सरकार के वित्तीय सेवा विभाग के सचिव एम. नागराजू ने हाल ही में कहा कि बीमा कंपनियां पॉलिसी बेचते समय ग्राहकों से पर्याप्त जानकारी नहीं लेतीं, लेकिन क्लेम के समय बहुत ज्यादा जांच और सवाल किए जाते हैं। उन्होंने इसे एक अहम चेतावनी के रूप में बताया कि जीवन बीमा खरीदते समय ग्राहकों को पूरी सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि बाद में उनके परिवार को दिक्कत न हो।
जनरलि सेंट्रल लाइफ इंश्योरेंस के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर निलेश परमार का कहना है कि जीवन बीमा की कीमत ग्राहक के स्वास्थ्य और मृत्यु के जोखिम के आधार पर तय होती है। सही स्वास्थ्य जानकारी देने से बीमा कंपनियां जोखिम का सही आकलन कर पाती हैं और उसी आधार पर प्रीमियम तय करती हैं।
निलेश परमार के अनुसार अगर किसी ग्राहक में ज्यादा जोखिम पाया जाता है तो उस पर अतिरिक्त प्रीमियम भी लगाया जा सकता है, जिसे लोडिंग कहा जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि अगर किसी की शुरुआती मौत के बाद जांच में यह साबित हो जाए कि उसने अपनी स्वास्थ्य जानकारी छुपाई थी, तो बीमा कंपनी क्लेम खारिज कर सकती है।
यह जोखिम खासकर पहले तीन साल के भीतर ज्यादा रहता है। इसलिए पॉलिसी लेते समय डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के साथ-साथ धूम्रपान और शराब सेवन जैसी आदतों की भी सही जानकारी देना जरूरी है, ताकि भविष्य में परिवार को किसी तरह की परेशानी न हो।
ग्राहकों को स्वास्थ्य जांच कराने के लिए सहमत होना चाहिए। निलेश परमार के अनुसार, मेडिकल जांच से उन पहले से मौजूद बीमारियों का पता चल सकता है जिन्हें ग्राहक जानबूझकर या अनजाने में बता नहीं पाए हों।
कुछ लोग जीवन बीमा पॉलिसी लेते समय अपनी आय (income) को जरूरत से ज्यादा दिखा देते हैं ताकि उन्हें अधिक सम एश्योर्ड यानी बड़ा बीमा कवर मिल सके। यह अक्सर गलत सलाह या जानकारी की कमी की वजह से होता है।
बीमा विशेषज्ञों के अनुसार, आय गलत बताने से आगे चलकर परेशानी हो सकती है। इससे बीमा कंपनी पॉलिसी की वहन क्षमता और इंश्योरेबल इंटरेस्ट पर सवाल उठा सकती है। जीवन बीमा का उद्देश्य किसी आर्थिक नुकसान की भरपाई करना होता है, न कि उससे लाभ कमाना।
गलत जानकारी देने पर क्लेम रिजेक्ट होने या आंशिक भुगतान मिलने की संभावना भी रहती है।
इस बारे में Venkatesh Naidu, डायरेक्टर, Insurance Brokers Association of India (IBAI) का कहना है कि छोटे बीमा कवर में आमतौर पर आय के दस्तावेज जरूरी नहीं होते। लेकिन ज्यादा प्रीमियम या बड़े सम एश्योर्ड वाली पॉलिसी में इनकम टैक्स रिटर्न, सैलरी स्लिप या बैंक स्टेटमेंट जैसे दस्तावेज मांगे जाते हैं।
उन्होंने सलाह दी है कि लोग अपनी आय सही तरीके से बताएं और जरूरत पड़ने पर सही दस्तावेज जमा करें। साथ ही, बीमा कवर हमेशा अपनी जरूरत और क्षमता के अनुसार ही चुनना चाहिए, न कि अधिक योग्यता पाने के लिए गलत जानकारी देने की कोशिश करनी चाहिए।
बीमा पॉलिसी लेते समय नॉमिनेशन भरना अक्सर लोग सिर्फ एक औपचारिकता मान लेते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें की गई छोटी सी गलती भी आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती है।
कानूनी विशेषज्ञ सोनम चांदवानी के अनुसार कई पॉलिसीधारक नॉमिनेशन फॉर्म खाली छोड़ देते हैं या फिर अपने नॉमिनी के साथ सही संबंध स्पष्ट नहीं करते। कई बार लोग नाबालिग को नॉमिनी बना देते हैं, लेकिन उनके लिए किसी अभिभावक या ऐपॉइंटी की जानकारी नहीं भरते, जिससे क्लेम प्रक्रिया अटक जाती है।
इसके अलावा शादी, तलाक या नॉमिनी की मृत्यु जैसे बड़े बदलावों के बाद भी लोग नॉमिनेशन अपडेट नहीं करते। इससे बाद में दिक्कतें बढ़ जाती हैं और बीमा कंपनी को कानूनी वारिस प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज मांगने पड़ते हैं, जिससे क्लेम में देरी होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नॉमिनेशन भरते समय नाम, उम्र, संबंध और संपर्क विवरण सही तरीके से भरना जरूरी है। अगर नॉमिनी नाबालिग है तो उसके लिए एक जिम्मेदार अभिभावक का विवरण देना भी जरूरी होता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नॉमिनेशन और वसीयत में किसी तरह का विरोध नहीं होना चाहिए। समय-समय पर नॉमिनेशन की समीक्षा करना जरूरी है क्योंकि जीवन की परिस्थितियां बदलती रहती हैं।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि पॉलिसीधारक अपने नॉमिनी को पॉलिसी के बारे में जरूर बताएं और यह भी बताएं कि दस्तावेज कहां रखे हैं। कई बार जानकारी न होने पर पैसा अनक्लेम्ड रह जाता है या प्रक्रिया में देरी हो जाती है।
बीमा कंपनियां पॉलिसी लेते समय ग्राहक से यह जानकारी लेती हैं कि उसके पास पहले से कोई अन्य बीमा पॉलिसी है या नहीं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक बीमा कवर तो नहीं ले रहा है।
SecureNow Insurance Broker के सह-संस्थापक कपिल मेहता के अनुसार, इससे बीमा कंपनी को यह जांचने में मदद मिलती है कि ग्राहक की कुल बीमा जरूरत और उसकी भुगतान क्षमता के बीच संतुलन है या नहीं। इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि पिछली पॉलिसी सामान्य दर पर मिली थी या स्वास्थ्य कारणों से अधिक प्रीमियम पर जारी की गई थी।
कपिल मेहता का कहना है कि अगर कोई ग्राहक अपनी अन्य पॉलिसियों की सही जानकारी नहीं देता है, तो शुरुआती तीन वर्षों के भीतर क्लेम खारिज किया जा सकता है। हालांकि तीन साल बाद नियमों के अनुसार आमतौर पर क्लेम को केवल गंभीर धोखाधड़ी के मामलों में ही अस्वीकार किया जा सकता है।
विशेषज्ञ मेहता के अनुसार, इस फॉर्म में स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज होती हैं और इसकी पूरी जिम्मेदारी पॉलिसीधारक की ही रहती है। अगर इसमें कोई भी गलत जानकारी रह जाती है तो आगे चलकर बीमा दावा अस्वीकार होने या परेशानी होने की संभावना बढ़ जाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि कई बार संपर्क नंबर या बैंक डिटेल गलत दर्ज होने से रिन्यूअल की सूचना समय पर नहीं मिल पाती। इससे पॉलिसी लैप्स हो सकती है और क्लेम या भुगतान में देरी जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। इसलिए फॉर्म को बिना जांचे साइन करना नुकसानदायक हो सकता है।
बीमा पॉलिसी लेने के बाद होने वाली वेरिफिकेशन कॉल को गंभीरता से लेना जरूरी है। यह कॉल सिर्फ औपचारिकता नहीं होती, बल्कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि ग्राहक को सही जानकारी दी गई है और जो पॉलिसी ली जा रही है, वह उसकी जरूरतों के अनुसार है।
इंडियाफर्स्ट लाइफ इंश्योरेंस के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर अत्रि चक्रवर्ती के अनुसार, इस कॉल के दौरान यह जांचा जाता है कि पॉलिसी कहीं गलत तरीके से बेची तो नहीं गई है। साथ ही ग्राहक को पॉलिसी की पूरी जानकारी समझ में आई है या नहीं, यह भी देखा जाता है।
कॉल में ग्राहक से नाम, जन्मतिथि, प्रीमियम राशि और बीमा कवर जैसी जरूरी जानकारियों की पुष्टि कराई जाती है। इसके अलावा स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी भी पूछी जाती है और यह बताया जाता है कि अगर कोई जानकारी छिपाई जाती है तो भविष्य में क्लेम पर असर पड़ सकता है।