अधिकांश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में शहर वह जगह होती हैं जहां उत्पादकता से जुड़े काम होते हैं, मजदूरी-पगार ज्यादा होती है और आर्थिक वृद्धि तेजी से होती है। भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है और इसके शहरी केंद्र इस वृद्धि को बड़े पैमाने पर समायोजित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहां शहरी नीतियां, इस अवसर के पैमाने के अनुसार नहीं ढल पाई हैं: वह है आवासीय क्षेत्र।
समस्या यह नहीं है कि इसे नजरअंदाज किया गया बल्कि अक्सर इसे गलत तरीके से समझा गया और कभी-कभी तो इसे गलत श्रेणी में रखा गया है। सस्ते शहरी आवास को अक्सर कल्याणकारी नीति या सब्सिडी और परोपकार जैसे काम के बीच एक सामाजिक पुनर्वितरण व्यवस्था के रूप में देखा गया। यह दृष्टिकोण पूरी तरह से यह समझने में चूक करता है कि आवासीय क्षेत्र वास्तव में अर्थव्यवस्था में क्या भूमिका निभाता है।
जैसे सड़कें या बिजली की आपूर्ति, शहर की उत्पादकता बढ़ाने के लिए आधार बनती हैं, वैसे ही आवास भी उस आधार का हिस्सा है जो एक उत्पादक शहर को सक्षम बनाता है। भारत में इसका अभाव केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है बल्कि यह व्यापक आर्थिक अवसर से जुड़ी समस्या भी है और फिलहाल इस अवसर को भुनाने की कोशिश काफी हद तक नहीं हुई है।
दिसंबर 2025 में नीति आयोग की एक समिति ने, संयुक्त राष्ट्र के घरेलू संकट प्रारूप का उपयोग करते हुए, महानगरों, शहरी और कस्बाई क्षेत्रों में 5 से 7 करोड़ आवास की कमी का अनुमान लगाया। वहीं, सीआईआई-नाइट फ्रैंक की एक अनुमान वाली रिपोर्ट में इस समस्या को और गंभीर बताया गया। सबसे रूढ़िवादी अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक शहरों में करीब 3.12 करोड़ आवास की कमी होगी।
सरकार की ‘सबके लिए आवास’ कार्यक्रम की योजना के तहत वर्ष 2029 तक 1 करोड़ शहरी आवास जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है जो कुछ हिस्से की जरूरतों को पूरा करेगा लेकिन अधिकांश अंतर वास्तव में संरचनात्मक सुधारों की मांग करता है। आर्थिक तर्क भी स्पष्ट और केवल भारत तक सीमित नहीं है। किसी भी अर्थव्यवस्था में आवास सबसे अधिक नेटवर्क वाले क्षेत्रों में से एक है। इसके तार सीमेंट, स्टील, लॉजिस्टिक्स, पेंट और वित्तीय सेवाओं तक फैले हैं। वर्ष 1995 से 2009 के बीच 45 देशों में किए गए आईएलओ के एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन में पाया गया कि निर्माण क्षेत्र में आर्थिक उत्पादन का गुणक हमेशा पूरे अर्थव्यवस्था के औसत से अधिक रहा, चाहे किसी भी आय वर्ग का देश हो।
मध्य आय वाले देशों में हर 10 लाख डॉलर निवेश पर लगभग 3.6 गुना आर्थिक उत्पादन हुआ। भारत के अपने आंकड़े भी इस क्षेत्र की ताकत को दिखाते हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में निर्माण क्षेत्र ने 8.6 फीसदी वास्तविक जीवीए वृद्धि दर्ज की जो प्रमुख क्षेत्रों में सबसे अधिक थी। सवाल यह नहीं है कि निर्माण से वृद्धि होती है या नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत यह निवेश उस हिस्से में कर रहा है जहां जरूरत और गुणक सबसे अधिक हैं।
इसके अलावा, निर्माण क्षेत्र रोजगार के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाता है और यह निवेश के प्रति भी काफी प्रतिक्रियाशील है। फिर भी, अधिकांश नौकरियां कम वेतन वाली और अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी हैं। वर्ष 2022 तक, अधिकांश (70 फीसदी) अकुशल निर्माण श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम दैनिक वेतन भी नहीं मिला। यह क्षेत्र 5 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है, लेकिन सुरक्षा और पर्याप्त मजदूरी के बिना वे पूरी तरह से खर्च नहीं कर पाते और इस प्रकार आवास क्षेत्र में निवेश का वास्तविक गुणक प्रभाव भी सीमित रह जाता है।
निम्न-मध्य आय वाले देशों में जब मजदूरी बहुत कम होती है तब यह प्रेरित प्रभाव दब जाता है। यदि मजदूरी को सही किया जाए और कार्यबल को औपचारिक बनाया जाए तब आवास निवेश का गुणक प्रभाव और भी व्यापक हो जाएगा। भारत इस संकट के प्रति उदासीन नहीं रहा है। वर्ष 2024-25 में प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के लिए बजट में 36 फीसदी की बढ़ोतरी कर उसे 30,171 करोड़ रुपये किया गया जो देश का अब तक का सबसे महत्त्वाकांक्षी आवास कार्यक्रम है।
लेकिन यह योजना घर खरीदने पर केंद्रित है, जिसके लिए जमीन, ऋण योग्यता और स्थिर आय की जरूरत होती है और ये तीन चीजें शहरी क्षेत्र के गरीबों के पास नहीं होती है। इस योजना में लाभार्थी के लिए निर्माण वाले घटक का फायदा केवल उन लोगों तक पहुंचता है जिनके पास पहले से जमीन है, जबकि ऋण आधारित सब्सिडी उन परिवारों के पक्ष में है जो एक औपचारिक आय पाते हैं। नतीजा यह होता है कि योजना उन लोगों तक पहुंचती है जो वास्तव में इसके दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं हैं जबकि भूमिहीन प्रवासी, अनौपचारिक श्रमिक और फुटपाथ पर रहने वाले दैनिक मजदूर अब भी इसके दायरे से बाहर रह जाते हैं।
भारत के शहरों को अब बड़े पैमाने पर, सार्वजनिक व्यवस्था वाली किराये की आवास प्रणाली पर ध्यान देना चाहिए। मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु जैसे शहरों में जिन परिवारों की मासिक आय 15,000 रुपये से कम है, उनके लिए घर खरीदना वर्तमान में संभव नहीं है। जमीन की कीमतें, ब्याज दर और ऋण की अवधि इसे गणितीय रूप से असंभव बना देती हैं। ऐसे परिवारों के लिए समाधान यह है कि सार्वजनिक जमीन पर निजी डेवलपर के माध्यम से 50-60 साल के पट्टे पर किराये के मकान बनाए जाएं जहां किराया नियंत्रित हो और लंबी अवधि के कर्ज को किराये की आमदनी से सुरक्षा मिले। नीति
आयोग के अनुसार, भारत की शहरी आबादी जो वर्ष 2021 में 50 करोड़ थी उसके वर्ष 2050 तक 85 करोड़ तक बढ़ने का अनुमान है। यानी शहरों में 35 करोड़ लोग और आएंगे और यह लगभग मौजूदा अमेरिका की आबादी जितना होगा। किसी संरचनात्मक आवास समाधान के अभाव में ये लोग झुग्गियां बसाएंगे, शहरों के बुनियादी ढांचे पर दबाव डालेंगे और छोटे-छोटे कमरे में भरकर रहेंगे। चीन इस संदर्भ में सबसे बड़ा उदाहरण पेश करता है। चीन ने जमीन सुधार, सरकार समर्थित डेवलपर बाजार और आक्रामक रूप से रियल एस्टेट पर दिए जाने वाले ऋण के विस्तार के माध्यम से अपनी तेज आर्थिक वृद्धि के दौर में आवास की संख्या को बड़े पैमाने पर बढ़ाया है।
भारत जैसा देश जिस गति के हिसाब से ही शहरीकरण कर रहा है, जिसका निर्माण क्षेत्र से मिलने वाला आर्थिक रिटर्न बहुत अधिक है और आवास की कमी लगभग पूरी तरह कार्यरत आबादी में केंद्रित है, उसके पास एक बड़ी आर्थिक वृद्धि की दास्तां लिखने की पूरी सामग्री है। संस्थागत पहलू भी धीरे-धीरे सुव्यवस्थित हो रहे हैं, जमीन सुधार पर चर्चा चल रही है और किराये के आवास ढांचे पर विचार-विमर्श हो रहा है।
अब जरूरत है प्रश्न के दृष्टिकोण को बदलने की, मसलन हम गरीबों के लिए आवास पर कितना खर्च कर सकते हैं, इस तरह के सवालों के बजाय यह सवाल अहम है कि इस पर निवेश न करने से हम कितनी वृद्धि खो रहे हैं। यही वह जगह है जहां असली अवसर शुरू होता है।
(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपेटेटिवनेस के अध्यक्ष हैं। लेख में मीनाक्षी अजित का भी सहयोग है)