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इंश्योरेंस कंपनी क्यों खारिज कर देती है क्लेम? ये गलतियां न करें

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जीवन बीमा लेते समय सेहत, आय और नॉमिनी से जुड़ी सही जानकारी देना बेहद जरूरी है, वरना क्लेम के समय बीमा कंपनी दावा खारिज कर सकती है

Last Updated- April 27, 2026 | 8:34 AM IST
Life Insurance claims

Life Insurance Claims: वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवा विभाग के सचिव एम नागराजू ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा कि बीमा कंपनियां पॉलिसी बेचते समय ज्यादा सवाल नहीं पूछतीं मगर जब ग्राहक दावा करने जाता है तो उसकी गहरी जांच-पड़ताल की जाती है। उनका बयान बताता है कि जीवन बीमा कराने वालों को पॉलिसी खरीदते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।

सेहत के बारे में जरूर बताएं

जीवन बीमा पॉलिसियों की कीमत तय करते समय देखा जाता है कि ग्राहकों के एक खास समूह में मृत्यु की संभावना कितनी है। जेनेराली सेंट्रल लाइफ इंश्योरेंस के मुख्य परिचालन अधिकारी नीलेश परमार कहते हैं, ‘ग्राहक की सेहत के बारे में सटीक जानकारी मिल जाए तो बीमा कंपनियों के लिए जोखिम की सही कीमत लगाना आसान हो जाता है।’

बीमा कंपनियां सेहत से जुड़े कुछ खास जोखिमों को पॉलिसियों में शामिल करने के लिए ज्यादा प्रीमियम वसूल सकती हैं, जिसे लोडिंग कहा जाता है। परमार कहते हैं, ‘लेकिन अगर किसी की असमय मृत्यु के बाद जांच करने पर पता चले कि सेहत के बारे में गलत जानकारी दी गई थी तो बीमा कंपनी दावा खारिज कर सकती है।’ सेहत से जुड़े सवालों के सही जवाब दें चाहे मधुमेह या उच्च रक्तचाप की ही बात क्यों न हो। परमार की सलाह है, ‘अगर आप तंबाकू, शराब आदि का सेवन करते हैं या धूम्रपान करते हैं तो अपनी जीवनशैली से जुड़ी इन आदतों का खुलासा भी जरूर करें।’

जरूरत हो तो सेहत की जांच भी कराएं। परमार समझाते हैं, ‘डॉक्टर के पास जांच कराने से उन बीमारियों का भी पता चल जाता है, जो ग्राहक को हैं मगर जिनके बारे में वह बता नहीं पाया है।’

आय की गलत जानकारी न दें

कुछ ग्राहक अधिक रकम का बीमा कराने के लिए अपनी आय बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। गलत आय बताने पर बीमा कंपनी पूछ सकती है कि ग्राहक प्रीमियम भर भी पाएगा या नहीं। याद रखें कि जीवन बीमा का मकसद नुकसान की भरपाई करना है उससे फायदा कमाना नहीं। अगर ग्राहक अपनी आय की गलत जानकारी देता है तो उसका दावा खारिज हो सकता है या दावे में से छोटी सी रकम ही उसे मिल सकती है। छोटी रकम की बीमा पॉलिसी के लिए आय का प्रमाणपत्र शायद अनिवार्य नहीं हो।

इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के निदेशक वेंकटेश नायडू कहते हैं, ‘प्रीमियम ज्यादा हो या बहुत अधिक रकम का बीमा किया जा रहा हो तो कंपनियां आयकर रिटर्न, सैलरी स्लिप या बैंक स्टेटमेंट आदि की मांग करती हैं।’ अपनी सही आय बताएं और जरूरत पड़ने पर उससे जुड़े सही दस्तावेज पेश करें।

यह पढ़ें: बीमा लिया लेकिन पैसा नहीं मिला? क्लेम रिजेक्शन के ये छिपे कारण आपको चौंका देंगे

नॉमिनी में गलती न करें

ग्राहक अक्सर नॉमिनेशन का खाना खाली छोड़ देते हैं या नॉमिनी के साथ अपना रिश्ता नहीं बताते हैं। केएस लीगल ऐंड एसोसिएट्स में मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी कहती हैं, ‘पॉलिसीधारक कभी-कभी नाबालिगों को नॉमिनी बना देते हैं मगर उनका कोई अभिभावक नहीं बनाते।’ कई लोग जिंदगी के खास पड़ाव पार करने के बाद नॉमिनी को अपडेट करना भूल जाते हैं। चंदवानी कहती हैं, ‘अमान्य या पुराने नॉमिनेशन के कारण देर होती है क्योंकि बीमा कंपनियां उत्तराधिकार प्रमाण पत्र या कानूनी उत्तराधिकार का कागज मांगती हैं।’

नॉमिनेशन से जुड़ा समूचा ब्योरा बहुत सावधानी के साथ भरें। इसमें नॉमिनी का पूरा नाम, उसके साथ रिश्ता, उसकी आयु और संपर्क का विवरण शामिल होना चाहिए। यदि नॉमिनी नाबालिग है तो उसके लिए योग्य व्यक्ति को नियुक्त करें और उसका पूरा ब्योरा दें। चंदवानी आगाह करती हैं, ‘नॉमिनेशन वसीयत या एस्टेट प्लानिंग में दिए गए नामों के विपरीत नहीं होना चाहिए।’ बीच-बीच में नॉमिनेशन पर नजर दौड़ते रहना चाहिए क्योंकि बीमा पॉलिसी लंबे अरसे के लिए होती है और उस दौरान परिस्थितियां बदलती रहती हैं।

Life Insurance Claims: दूसरी पॉलिसी हो तो बताएं

बीमा कंपनियां यह तय करने के लिए दूसरी पॉलिसियों के बारे में पूछती हैं कि किसी व्यक्ति ने जरूरत से ज्यादा बीमा तो नहीं ले रखा है। सिक्योरनाउ इंश्योरेंस ब्रोकर के सह-संस्थापक कपिल मेहता कहते हैं, ‘इससे बीमा कंपनी को यह पक्का करने में मदद मिलती है कि ग्राहक प्रीमियम चुका पाएगा या नहीं और बीमा की कुल रकम उचित है या नहीं।’ बीमा कंपनी को इससे यह समझने में भी मदद मिलती है कि पिछला बीमा उचित प्रीमियम पर दिया गया था और सेहत की दिक्कतों के कारण ज्यादा प्रीमियम पर तो नहीं दिया गया।

Life Insurance Claims: प्रपोजल फॉर्म जांचें और सत्यापन करें

बीमा पॉलिसी के प्रपोजल फॉर्म अक्सर एजेंट भरते हैं, इसलिए भरने के बाद फॉर्म जांच जरूर लें। मेहता कहते हैं, ‘इसमें सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी होती है, जिसकी जिम्मेदारी पॉलिसीधारक की होती है।’ बीमाकर्ता सत्यापन के लिए फोन करता है, जो ग्राहक को महफूज रखने के लिए होती है। इंडियाफर्स्ट लाइफ इंश्योरेंस के मुख्य परिचालन अधिकारी अत्रि चक्रवर्ती कहते हैं, ‘सत्यापन यह पक्का करने के लिए होता है कि पॉलिसी ग्राहक की जरूरतों के मुताबिक है या नहीं और उसकी खासियतों को वे समझते हैं या नहीं।’ सत्यापन के दौरान कंपनियां ग्राहक सो व्यक्तिगत विवरण जांचती हैं और उन्हें पॉलिसी का पूरा ब्योरा देती हैं। चक्रवर्ती कहते हैं, ‘ग्राहकों से उनकी सेहत की स्थिति बताने के लिए भी कहा जा सकता है। उस दौरान किसी के भी कहे पर नहीं चलें बल्कि सही जानकारी ही दें।’

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First Published - April 27, 2026 | 8:19 AM IST

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