रिटायरमेंट की दूसरी पारी में सुकून की नींद तभी आती है जब बैंक खाते में हर महीने एक बंधी-बंधाई रकम आती रहे। आज के दौर में म्युचुअल फंड का ‘सिस्टमैटिक विड्रॉल प्लान’ (SWP) रिटायर्ड लोगों के लिए एक आधुनिक और स्मार्ट पेंशन का जरिया बनकर उभरा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी इस ‘मंथली इनकम’ के पीछे टैक्स का एक गहरा गणित छिपा है?
अक्सर हम पैसे निवेश तो कर देते हैं, लेकिन ये भूल जाते हैं कि जब निकालने की बारी आती है तो सरकार भी हमारे मुनाफे में हिस्सा लेती है। फिर चाहे आप शेयर बाजार (equity) में निवेश कर रहे हों या डेट फंड्स में, टैक्स के बदलते नियम आपके असली रिटर्न को कम-ज्यादा कर सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि पहले से समझदारी दिखाते हुए प्लानिंग की जाए। आइए, एक्सपर्ट्स की सलाह से जानते हैं कि कैसे आप अपनी मेहनत की कमाई पर टैक्स का असर कम करके एक मजबूत और सुरक्षित फाइनेंशियल फ्यूचर बना सकते हैं।
म्यूचुअल फंड पर टैक्स इस बात पर निर्भर करता है कि आपने अपना निवेश कितने समय तक होल्ड करके रखा है। SK पटोदिया एंड एसोसिएट LLP में डायरेक्ट टैक्स के एसोसिएट डायरेक्टर, मिहिर तन्ना बताते हैं, “SWP के जरिए जब भी आप पैसा निकालते हैं, उसे एक अलग रिडेम्प्शन यानी बिक्री माना जाता है। हर बार निकासी पर कैपिटल गेन इसी आधार पर निकाला जाता है कि आपने उन यूनिट्स को कितने दाम पर खरीदा था और कितने समय तक अपने पास रखा था।”
इक्विटी यानी शेयर बाजार से जुड़े फंड्स के टैक्स नियम काफी सीधे हैं। अगर आप 12 महीने के अंदर निवेश से पैसा निकाल लेते हैं, तो इसे शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) माना जाता है और इस पर 20% टैक्स लगता है। वहीं, अगर निवेश 12 महीने से ज्यादा समय तक रखा गया है, तो यह लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) बन जाता है।
ध्रुवा एडवाइजर्स के पार्टनर दीपेश छेड़ा के मुताबिक, “इक्विटी फंड्स में एक फाइनेंशियल ईयर में 1.25 लाख रुपये तक का लॉन्ग टर्म मुनाफा पूरी तरह टैक्स फ्री रहता है। अगर मुनाफा इससे ज्यादा है, तो अतिरिक्त रकम पर 12.5% टैक्स देना होता है।”
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रिटायर लोगों के लिए डेट म्यूचुअल फंड आमतौर पर सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन इनके टैक्स नियम हाल के सालों में काफी बदल गए हैं। मिहिर तन्ना के मुताबिक, 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद खरीदे गए डेट फंड्स से होने वाली कमाई को अब हमेशा शॉर्ट टर्म ही माना जाएगा, चाहे आपने उसे कितने भी समय तक होल्ड किया हो। आसान शब्दों में समझें तो अब इस तरह की कमाई पर आपको अपने इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से ही टैक्स देना पड़ेगा।
इसके अलावा, भविष्य के नियमों को लेकर मिहिर तन्ना बताते हैं कि 1 अप्रैल 2025 के बाद होने वाले ट्रांजेक्शन में चीजें और साफ हो जाएंगी। अगर कोई फंड अपनी कुल रकम का 65% से ज्यादा हिस्सा डेट या मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में लगाता है, तो उसे डेट म्यूचुअल फंड माना जाएगा। हालांकि, गोल्ड ETF और विदेशी इंडेक्स फंड्स पर पुराने नियम ही लागू रहेंगे, जहां 12 महीने से कम की होल्डिंग को शॉर्ट टर्म माना जाएगा।
रिटायरमेंट के बाद जब आप म्यूचुअल फंड से पैसा निकालते हैं, तो कंपनियां ‘फर्स्ट-इन, फर्स्ट-आउट’ (FIFO) का नियम अपनाती हैं। दीपेश छेड़ा के मुताबिक, इसका सीधा मतलब है कि आपने जो यूनिट्स सबसे पहले खरीदी थीं, निकासी के समय वही सबसे पहले बेची हुई मानी जाती हैं। इसी आधार पर यह तय होता है कि आपकी होल्डिंग अवधि कितनी रही और उसी के हिसाब से टैक्स की गणना की जाती है।
SWP की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जब आप हर महीने एक तय रकम निकालते हैं, तो उस पूरी राशि पर टैक्स नहीं लगता। मान लीजिए आप 20,000 रुपये निकालते हैं, तो उसमें से ज्यादातर हिस्सा आपकी अपनी जमा की हुई पूंजी (Principal) होती है और केवल छोटा सा हिस्सा मुनाफा (Capital Gain) माना जाता है। टैक्स सिर्फ इसी मुनाफे वाले हिस्से पर देना पड़ता है। यही वजह है कि यह बैंक FD के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि FD में मिलने वाला पूरा ब्याज आपकी कुल आय में जुड़ता है और उस पर आपके टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है।
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क्या बुजुर्गों को म्यूचुअल फंड टैक्स में कोई खास छूट मिलती है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके लिए कोई अलग सेक्शन नहीं है, लेकिन वे ‘बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट’ का फायदा जरूर उठा सकते हैं। मिहिर तन्ना के मुताबिक, “अगर किसी बुजुर्ग की कुल सालाना आय टैक्स छूट की सीमा से कम है, तो वे इस खाली पड़े हिस्से का इस्तेमाल अपने शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर लगने वाले टैक्स को कम करने में कर सकते हैं।”
इसके अलावा, वे 15H फॉर्म भरकर बैंक या फंड हाउस को यह बता सकते हैं कि उनकी आय टैक्स के दायरे में नहीं आती, ताकि TDS न काटा जाए।
टैक्स का बोझ कम करने के लिए एक्सपर्ट्स ‘टैक्स लॉस हार्वेस्टिंग’ और ‘गैन हार्वेस्टिंग’ जैसी रणनीतियों की सलाह देते हैं। दीपेश छेड़ा के मुताबिक, निवेशकों को हर साल इक्विटी फंड्स से 1.25 लाख रुपये तक का लॉन्ग टर्म मुनाफा निकाल लेना चाहिए, क्योंकि यह हिस्सा टैक्स फ्री होता है। इसके बाद अगर आप उसी पैसे को दोबारा निवेश कर देते हैं, तो आपकी खरीद लागत (Cost of Acquisition) बढ़ जाती है, जिससे आगे चलकर बड़ी रकम निकालते समय टैक्स कम देना पड़ता है।
इसी तरह, जिन फंड्स में नुकसान हो रहा है, उन्हें बेचकर आप अपने मुनाफे पर लगने वाले टैक्स को सेट-ऑफ कर सकते हैं। ऐसी छोटी-छोटी प्लानिंग से रिटायर्ड लोग अपनी कमाई पर टैक्स का असर काफी हद तक कम कर सकते हैं।