घर खरीदने वालों के अधिकारों को मजबूत करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी फ्लैट या घर के भुगतान से जुड़े विवाद के आधार पर बिल्डर खरीदार को संक्षिप्त कानूनी प्रक्रिया के जरिए बेदखल नहीं कर सकते।
अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 6 का उपयोग करना गलत है, क्योंकि यह प्रावधान केवल उस स्थिति के लिए बनाया गया है जब किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से गैरकानूनी तरीके से जबरन बेदखल कर दिया गया हो।
यह मामला पुणे के एक फ्लैट से जुड़ा है, जिसे वर्ष 2004 में एक खरीदार ने खरीदा था। बाद में बिल्डर ने दावा किया कि खरीदार ने लगभग 46 हजार रुपये का भुगतान नहीं किया है। इसी आधार पर बिल्डर ने अदालत में मामला दायर कर फ्लैट खाली कराने की मांग की।
बिल्डर ने अपनी याचिका में विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 6 का सहारा लिया और कहा कि खरीदार को संपत्ति से हटाया जाए। निचली अदालत ने इस आधार पर खरीदार के खिलाफ बेदखली का आदेश दे दिया।
मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने पूरे विवाद की प्रकृति को ध्यान से देखा। अदालत ने पाया कि यह मामला किसी को गैरकानूनी तरीके से संपत्ति से बेदखल करने का नहीं, बल्कि केवल भुगतान से जुड़े अनुबंधीय विवाद का है।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 6 का इस्तेमाल ऐसे मामलों में नहीं किया जा सकता जहां विवाद भुगतान, अनुबंध या स्वामित्व के अधिकार से जुड़ा हो। इसलिए अदालत ने निचली अदालत के बेदखली आदेश को रद्द कर दिया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 6 एक सीमित और त्वरित उपाय प्रदान करती है। इसका मकसद केवल यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से जबरन या गैरकानूनी तरीके से हटाया गया हो, तो उसे जल्द से जल्द फिर से कब्जा मिल सके।
इस प्रक्रिया में अदालत संपत्ति के मालिकाना हक या अनुबंध से जुड़े विवादों की गहराई से जांच नहीं करती। इसलिए इसे केवल उन मामलों में लागू किया जाता है जहां स्पष्ट रूप से अवैध कब्जा हटाने की स्थिति हो।
कानूनी विशेषज्ञ ऋषभ गांधी का कहना है कि धारा 6 का उद्देश्य केवल ऐसी स्थिति में राहत देना है जहां किसी को उसकी संपत्ति से जबरन बेदखल कर दिया गया हो। यह प्रावधान स्वामित्व या अनुबंध से जुड़े विवादों का निपटारा करने के लिए नहीं बनाया गया है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करना कानून के दायरे में नहीं आता। अदालतें ऐसे मामलों में केवल यह देखती हैं कि संबंधित व्यक्ति के पास संपत्ति का कब्जा था या नहीं और क्या उसे छह महीने के भीतर जबरन हटाया गया है।
बहुगुणा लॉ एसोसिएट्स के डिज़िग्नेट पार्टनर अंकित राजगढ़िया के अनुसार, अदालतें जब इस तरह के मामलों की सुनवाई करती हैं तो उनका ध्यान सीमित दायरे में ही रहता है। वे मुख्य रूप से दो बातों पर विचार करती हैं। पहली यह कि क्या वादी के पास संपत्ति का वास्तविक कब्जा था और दूसरी यह कि क्या उसे छह महीने के भीतर उस कब्जे से हटाया गया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वामित्व अधिकार, अनुबंध से जुड़े दायित्व या भुगतान को लेकर चल रहे विवाद जैसे मुद्दे धारा 6 के दायरे में नहीं आते। इसलिए अदालतें इन पहलुओं की जांच इस प्रक्रिया के तहत नहीं करतीं।
एसकेवी लॉ ऑफिसेज के पार्टनर आशुतोष के श्रीवास्तव का कहना है कि यह प्रावधान एक सीमित और त्वरित कानूनी उपाय के रूप में बनाया गया है। इसका उद्देश्य केवल अवैध तरीके से कब्जा छीने जाने की स्थिति में तुरंत राहत देना है। उन्होंने कहा कि यदि विवाद में बिक्री मूल्य, समझौते की समाप्ति या संपत्ति के स्वामित्व जैसे जटिल मुद्दे शामिल हों, तो उन्हें धारा 6 के तहत नहीं सुलझाया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी बिक्री समझौते के तहत यदि खरीदार को संपत्ति का कब्जा दे दिया गया है, तो केवल भुगतान विवाद के आधार पर उस कब्जे को अवैध नहीं माना जा सकता। इसका मतलब यह है कि बिल्डर केवल यह कहकर खरीदार को घर से नहीं निकाल सकता कि भुगतान में कोई कमी रह गई है।
इस संबंध में गांधी का कहना है कि यदि बिल्डर ने खरीदार को फ्लैट का कब्जा दे दिया है, तो बाद में भुगतान को लेकर विवाद होने पर भी वह खरीदार को जबरन बेदखल नहीं कर सकता। ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
पीएसएल एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के एसोसिएट पार्टनर हिमेश ठाकुर ने भी इस बात पर जोर दिया कि अदालत ने साफ संकेत दिया है कि डेवलपर्स धारा 6 का इस्तेमाल करके फ्लैट खरीदारों को कथित बकाया राशि के आधार पर बेदखल नहीं कर सकते। यदि बिल्डर को भुगतान से जुड़ी कोई शिकायत है, तो उसके लिए अलग कानूनी रास्ते मौजूद हैं, लेकिन कब्जा छीनने का अधिकार उन्हें नहीं दिया गया है।
भुगतान विवाद की स्थिति में बिल्डर क्या कर सकते हैं
रियल एस्टेट क्षेत्र में कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जब घर खरीदार और बिल्डर के बीच भुगतान को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। ऐसे मामलों में कुछ बिल्डर खरीदार को घर से बेदखल करने जैसे त्वरित उपाय अपनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका उचित नहीं है। बिल्डरों को ऐसे मामलों में कानून के अनुसार सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का ही सहारा लेना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी खरीदार द्वारा तय समय पर भुगतान नहीं किया जाता है या भुगतान को लेकर विवाद होता है, तो बिल्डर को सीधे बेदखली की कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। उन्हें अदालत में जाकर नियमित कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखना चाहिए।
कानूनी फर्म लेगम सोलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में बिल्डर के पास कई कानूनी विकल्प उपलब्ध होते हैं। बिल्डर अदालत में बकाया राशि की वसूली के लिए सिविल मुकदमा दायर कर सकते हैं। इसके अलावा वे बिक्री समझौते को लागू कराने, उसे रद्द कराने या संपत्ति के स्वामित्व के आधार पर कब्जा प्राप्त करने के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अदालत में मामला जाने से दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है। इस दौरान न्यायालय बिक्री समझौते, भुगतान से जुड़े दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के अधिकारों की विस्तार से जांच करता है। इससे विवाद का निष्पक्ष और कानूनी समाधान निकलने की संभावना अधिक रहती है।
वकीलों का कहना है कि ऐसे किसी भी विवाद में दस्तावेज सबसे मजबूत सबूत होते हैं। इसलिए घर खरीदने वाले लोगों को शुरुआत से ही सभी जरूरी कागजात सुरक्षित रखने चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार घर खरीदारों को सबसे पहले अपने सभी भुगतान का स्पष्ट रिकॉर्ड रखना चाहिए। इसमें बैंक ट्रांसफर, चेक या अन्य माध्यम से किए गए भुगतान के प्रमाण शामिल होने चाहिए। इससे यह साबित करना आसान हो जाता है कि खरीदार ने किस समय कितना भुगतान किया है।
इसके अलावा बिक्री से जुड़ा समझौता पंजीकृत होना भी बेहद जरूरी है। पंजीकृत समझौता कानूनी रूप से अधिक मजबूत माना जाता है और विवाद की स्थिति में अदालत में प्रभावी सबूत के रूप में काम करता है।
खरीदारों को आवंटन पत्र, कब्जा से जुड़े दस्तावेज और बिल्डर के साथ हुई सभी लिखित बातचीत को भी सुरक्षित रखना चाहिए। इनमें ईमेल, पत्राचार या अन्य आधिकारिक संचार शामिल हो सकते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट की अधिवक्ता निकिता राठी का कहना है कि यदि खरीदार के पास मजबूत और व्यवस्थित दस्तावेज होते हैं तो वह अपने वैध कब्जे और अधिकारों को आसानी से साबित कर सकता है। ऐसे मामलों में दस्तावेज ही खरीदार की सबसे बड़ी कानूनी सुरक्षा बनते हैं।