कर्ज पाने के लिए तो अच्छा क्रेडिट स्कोर हमेशा से जरूरी माना जाता था मगर अब ढंग की नौकरी पाने के लिए भी क्रेडिट स्कोर अच्छा होना चाहिए। पिछले दिनों आई खबरों के मुताबिक वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने हाल में राज्य सभा में कहा कि पिछले तीन साल में बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान द्वारा चुने गए 20 उम्मीदवारों की भर्ती इसलिए रद्द कर दी गई क्योंकि उनकी क्रेडिट हिस्ट्री खराब थी।
नौकरी देते समय क्रेडिट हिस्ट्री और क्रेडिट स्कोर की पड़ताल वित्तीय सेवा क्षेत्र में सबसे ज्यादा नजर आती है। ‘अनलॉक द पावर ऑफ योर क्रेडिट स्कोर’ पुस्तक के लेखक अरुण राममूर्ति का कहना है, ‘क्रेडिट स्कोर ज्यादातर बैंकिंग, वित्तीय सेवा एवं बीमा (बीएफएसआई), फिनटेक तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में नौकरी देते समय देखा जाता है। इसका इस्तेमाल पैसे का लेनदेन संभालने वाले, कर्ज से जुड़े फैसले लेने वाले या गोपनीय जानकारी संभालने वाले पदों पर भर्ती करते समय ज्यादा किया जाता है।’
मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज के समूह मानव संसाधन प्रमुख नीरेन श्रीवास्तव के अनुसार वित्तीय सेवा क्षेत्र में यह तरीका पिछले 10 साल से जारी है।
ट्रू सर्च की पार्टनर और इंडिया लीड ऋतुपर्णा चक्रवर्ती बताती हैं, ‘भारत के ज्यादातर वित्तीय संस्थानों में अब इसकी जांच जरूरी हो गई है।’ क्रेडिट हिस्ट्री और स्कोर की जांच अब ज्यादा से ज्यादा कंपनियों और पदों के लिए होने लगी है। केएस लीगल ऐंड एसोसिएट्स की मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी कहती हैं, ‘कलेक्शन मैनेजर, ट्रेजरी मैनेजमेंट, क्रेडिट अंडरराइटर और गोपनीय वित्तीय जानकारी या ग्राहकों के खाते संभालने वाले पदों या नौकरियों के लिए क्रेडिट हिस्ट्री और क्रेडिट स्कोर का इस्तेमाल जरूर किया जाता है।’
राममूर्ति बताते हैं कि वित्तीय क्षेत्र ही नहीं, किसी भी क्षेत्र की कंपनी में वरिष्ठ वित्तीय एवं ट्रेजरी पदों के लिए भर्ती करते समय क्रेडिट हिस्ट्री और स्कोर देखा जाता है। मगर ऋतुपर्णा का कहना है कि दूसरे क्षेत्रों में ऐसा करने का कोई नियम नहीं है, अगर क्रेडिट हिस्ट्री जांची जा रही है तो उसे अपवाद ही माना जाए। अलबत्ता निजी क्षेत्र में यह चलन अब बढ़ता जा रहा है। राममूर्ति के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों ने भी अब यह काम शुरू कर दिया है।
वह कहते हैं, ‘नई बात यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की भर्तियों में भी यह चलन बन गया है और इसका इस्तेमाल वहां नजर आने लगा है।’
कंपनियां अपने यहां नौकरी की अर्जी देने वाले की क्रेडिट रिपोर्ट और हिस्ट्री को वित्तीय अनुशासन का प्रतीक मानते हैं। श्रीवास्तव कहते हैं, ‘क्रेडिट हिस्ट्री से पता चलता है कि ग्राहक के पैसे संभालते समय व्यक्ति कितनी ज्यादा जिम्मेदारी के साथ काम कर पाएगा।’
क्रेडिट हिस्ट्री को कर्मचारी की ईमानदारी या निष्ठा का सबूत भी माना जाता है और इससे यह भी पता चल जाता है कि वह धोखाधड़ी तो नहीं करेगा या गलत चीजों के प्रभाव में तो नहीं आएगा। राममूर्ति कहते हैं, ‘पैसे से जुड़े पदों पर काम करना हो तो कर्ज चुकाने के मामले में खराब रिकॉर्ड बताता है कि कदाचार या गलत फैसले लेने की आशंका ज्यादा हो सकती है।’
भारत में नियोक्ताओं द्वारा क्रेडिट स्कोर के इस्तेमाल पर साफ रोक नहीं है। मगर विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी तौर पर इसकी मान्यता इस बार निर्भर करती है कि इसकी कितनी जरूरत है, इसके लिए सहमति ली गई है और इसका कितना इस्तेमाल किया जा रहा है। क्रेडिट स्कोर का इस्तेमाल क्रेडिट सूचना कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 के अनुसार किया जाता है। नौकरी देने वालों को इसकी जानकारी निकालने से पहले उम्मीदवार को बताना चाहिए और उसकी रजामंदी लेनी चाहिए। सोनम कहती हैं, ‘संविधान के अनुच्छेद 14 में तय किए गए निजता के संवैधानिक अधिकार को देखते हुए क्रेडिट हिस्ट्री का न तो मनमाना इस्तेमाल किया जाना चाहिए और न ही बेतुका।’
नियोक्ता जांच-पड़ताल की लंबी-चौड़ी प्रक्रिया के तहत कुछ खास पदों के लिए क्रेडिट स्कोर का सीमित इस्तेमाल कर सकते हैं। सोनम आगाह करती हैं, ‘इसे सभी पदों के लिए आवेदक छांटने का जरिया बना दिया गया तो कानूनी तौर पर इसकी मान्यता कम हो सकती है और इसे चुनौती भी दी जा सकती है।’
नियोक्ताओं को भर्ती के शुरुआती दौर में ही बता देना चाहिए कि अच्छा क्रेडिट स्कोर होना जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय में चैंबर्स ऑफ वरुण कटियार में वकील वरुण कटियार कहते हैं, ‘सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के आदेश आ चुके हैं कि नौकरी देने से किसी ऐसी शर्त के आधार पर मना नहीं किया जा सकता, जो भर्ती के विज्ञापन में मौजूद नहीं थी।’
जिन पदों का वित्तीय जिम्मेदारी से कोई लेना-देना नहीं है, उनके लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को खराब क्रेडिट स्कोर के नाम पर बिना सोचे-समझे मना नहीं किया जा सकता। ऐसा किया गया तो उसे मनमानी माना जा सकता है।
किसी उम्मीदवार को खारिज करने से पहले नियोक्ता को यह भी देखना चाहिए कि क्रेडिट स्कोर किस वजह से बिगड़ा है। सोनम की सलाह है, ‘उन्हें इलाज के वास्ते लिए गए कर्ज, कुछ समय की वित्तीय परेशानी या विरासत में मिली दिक्कतों जैसी बातों पर भी गौर करना चाहिए।’
बीएफएसआई क्षेत्र में नौकरी के लिए जा रहे उम्मीदवारों को खास तौर पर आवेदन करने से 6 से 12 महीने पहले अपनी क्रेडिट रिपोर्ट जरूर जांच लेनी चाहिए। सबसे पहले उन्हें देखना चाहिए कि कर्ज और दूसरी देनदारी चुकाने का उनका रिकॉर्ड कैसा रहा है। ट्रांसयूनियन सिबिल के प्रवक्ता कहते हैं कि क्रेडिट स्कोर पर इस बात का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। उम्मीदवारों को यह भी देख लेना चाहिए कि उनके नाम पर डीफॉल्ट, देर से अदायगी और बकाया खाते तो नहीं चढ़े हैं।
इस प्रकार की चूक भी क्रेडिट स्कोर कम कर सकती हैं। अगर उम्मीदवार को अपनी रिपोर्ट में कोई ऐसा कर्ज दिखता है, जो उसने लिया ही नहीं था या अदायगी के रिकॉर्ड में गलती नजर आती है तो उसे फौरन क्रेडिट ब्यूरो से शिकायत करनी चाहिए। जिस बैंक या संस्था से गलत जानकारी मिली है, ब्यूरो तुरंत उसके पास शिकायत भेजता है। ऐसी शिकायतें आम तौर पर 30 दिन के भीतर निपटा दी जाती हैं।
स्कोर सुधारने में लगता है समय
क्रेडिट स्कोर काफी हद तक किसी व्यक्ति की पिछले दो से तीन साल के क्रेडिट रिकॉर्ड पर निर्भर करता है। क्रिफ हाई मार्क के मुख्य परिचालन अधिकारी सुनील अगिठाकलिया समझाते हैं, ‘क्रेडिट स्कोर हाल-फिलहाल में किए गए कामों के बजाय लंबे अरसे तक अनुशासित व्यवहार से सुधरते हैं। कई मामलों मे समय पर अदायगी और कर्ज यानी क्रेडिट कार्ड आदि के नियंत्रित इस्तेमाल से केवल तीन से छह महीने में ही सुधार नजर आने लगता है।’