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Explainer: किस पेंशन पर कितना देना होता है टैक्स? ITR फाइल करने से पहले जानना जरूरी

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रिटायरमेंट या फैमिली पेंशन पर टैक्स के नियम काफी पेचीदा हैं। सही हेड चुनकर और एक्सपर्ट्स के नियमों को समझकर आप टैक्स नोटिस और भारी नुकसान से बच सकते हैं

Last Updated- May 15, 2026 | 3:55 PM IST
Income TAX
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन भले ही एक सीधी-साधी नियमित इनकम की तरह दिखती हो, लेकिन भारत के इनकम टैक्स लॉ के तहत इस पर लगने वाले टैक्स के नियम काफी उलझे हुए हैं। अमूमन लोग सोचते हैं कि पेंशन तो बस पेंशन है, लेकिन सच यह है कि पेंशन कहां से आ रही है और उसे किस तरह लिया जा रहा है, इसी बात से तय होता है कि उस पर कितना टैक्स लगेगा। 

इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करते समय पेंशन की सही जानकारी न देने या गलत दिखाने पर टैक्सपेयर्स को अक्सर भारी टैक्स चुकाना पड़ता है या फिर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस आ जाता है। टैक्स और वेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि टैक्सपेयर्स को पेंशन के हर हिस्से पर लगने वाले टैक्स को अच्छे से समझना चाहिए, ताकि रिटायरमेंट के बाद उनकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रह सके।

रेगुलर पेंशन बनाम एकमुश्त पेंशन का गणित

जब कोई कर्मचारी रिटायर होता है, तो उसे पेंशन पाने के दो विकल्प मिलते हैं। पहला यह कि वह हर महीने एक निश्चित रकम ले, जिसे अनकम्यूटेड या रेगुलर पेंशन कहते हैं। दूसरा विकल्प यह होता है कि वह अपनी पेंशन का एक हिस्सा सरेंडर करके बदले में एकमुश्त मोटी रकम उठा ले, जिसे कम्यूटेड पेंशन कहा जाता है। 

एक्सपर्ट बताते हैं कि हर महीने मिलने वाली अनकम्यूटेड यानी नियमित पेंशन पूरी तरह से टैक्स के दायरे में आती है। चाहे आप सरकारी कर्मचारी रहे हों या गैर-सरकारी, मासिक पेंशन को आपकी सैलरी की तरह ही माना जाएगा और आपकी कुल आय के हिसाब से टैक्स स्लैब के तहत टैक्स लगेगा।

चूंकि रेगुलर पेंशन को ‘सैलरी’ हेड के तहत टैक्स किया जाता है, इसलिए रिटायर्ड कर्मचारी इस पर स्टैंडर्ड डिडक्शन का फायदा उठा सकते हैं। न्यू टैक्स रिजीम के तहत अब 75,000 रुपये का बढ़ा हुआ स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है, जबकि ओल्ड टैक्स रिजीम में यह सीमा 50,000 रुपये है। दूसरी ओर, एकमुश्त मिलने वाली पेंशन पर टैक्स छूट की सीमा इस बात से तय होती है कि आपका एंप्लॉयर कौन था। 

एस के पटोदिया एंड एसोसिएट्स LLP में डायरेक्ट टैक्सेस के एसोसिएट डायरेक्टर मिहिर तन्ना बताते हैं, “केंद्र या राज्य सरकार के रिटायर्ड कर्मचारियों को मिलने वाली पूरी एकमुश्त कम्यूटेड पेंशन टैक्स-फ्री होती है। लेकिन गैर-सरकारी यानी प्राइवेट कर्मचारियों के लिए यह छूट इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें ग्रेच्युटी मिली है या नहीं। अगर कर्मचारी को ग्रेच्युटी मिली है, तो कुल कम्यूटेड पेंशन का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही टैक्स-फ्री होगा, और अगर ग्रेच्युटी नहीं मिली है, तो आधा हिस्सा टैक्स-फ्री होगा। इसके ऊपर की पूरी रकम पर टैक्स देना होता है।”

Also Read: अब Form 12B की जगह Form 122, नौकरी बदलने वाले ध्यान रखें; वरना कट जाएगा टैक्स

फैमिली पेंशन में बदल जाता है टैक्स का पूरा ढांचा

कर्मचारी की मृत्यु के बाद जब उनके जीवनसाथी या कानूनी वारिस को पेंशन मिलती है, तो टैक्स के नियम पूरी तरह बदल जाते हैं। अलंकित लिमिटेड में वेल्थ मैनेजमेंट के बिजनेस हेड शरद चंद का कहना है कि पेंशन टैक्स को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम यहीं पैदा होता है। रिटायर्ड कर्मचारी की खुद की पेंशन सैलरी हेड में जाती है, लेकिन फैमिली पेंशन को ‘इनकम फ्रॉम अदर सोर्स’ यानी अन्य स्रोतों से आय के तहत टैक्स किया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पैसे देने वाले और पाने वाले के बीच सीधे तौर पर कोई एंप्लॉयर-एंप्लॉई यानी मालिक और कर्मचारी का रिश्ता नहीं होता।

शरद बताते हैं, “चूंकि यह सैलरी इनकम नहीं है, इसलिए फैमिली पेंशन पाने वाले लोग सामान्य तौर पर मिलने वाले 75,000 रुपये या 50,000 रुपये वाले स्टैंडर्ड डिडक्शन के हकदार नहीं होते। हालांकि, उन्हें सेक्शन 57(iia) के तहत एक अलग टैक्स छूट दी जाती है।”

इस नियम के मुताबिक, फैमिली पेंशन पाने वाले व्यक्ति को मिलने वाली कुल पेंशन राशि का एक-तिहाई हिस्सा या सरकार की तरफ से तय अधिकतम सीमा तक की रकम, दोनों में से जो कम हो, उस पर टैक्स नहीं देना पड़ता। न्यू टैक्स रिजीम में इस टैक्स छूट की अधिकतम सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी गई है, जबकि ओल्ड टैक्स रिजीम में यह सीमा 15,000 रुपये तक ही है।

इसके अलावा मिहिर तन्ना यह भी बताते हैं कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो जाती है और उसके परिवार को एकमुश्त पेंशन दी जाती है, तो वह पूरी राशि पूरी तरह टैक्स-फ्री मानी जाती है और उस पर कोई टैक्स नहीं लगता।

NPS और EPS जैसी सरकारी व कॉर्पोरेट स्कीम्स के नियम

आज के समय में नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और EPFO की एंप्लॉई पेंशन स्कीम (EPS) रिटायरमेंट फंड के दो बड़े माध्यम बनकर उभरे हैं, लेकिन इनके टैक्स नियम एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं।

सुरेश सुराना के मुताबिक, EPFO द्वारा दी जाने वाली EPS पेंशन को सामान्य रेगुलर पेंशन की तरह ही माना जाता है। यह पूरी तरह से टैक्सेबल होती है और इसे टैक्सपेयर की कुल सालाना आय में जोड़कर टैक्स निकाला जाता है।

वहीं दूसरी ओर, NPS के मामले में नियम काफी दिलचस्प और अलग हैं। जब कोई व्यक्ति मैच्योरिटी पर NPS से पैसा निकालता है, तो कुल जमा कॉर्पस का 60% तक हिस्सा एकमुश्त निकाला जा सकता है, जो पूरी तरह से टैक्स-फ्री होता है। बाकी बचे कम से कम 40% हिस्से से एन्युटी यानी रेगुलर पेंशन प्लान खरीदना जरूरी होता है।

इस जरूरी एन्युटी प्लान को लेकर शरद चंद एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनका कहना है कि भले ही NPS से 60% एकमुश्त रकम निकालना टैक्स-फ्री हो, लेकिन उसके बाद बची हुई रकम से जो नियमित एन्युटी यानी पेंशन हर महीने मिलती है, वह पूरी तरह से टैक्सेबल होती है। 

ठीक इसी तरह, बीमा कंपनियों के अन्य इंश्योरेंस पेंशन प्लान से मिलने वाली एन्युटी इनकम पर भी स्लैब रेट के हिसाब से पूरा टैक्स लगता है। 

इसके अलावा मिहिर तन्ना बताते हैं कि NPS Tier-II अकाउंट में किए गए निवेश पर यह टैक्स छूट लागू नहीं होती। वहीं, बड़े टैक्सपेयर्स को जरूरत से ज्यादा टैक्स फायदा लेने से रोकने के लिए एक सीमा भी तय की गई है। 

नियम के मुताबिक, अगर किसी कर्मचारी के लिए कंपनी की तरफ से NPS, प्रोविडेंट फंड (PF) और सुपरएनुएशन फंड (Superannuation Fund) में कुल सालाना योगदान 7.5 लाख रुपये से ज्यादा हो जाता है, तो इस सीमा से ऊपर की रकम पर टैक्स छूट नहीं मिलती। सिर्फ तय सीमा से ज्यादा जमा रकम ही नहीं, बल्कि उस पर मिलने वाला ब्याज या रिटर्न भी टैक्स के दायरे में शामिल हो जाता है। 

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ITR फाइलिंग में पेंशनर्स की आम गलतियां और समाधान

टैक्स नियमों की सही समझ न होने के कारण अक्सर पेंशनर्स इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय कुछ ऐसी आम गलतियां कर बैठते हैं, जो उन्हें भारी पड़ जाती हैं। सबसे बड़ी गलती फैमिली पेंशन को सैलरी हेड में दिखा देना है, जिससे डिडक्शन का कैलकुलेशन गलत हो जाता है और डेटा मिसमैच होने के कारण टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस आ जाता है। 

इसके अलावा कई बार पेंशनर्स को पिछले महीनों या सालों का रुका हुआ पैसा यानी एरियर एक साथ मिल जाता है, जिससे वे अचानक किसी हाई टैक्स स्लैब में आ जाते हैं। 

सुरेश सुराना के मुताबिक, ऐसे मामलों में टैक्स का बोझ कम करने के लिए IT एक्ट 2025 के सेक्शन 157 (जो पहले IT एक्ट 1961 का सेक्शन 89 हुआ करता था) के तहत टैक्स रिलीफ क्लेम किया जा सकता है, जिससे टैक्स के बोझ को उन वर्षों में फैलाया जा सके जिनसे वह एरियर संबंधित है।

एक और बड़ी समस्या रिजीम के चुनाव और डिडक्शन के घालमेल को लेकर देखी जाती है। कई पेंशनर्स न्यू टैक्स रिजीम को चुन तो लेते हैं, लेकिन ओल्ड रिजीम के डिडक्शन जैसे सेक्शन 80C आदि क्लेम करने की गलती कर बैठते हैं, जबकि कुछ लोग नए रिजीम में मिलने वाले 75,000 रुपये के बढ़े हुए स्टैंडर्ड डिडक्शन को क्लेम करना ही भूल जाते हैं।

टैक्स एक्सपर्ट्स की सलाह है कि किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई या नोटिस से बचने के लिए पेंशनर्स को ITR फाइल करने से पहले अपनी पेंशन आय और कटे हुए TDS का मिलान अपने Form 26AS और AIS (Annual Information Statement) से जरूर कर लेना चाहिए। इसके अलावा, जो पेंशन पूरी तरह से टैक्स-फ्री है, उसे भी ITR के ‘Exempt Income’ शेड्यूल में सही तरीके से घोषित करना बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी न हो।

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First Published - May 15, 2026 | 3:40 PM IST

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