हाल के वर्षों में स्वास्थ्य बीमा लेने वालों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके बावजूद परिवारों पर मेडिकल खर्च का बोझ पूरी तरह कम नहीं हो पा रहा है। अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में तो बीमा कुछ राहत देता है, लेकिन कई ऐसे खर्च होते हैं जो पॉलिसी के दायरे से बाहर रह जाते हैं। इन्हीं कारणों से लोगों को अपनी जेब से बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है।
स्टेवेल.हेल्थ के को-फाउंडर अरुण राममूर्ति का कहना है कि यही गैप हेल्थ कॉर्पस की जरूरत को बढ़ाता है, क्योंकि बीमा हर स्थिति में पूरी सुरक्षा नहीं दे पाता।
हेल्थ कॉर्पस एक ऐसा फंड होता है जिसे सिर्फ मेडिकल जरूरतों के लिए अलग से बनाया जाता है। यह इमरजेंसी फंड से अलग होता है। इमरजेंसी फंड का इस्तेमाल नौकरी छूटने, अचानक खर्च या अन्य वित्तीय झटकों के लिए किया जाता है, जबकि हेल्थ कॉर्पस केवल स्वास्थ्य संबंधी खर्चों के लिए रखा जाता है।
अरुण राममूर्ति के अनुसार, इसे व्यक्ति की उम्र, परिवार में आश्रितों की संख्या, स्वास्थ्य जोखिम और बीमा कवरेज की कमी को ध्यान में रखकर तैयार करना चाहिए।
आंकड़ों के अनुसार भारत में स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 39 से 47 प्रतिशत हिस्सा सीधे परिवारों को अपनी जेब से देना पड़ता है। यह दुनिया में सबसे अधिक अनुपातों में से एक है।
अरुण राममूर्ति बताते हैं कि बीमा होने के बावजूद कई खर्च ऐसे होते हैं जो कवर नहीं होते, जैसे अस्पताल के अतिरिक्त सामान, कमरे की सीमा से अधिक खर्च, को-पेमेंट, यात्रा खर्च, अटेंडेंट की लागत और कुछ उपचारों की लागत।
विशेषज्ञ के अनुसार कई बीमा पॉलिसियों में पहले से मौजूद बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड होता है। इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य और फर्टिलिटी ट्रीटमेंट जैसी सुविधाएं अक्सर सीमित कवरेज में आती हैं। रोबोटिक सर्जरी और इम्यूनोथेरेपी जैसे आधुनिक इलाज भी कई बार पूरी तरह कवर नहीं होते या उन पर सब-लिमिट लगी होती है।
अरुण राममूर्ति का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की लागत हर साल तेजी से बढ़ रही है। भारत में मेडिकल खर्च में लगभग 10 से 14 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि देखी जा रही है, जिससे 5 से 7 साल में इलाज का खर्च लगभग दोगुना हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार हेल्थ कॉर्पस लंबी अवधि के निवेश को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाता है। यह मेडिकल इमरजेंसी के समय निवेश से पैसे निकालने की मजबूरी को कम करता है।
विशेषज्ञ राममूर्ति का कहना है कि अगर हेल्थ कॉर्पस न हो, तो परिवारों को कई बार इक्विटी निवेश, रिटायरमेंट सेविंग्स या प्रोविडेंट फंड जैसी बचतों को तोड़ना पड़ता है। इससे लंबे समय में संपत्ति का ग्रोथ प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी कहा कि म्यूचुअल फंड या ईपीएफ से अस्थायी निकासी भी भविष्य के रिटर्न को काफी हद तक कम कर सकती है।
हेल्थ कॉर्पस की जरूरत हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। इसका आकार तय करते समय उम्र, परिवार में आश्रितों की संख्या, शहर, जीवनशैली, आय और पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास जैसे कारकों को ध्यान में रखना चाहिए।
संजिव बजाज, जॉइंट चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, बजाज कैपिटल के अनुसार, जिन लोगों पर जिम्मेदारियां अधिक हैं या जो मेट्रो शहरों में रहते हैं, उन्हें बड़ा वित्तीय बफर रखना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि हेल्थ कॉर्पस स्वास्थ्य बीमा का विकल्प नहीं हो सकता। दोनों की भूमिका अलग है। बीमा बड़े और अचानक आने वाले मेडिकल खर्चों को कवर करता है, जबकि हेल्थ कॉर्पस छोटे या बीमा से बाहर के खर्चों के लिए तुरंत नकदी उपलब्ध कराता है।
संजिव बजाज के मुताबिक केवल आत्मनिर्भर फंड पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है, खासकर बुढ़ापे में जब स्वास्थ्य खर्च तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए बीमा और हेल्थ कॉर्पस को एक साथ रखना बेहतर रणनीति है।
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य कोष बनाते समय निवेशकों को सबसे पहले सुरक्षा और तरलता यानी आसानी से पैसे निकालने की सुविधा पर ध्यान देना चाहिए। शुरुआती वर्षों में कुछ सीमित मात्रा में इक्विटी निवेश किया जा सकता है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य लंबी अवधि में अधिक जोखिम लेना नहीं होना चाहिए।
जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है, स्वास्थ्य कोष को अधिक स्थिर और सुरक्षित साधनों की ओर स्थानांतरित करना बेहतर माना जाता है। इसमें लिक्विड फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे विकल्प शामिल हैं, जो जरूरत के समय तुरंत नकदी उपलब्ध कराने में सक्षम होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल इमरजेंसी के दौरान धन की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण होती है।
Sanjeev Govila, सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर और ह्यूम फौजी इनिशिएटिव्स के सीईओ, का कहना है कि स्वास्थ्य कोष का मकसद अधिकतम रिटर्न कमाना नहीं है। उनका कहना है, “स्वास्थ्य कोष का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मेडिकल इमरजेंसी के समय निवेशकों को घबराहट में कोई गलत वित्तीय निर्णय न लेना पड़े।”
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि स्वास्थ्य कोष और आपातकालीन फंड को आपस में मिलाना नहीं चाहिए। दोनों की भूमिका अलग होती है और इन्हें अलग-अलग रखा जाना चाहिए ताकि जरूरत के समय धन की उपलब्धता प्रभावित न हो।
संजय गोविला के अनुसार एक आम गलती यह भी है कि लोग अपने स्वास्थ्य कोष को ऐसे निवेशों में डाल देते हैं जहां से पैसे तुरंत निकालना मुश्किल होता है। यह स्थिति आपातकाल में बड़ी परेशानी खड़ी कर सकती है। इसलिए तरलता को हमेशा प्राथमिकता देना जरूरी है।