंश्योरेंस कंपनी करती है।
  • वार्षिक सुरक्षा: आप हर साल एक तय प्रीमियम भरते हैं और इसके बदले एक निश्चित रकम (सम इंश्योर्ड) तक के मेडिकल खर्च के लिए सुरक्षा हासिल कर लेते हैं।
  • टैक्स में बचत: इनकम टैक्स की धारा 80D के तहत प्रीमियम पर छूट भी मिलती है।

एक्सपर्ट के मुताबिक, लेकिन हेल्थ इंश्योरेंस की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं। उम्र बढ़ने के साथ इसका प्रीमियम काफी महंगा हो जाता है और कई बार गंभीर बीमारियों या लंबे इलाज के दौरान इंश्योरेंस की तय रकम भी कम पड़ जाती है। ऐसे समय में लोगों को एक अतिरिक्त और बड़े आर्थिक बैकअप की जरूरत महसूस होती है।

Also Read: हेल्थ इंश्योरेंस के बावजूद क्यों जरूरी है अलग हेल्थ कॉर्पस? जानिए बढ़ते मेडिकल खर्च का सच

NPS Swasthya: भविष्य का मेडिकल एसेट

NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) के तहत मिलने वाली ‘स्वास्थ्य’ सुविधा एक अलग तरह का फाइनेंशियल टूल है। इसके जरिए लोग अपनी जमा पूंजी का एक हिस्सा मेडिकल जरूरतों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। समीर माथुर के मुताबिक, इसे सिर्फ खर्च के तौर पर नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह एक ऐसा एसेट है जो समय के साथ बढ़ता रहता है और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य खर्चों में सहारा बनता है।

इसके कुछ तकनीकी पहलुओं को समझना जरूरी है:

  1. निकासी का नियम: सब्सक्राइबर अपने कुल कंट्रीब्यूशन (Employer Contribution को छोड़कर) का 25% हिस्सा निकाल सकते हैं।
  2. गंभीर बीमारियों का कवर: यह सुविधा कैंसर, किडनी फेलियर, मेजर ऑर्गन ट्रांसप्लांट, स्ट्रोक और हार्ट सर्जरी जैसी 13 गंभीर इंश्योरेंसरियों के लिए उपलब्ध है।
  3. पारिवारिक लाभ: इस रकम का इस्तेमाल सब्सक्राइबर अपने इलाज के साथ-साथ अपने जीवनसाथी, बच्चों या आश्रित माता-पिता के मेडिकल खर्चों के लिए भी कर सकता है।
  4. नियम और शर्तें: पूरे निवेश अवधि के दौरान अधिकतम तीन बार पैसे निकाले जा सकते हैं और यह निकासी पूरी तरह टैक्स-फ्री रहती है।

एक-दूसरे के पूरक कैसे हैं ये दोनों?

अरुण राममूर्ति का मानना है कि बेहतर और मजबूत ‘हेल्थकेयर फाइनेंसिंग स्ट्रैटेजी’ के लिए हेल्थ इंश्योरेंस और NPS Swasthya, दोनों का साथ होना जरूरी है। उनके मुताबिक, ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर स्वास्थ्य से जुड़े आर्थिक जोखिमों को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं। इनके बीच तालमेल को कुछ अहम बिंदुओं से समझा जा सकता है:

1. खर्च बनाम निवेश

हेल्थ इंश्योरेंस को एक तरह का खर्च माना जाता है, क्योंकि अगर आप क्लेम नहीं करते हैं तो आमतौर पर प्रीमियम का पैसा वापस नहीं मिलता, हालांकि अब कुछ पॉलिसियों में नो-क्लेम बोनस जैसी सुविधाएं भी मिलने लगी हैं। वहीं NPS Swasthya में जमा की गई रकम आपकी अपनी निवेश पूंजी होती है। अगर मेडिकल जरूरत नहीं पड़ती, तो यही पैसा आगे चलकर आपके रिटायरमेंट फंड को और मजबूत बनाने में मदद करता है।

2. कम इंश्योरेंस की भरपाई

आज के समय में कई बड़े ऑपरेशनों और इलाज का खर्च 10 से 15 लाख रुपये या उससे भी ज्यादा तक पहुंच जाता है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति के पास सिर्फ 5 लाख रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस कवर है, तो बाकी रकम का इंतजाम करना मुश्किल हो सकता है। समीर माथुर के मुताबिक, ऐसी स्थिति में NPS Swasthya से निकाली गई रकम इस आर्थिक कमी को पूरा करने में मदद कर सकती है और लोगों को कर्ज लेने या अपनी दूसरी बचत तोड़ने से बचा सकती है।

3. रिटायरमेंट के बाद का सहारा

रिटायरमेंट के बाद अक्सर नौकरी के साथ मिलने वाला कॉर्पोरेट या ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस खत्म हो जाता है। वहीं 60 साल की उम्र के बाद नई हेल्थ पॉलिसी लेना काफी महंगा पड़ सकता है। ऐसे समय में NPS में जमा किया गया यह विशेष हेल्थ फंड एक मजबूत ‘फाइनेंशियल कुशन’ की तरह काम करता है। यह जरूरत पड़ने पर तुरंत नकदी उपलब्ध कराने में मदद करता है, ताकि रिटायरमेंट के बाद के मेडिकल खर्चों को आसानी से संभाला जा सके।

Also Read: सात समंदर पार रहकर भी अपनों का रखें ख्याल! NRIs के लिए भारतीय टर्म इंश्योरेंस क्यों है सबसे बेस्ट?

इलाज के बदलते मॉडल और भविष्य की तैयारी

स्वास्थ्य क्षेत्र में नई तकनीकों और आधुनिक हेल्थकेयर मॉडलों के आने से इलाज का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब इलाज सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उसके बाद की रिकवरी, नियमित जांच, घर पर देखभाल और लंबे समय तक चलने वाली दवाइयों का खर्च भी लोगों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बनता जा रहा है।

अरुण राममूर्ति के मुताबिक, हेल्थ इंश्योरेंस अचानक आने वाले मेडिकल जोखिमों और अस्पताल के खर्चों से तुरंत सुरक्षा देता है, जबकि NPS Swasthya जैसे विकल्प उन लंबे समय के स्वास्थ्य खर्चों की तैयारी में मदद करते हैं, जिन्हें पारंपरिक हेल्थ इंश्योरेंस पूरी तरह कवर नहीं कर पाता। उनके अनुसार, दोनों को साथ मिलाकर देखना ही एक बेहतर और ‘कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थकेयर प्लानिंग’ का हिस्सा है।

एक ठोस रणनीति कैसे बनाएं?

एक्सपर्ट्स की राय को जोड़कर देखा जाए तो एक आम आदमी को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

  • पर्याप्त इंश्योरेंस लें: अपनी जरूरतों और शहर के इलाज के खर्च के हिसाब से एक बेस हेल्थ इंश्योरेंस जरूर रखें।
  • NPS में सोच समझकर जमा: केवल टैक्स बचाने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के मेडिकल रिजर्व के तौर पर NPS में नियमित योगदान दें।
  • इस्तेमाल का सही तरीका: छोटे और सामान्य मेडिकल खर्चों के लिए पहले हेल्थ इंश्योरेंस का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है। वहीं NPS Swasthya में जमा फंड को ऐसी गंभीर परिस्थितियों के लिए बचाकर रखना चाहिए, जब इलाज का खर्च बहुत ज्यादा हो जाए या इंश्योरेंस की सीमा पूरी तरह खत्म हो चुकी हो।

समीर माथुर के मुताबिक, यह किसी एक विकल्प को चुनने का मामला नहीं है, बल्कि हेल्थ इंश्योरेंस और NPS Swasthya दोनों का साथ ही सबसे बेहतर तरीके से काम करता है।

उनके मुताबिक, सही हेल्थ प्लानिंग वही मानी जाएगी जो आपको आज के मेडिकल खर्चों की चिंता से भी राहत दे और भविष्य, खासकर बुढ़ापे में आने वाली स्वास्थ्य संबंधी अनिश्चितताओं के लिए भी तैयार रखे। हेल्थ इंश्योरेंस जहां मौजूदा समय में अचानक आने वाले इलाज के खर्चों से सुरक्षा देता है, वहीं NPS Swasthya लंबे समय के लिए आर्थिक सहारा तैयार करने में मदद करता है। बढ़ती मेडिकल महंगाई के दौर में इन दोनों का संतुलन ही आपको और आपके परिवार को ज्यादा मजबूत आर्थिक सुरक्षा दे सकता है।

फीचर Health Insurance NPS Swasthya
सीधे शब्दों में क्या है? यह आपकी ‘आज की ढाल’ है। अचानक अस्पताल जाना पड़ा, तो यह बिल चुकाएगा। यह आपका ‘भविष्य का गुल्लक’ है। बुढ़ापे या बड़ी बीमारी के लिए अलग से जमा पैसा।
पैसे का मामला यह एक खर्चा है। हर साल प्रीमियम भरना होगा, पैसा वापस नहीं मिलता। यह एक बचत है। आपका अपना पैसा जो निवेश होकर समय के साथ बढ़ता है।
कितना पैसा मिलेगा? जितना आपका बीमा (जैसे 5 या 10 लाख) है, उतने तक का पूरा खर्चा। आपने खुद जितना पैसा जमा किया है, उसका 25% हिस्सा ही निकाल सकते हैं।
कब काम आएगा? छोटी-बड़ी किसी भी बीमारी में जब अस्पताल में भर्ती होना पड़े। केवल 13 बड़ी और गंभीर बीमारियों (जैसे कैंसर या हार्ट सर्जरी) के वक्त।
रिटायरमेंट के बाद उम्र बढ़ने पर इसका सालाना खर्चा (Premium) बहुत बढ़ जाता है। यह रिटायरमेंट के समय आपके पास एक बड़े फंड के रूप में तैयार रहता है।
टैक्स की राहत प्रीमियम भरने पर हर साल टैक्स में छूट मिलती है। इलाज के लिए निकाला गया पैसा पूरी तरह टैक्स-फ्री होता है।
सबसे बड़ा फायदा अचानक आई मुसीबत में जेब से बड़ी रकम नहीं देनी पड़ती। अगर बीमा का पैसा कम पड़ जाए, तो यह बाकी की कमी पूरी करता है।

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First Published - May 11, 2026 | 3:54 PM IST

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