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प्रॉपर्टी में को-ओनरशिप: कागजों पर पार्टनरशिप व जमीन पर कानूनी जंग? जानें हिस्सा बेचने और कब्जे के नियम

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भारत में प्रॉपर्टी को-ओनरशिप कानूनी मुश्किलों से भरी है। हिस्सा बेचने की आजादी तो है, लेकिन कब्जे, लोन और पुनर्विकास के लिए सभी मालिकों की सहमति जरूरी होती है

Last Updated- April 27, 2026 | 6:49 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

प्रॉपर्टी खरीदना हमेशा से लोगों के लिए एक बड़ा सपना रहा है, और इस सपने को पूरा करने के लिए अक्सर लोग मिलकर यानी ‘को-ओनरशिप’ में निवेश करते हैं। कागजों पर तो यह व्यवस्था बहुत आसान और फायदेमंद दिखती है, लेकिन हकीकत में यह कई बार आपसी कड़वाहट, कानूनी विवादों और आर्थिक नुकसान की वजह बन जाती है। भारतीय कानून में को-ओनरशिप को लेकर अधिकार तो स्पष्ट हैं, लेकिन उन अधिकारों को व्यवहार में लागू करना उतना ही पेचीदा है।

हिस्सा बेचने की आजादी, मगर कब्जे पर सस्पेंस

भारतीय संपत्ति कानून के मुताबिक, अगर आप किसी प्रॉपर्टी में को-ओनर हैं, तो आप अपना हिस्सा किसी दूसरे को बेचने या ट्रांसफर करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसके लिए आपको दूसरे हिस्सेदारों से इजाजत लेने की कानूनी जरूरत नहीं होती। लेकिन यहीं से असली समस्या शुरू होती है। गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहील पटेल के मुताबिक, जब आप अपना हिस्सा बेचते हैं, तो आप प्रॉपर्टी का कोई खास कोना या कमरा नहीं बेच रहे होते, बल्कि पूरी संपत्ति में अपना एक ‘अविभाजित हिस्सा’ (Undivided Share) बेचते हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि खरीदने वाला व्यक्ति आपकी कानूनी जगह तो ले लेता है, लेकिन प्रॉपर्टी अभी भी ज्वाइंट ही रहती है। इस पर स्पष्टता की कमी होने के कारण ऐसी डील्स बाजार में बहुत बेहतर नहीं मानी जातीं।

‘ताराक्ष लॉयर्स एंड कंसल्टेंट्स’ के मैनेजिंग पार्टनर कुणाल शर्मा का कहना है कि नया खरीदार प्रॉपर्टी के किसी खास हिस्से पर अपना दावा नहीं कर सकता।

‘वेस्टा लीगल’ की पार्टनर आश्ना कॉन्ट्रैक्टर का कहना है कि इस तरह के सौदे अक्सर विवाद और मुकदमों तक पहुंच जाते हैं, क्योंकि कोई एक खरीदार बाकी मालिकों को प्रॉपर्टी से बाहर नहीं कर सकता, और इसी वजह से कई बार ‘डेडलॉक’ यानी गतिरोध की स्थिति बन जाती है। वहीं, बैंक भी ऐसे मामलों में काफी सख्त रहते हैं और इस तरह के हिस्सों पर लोन देने से बचते हैं।

इस्तेमाल का हक बराबर, पर दखलंदाजी की मनाही

को-ओनरशिप का सबसे बुनियादी नियम यह है कि हर मालिक का पूरी प्रॉपर्टी पर बराबर हक होता है। जब तक प्रॉपर्टी का कानूनी तौर पर बंटवारा नहीं हो जाता, तब तक कोई भी एक मालिक दूसरे को किसी हिस्से का इस्तेमाल करने से नहीं रोक सकता। कुणाल शर्मा के मुताबिक, किसी भी हिस्सेदार को प्रॉपर्टी से बाहर करना या उसे जबरन रोकना कानून के खिलाफ है।

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आश्ना कॉन्ट्रैक्टर के मुताबिक, अगर कोई को-ओनर दूसरे को प्रॉपर्टी में घुसने से रोकता है, तो इसे कानूनन गलत माना जाता है और इसके खिलाफ सिविल केस या ‘ट्रेसपास’ (अनाधिकार प्रवेश) का दावा किया जा सकता है। लेकिन जमीन पर हालात इतने आसान नहीं होते।

राहील पटेल कहते हैं कि अगर एक मालिक ने प्रॉपर्टी पर कब्जा कर रखा है, तो दूसरे मालिक को अपना हक पाने के लिए अक्सर कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यही वजह है कि कागजों में मिले हक और उसे असल में हासिल करने के बीच का गैप ही ज्यादातर विवादों की जड़ बनता है।

जब विवाद बढ़ जाए तो बंटवारा या मुआवजा ही रास्ता?

जब को-ओनर्स के बीच आपसी सहमति खत्म हो जाती है, तो कानून ‘पार्टीशन सूट’ यानी बंटवारे के मुकदमे का रास्ता देता है। बंटवारा कानून, 1893 के तहत कोर्ट प्रॉपर्टी को फिजिकली बांटने का आदेश दे सकता है। लेकिन अगर प्रॉपर्टी ऐसी हो जिसे बांटना मुमकिन न हो, जैसे छोटा फ्लैट, तो कोर्ट उसे बेचने का आदेश भी दे सकता है।

एडवोकेट दिव्या अलेक्जेंडर (डी.एम. हरीश एंड कंपनी) के मुताबिक, जब बंटवारा संभव नहीं होता, तो कोर्ट प्रॉपर्टी बेचकर मिलने वाले पैसे को सभी हिस्सेदारों में बांट देता है, जिसे एक तरह का ‘क्लीन एग्जिट’ माना जाता है। इसके अलावा, अगर कोई एक हिस्सेदार पूरी प्रॉपर्टी पर कब्जा करके बैठा है या उससे किराया कमा रहा है और बाकी लोगों को उनका हिस्सा नहीं दे रहा, तो दूसरे हिस्सेदार ‘मेस्ने प्रॉफिट्स’ यानी मुआवजे की मांग भी कर सकते हैं।

कहां जरूरी है सबकी रजामंदी?

आप अपने हिस्से को बेचने के लिए भले ही आजाद हों, लेकिन प्रॉपर्टी से जुड़े बड़े फैसले आप अकेले नहीं ले सकते। राहील पटेल के मुताबिक, अगर पूरी प्रॉपर्टी को लीज पर देना हो, उसे गिरवी रखकर लोन लेना हो या उसका रिडेवलपमेंट कराना हो, तो सभी को-ओनर्स की लिखित सहमति जरूरी होती है। बिना सबकी मंजूरी के लिया गया ऐसा कोई भी फैसला कानूनन गलत माना जा सकता है।

कुणाल शर्मा के मुताबिक, बैंक और वित्तीय संस्थान भी सभी मालिकों के हस्ताक्षर के बिना लोन की फाइल आगे नहीं बढ़ाते। वहीं, ‘एकॉर्ड ज्यूरिस’ के मैनेजिंग पार्टनर अलय रिजवी एक और व्यावहारिक परेशानी की तरफ ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार, अगर प्रॉपर्टी किसी हाउसिंग सोसाइटी का हिस्सा है, तो वहां के नियमों के साथ-साथ अन्य सदस्यों की औपचारिक मंजूरी भी लेनी पड़ सकती है, जिससे पूरी प्रक्रिया और ज्यादा जटिल हो जाती है।

आखिर में, एक्सपर्ट्स यही सलाह देते हैं कि को-ओनरशिप से जुड़े विवादों से बचने का सबसे सीधा तरीका है या तो प्रॉपर्टी का कानूनी बंटवारा करवा लिया जाए, या फिर अपना हिस्सा लेकर उससे बाहर निकल जाना।

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First Published - April 27, 2026 | 6:44 PM IST

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