हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) में परिवार के मुखिया यानी ‘कर्ता’ की मृत्यु के बाद अक्सर संपत्ति और उसके प्रबंधन को लेकर भ्रम की स्थिति बन जाती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इस स्थिति में HUF का ढांचा कैसे आगे चलता है और कौन इसकी जिम्मेदारी संभालता है।
Karta की मृत्यु के बाद HUF समाप्त नहीं होता। यह पहले की तरह ही एक कानूनी और टैक्स इकाई के रूप में जारी रहता है और उसका PAN भी वही रहता है। केवल बदलाव यह होता है कि मृत Karta का व्यक्तिगत हिस्सा उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत मिल जाता है, जबकि HUF की बाकी संपत्ति परिवार के संयुक्त स्वामित्व में बनी रहती है।
CA पराग जैन, टैक्स हेड, 1 Finance के अनुसार, Karta के निधन के बाद परिवार का सबसे बड़ा जीवित coparcener आमतौर पर नया Karta बन जाता है। इसके लिए किसी अदालत की नियुक्ति की जरूरत नहीं होती, क्योंकि यह प्रक्रिया कानून के अनुसार स्वतः होती है।
नए Karta को बैंक, आयकर विभाग और अन्य वित्तीय संस्थानों में जरूरी दस्तावेज अपडेट करने होते हैं। यदि सभी सह-उत्तराधिकारी सहमत हों, तो परिवार का कोई भी सदस्य आपसी सहमति से Karta बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले CIT बनाम सेठ गोविंदराम शुगर मिल्स (1965) में भी इस व्यवस्था को मान्यता दी गई है।
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2005 के हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम के बाद बेटियों को भी जन्म से ही coparcener का अधिकार मिला है, जिससे वे बेटों के बराबर अधिकार रखती हैं।
CA पराग जैन के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट ने सुजाता शर्मा बनाम मनु गुप्ता मामले में स्पष्ट किया था कि यदि बेटी coparcener है, तो वह Karta भी बन सकती है। कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं को coparcenary अधिकार देने के बाद उन्हें Karta से वंचित करना कानून की भावना के विपरीत होगा।
हालांकि कुछ सीमाएं भी हैं। विधवा महिला Karta नहीं बन सकती क्योंकि वह coparcener नहीं मानी जाती। वहीं, विवाहित बेटी अपने पिता के HUF की Karta रह सकती है, लेकिन अपने पति के HUF की Karta नहीं बन सकती।
कानूनी स्थिति स्पष्ट है, लेकिन व्यवहार में अभी भी कई जगहों पर सामाजिक स्वीकार्यता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।