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ट्रंप के टैरिफ झटकों ने भारत को दूसरी पीढ़ी के सुधारों की ओर धकेला

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उम्मीद की जानी चाहिए कि ट्रंप द्वारा दिए गए भू-आर्थिक झटके देश में दूसरी पीढ़ी के अत्यधिक जरूरी सुधारों को गति देंगे। विस्तार से बता रहे हैं अजय छिब्बर

Last Updated- September 08, 2025 | 10:17 PM IST
India US Relation
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में जो चरणबद्ध सुधार आरंभ हुए थे और जिन्हें उनके बाद हर अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा और गहरा किया गया, वह सिलसिला अब बाधित हो गया है। डॉनल्ड ट्रंप अब भारत को चीन के साथ भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में एक रणनीतिक साझेदार के रूप में नहीं देखते। ट्रंप द्वारा लगाए गए 50 फीसदी दंडात्मक शुल्क और बार-बार किए गए अपमानों ने भारत को चीन के करीब ला दिया है। इस सप्ताह भारतीय प्रधानमंत्री ने सात वर्षों के अंतराल के बाद शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भाग लिया, जहां उनका स्वागत चीनी राष्ट्रपति शी चि​नफिंग ने किया। कुछ सप्ताह पहले तक ऐसा होना असंभव नजर आता।

अमेरिका को आखिरकार यह एहसास होगा कि भारत पर जोर-आजमाइश नहीं की जा सकती है लेकि तब तक शायद हालात बहुत बिगड़ जाएं। ट्रंप यूरोपीय संघ से कह रहे हैं कि वह भारत पर प्रतिबंध लगाए। एच-1बी वीजा और छात्र वीजा पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है और ट्रंप ने उस क्वाड बैठक को रद्द कर दिया है जो इस वर्ष के अंत में भारत में होने वाली थी। ध्यान रहे कि ट्रंप ने ही अपने पहले कार्यकाल में क्वाड का गठन किया था ताकि चीन पर लगाम कसी जा सके। इस पूरे घटनाक्रम में चीन ही विजेता के रूप में उभरा है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसंट का मानना है कि भारत के साथ अभी भी द्विपक्षीय व्यापार समझौता संभव है। हालांकि ट्रंप शायद इसकी इजाजत न दें। उनके मुताबिक तो भारत ने कुछ उत्पादों पर शुल्क दर शून्य करने की भी पेशकश की है लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। रिश्ते बिगड़ने के पीछे व्यक्तिगत संबंधों में टूटन को भी वजह बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ट्रंप पाकिस्तान के साथ युद्धविराम में उनकी भूमिका स्वीकार न करने के कारण भारत से नाराज हैं। वह मानते हैं कि उनका यह कदम उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार तक दिला सकता है।

ट्रंप अमेरिका के साथ भारत के व्यापार अधिशेष की बात करते रहते हैं लेकिन जब हम यह देखते हैं कि भारतीय अमेरिकी विश्वविद्यालयों में शिक्षा पर सालाना करीब 25 अरब डॉलर खर्च करते हैं, रॉयल्टी चुकाते हैं, रक्षा खरीद करते हैं और ई-कॉमर्स राजस्व में योगदान करते हैं तो वास्तव में पता चलता है कि भारत भुगतान संतुलन के घाटे का शिकार है। अमेरिका में एक अपीलीय अदालत ने ट्रंप द्वारा लगाए शुल्कों को अवैध बताया है लेकिन लगता नहीं कि यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय में टिक सकेगा क्योंकि वह आमतौर पर ट्रंप के पक्ष में निर्णय देता है।

द्विपक्षीय समझौते में देरी के लिए तेल और दूध को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर शुल्क बढ़ाया है जो अपने आप में समझ से परे है। खासतौर पर यह देखते हुए कि उन्होंने अलास्का में पुतिन का स्वागत किया था तथा अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों रूस से गैस, उर्वरक, यूरेनियम और पैलेडियम खरीदते हैं। भारत, चीन और तुर्किये ने रूस से ज्यादातर वह कच्चा तेल खरीदना शुरू किया है जो अमेरिका और यूरोपीय संघ ने बंद किया है। ऐसा नहीं होता तो वैश्विक तेल कीमतों में इजाफा होता। तो भारत पर निशाना क्यों?

अमेरिका को कृषि उत्पादों पर भी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए- खासतौर पर दूध को लेकर। अगर अमेरिका उत्पादन पर भारी सब्सिडी देता है जिसके बाद उसके दूध उत्पादक विश्व बाजारों में अपना दूध उतारने पर विवश होते हैं तो भारत से ऐसे आयात को इजाजत देने की उम्मीद करना उचित नहीं है। ऐसा करने से देश के 8-10 करोड़ ऐसे लोगों की आजीविका पर असर होगा जो पशुपालन पर निर्भर हैं। ट्रंप के कदमों ने ब्रिक्स में नई जान फूंक दी है। इन कदमो में ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका पर भारी टैरिफ लगाना शामिल है। अब भारत और चीन इस समूह को मजबूत बनाने में लगे हैं।

वर्ष 2026 और 2027 में ब्रिक्स प्लस की अध्यक्षता इन्हीं दोनों देशों के पास रहनी है। देखना होगा कि यह सौहार्द कितने समय तक बना रहेगा। खासकर सीमा विवाद और एशिया का चौधरी बनने की चीन की इच्छा को देखते हुए। प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीति वैज्ञानिक जॉन मियरशाइमर का कहना है कि पिछली अमेरिका सरकारों की नीतियों ने रूस और चीन को एक-दूसरे के करीब ला दिया, और अब ट्रंप की नीतियां भारत को उनके करीब धकेल रही हैं।

ब्रिक्स भारत को कुछ भू-राजनीतिक लाभ दिला सकता है लेकिन फिलहाल इसके आर्थिक लाभ सीमित हैं। ब्रिक्स प्लस समूह का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) करीब 32 लाख करोड़ डॉलर है जो वैश्विक जीडीपी का 27 फीसदी है। इसका बाजार जी7 जैसा नहीं है जिसकी कुल जीडीपी 50 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है और वह वैश्विक जीडीपी के 45 फीसदी योगदान करता है। इतना ही नहीं ब्रिक्स प्लस के कुल जीडीपी में 20 लाख करोड़ डॉलर से अधिक का योगदान अकेले चीन का है। भारत चीन को बहुत कम निर्यात करता है और वहां उसके निर्यात में इजाफा होने की संभावना नहीं है। भारत की समृद्धि की राह निर्यात बढ़ाने और जी7 देशों से तकनीक जुटाने में है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता इस लक्ष्य के लिए जरूरी है। बिना इसके भारत न केवल अपना सबसे बड़ा निर्यात बाजार खो देगा बल्कि वह चीन प्लस 1 दुनिया में आने वाले नए निवेश से भी वंचित रह जाएगा। वह निवेश अब मेक्सिको, वियतनाम और अन्य उन देशों में जाएगा जहां अमेरिकी टैरिफ कम है।

भारत 50 फीसदी शुल्क के कारण निर्यातकों पर पड़ने वाले तत्काल प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है, यदि वह रुपये को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अवमूल्यित होने दे। विशेष रूप से यह देखते हुए कि मुद्रास्फीति कम स्तर पर है। अमेरिका को निर्यात करने वाले निर्यातकों को टैक्स रिफंड और ऋण रियायत प्रदान करना, साथ ही उनके आवश्यक इनपुट्स पर शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को समाप्त करना भी इस प्रभाव को कम करने में मददगार होगा। हमें घरेलू सुधारों की आवश्यकता है ताकि कारोबारी सुगमता बेहतर हो सके। इनमें से बहुप्रतीक्षित जीएसटी सुधारों को अंजाम देते हुए उसे दो दरों में समेट दिया गया है।

अब जरूरत है ईंधन कीमतों को जीएसटी के दायरे में लाने की। हमारे यहां ईंधन कीमतें अन्य प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक हैं। बिजली और रेल किराये की क्रॉस सब्सिडी के कारण भी कारोबार की लागत बढ़ती है जिसे कम करना जरूरी है। श्रम बाजार में सुधार की आवश्यकता है और जमीन के उपयोग की नीति को अधिक सहज बनाने की आवश्यकता है। बैंकिंग मार्जिन में कमी करना भी एक प्राथमिकता होनी चाहिए। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता और अन्य व्यापार समझौतों मसलन व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते (सीपीटीपीपी) में शामिल होना, पर्यटन को बढ़ावा देना आदि भारत के लिए बहुत फायदेमंद साबित होंगे।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, ‘हर संकट के बीच एक महान अवसर छिपा होता है।’ भारत को अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं को खुला रखना चाहिए किंतु अपने महत्त्वपूर्ण हितों से समझौता किए बिना। अमेरिका में समृद्ध और प्रभावशाली मानी जाने वाली भारतीय-अमेरिकी लॉबी को भी सक्रिय किया जाना चाहिए ताकि अमेरिका की भारत नीति में अधिक समझदारी लाई जा सके। ट्रंप की भू-आर्थिक हलचल वह झटका साबित हो सकती है, जिसने भारत को उसके लंबे समय से प्रतीक्षित और अत्यंत आवश्यक दूसरे चरण के सुधारों की ओर धकेला। जो उसे आगे बढ़ाने में सहायक बने। यदि भारत घरेलू स्तर पर मजबूत होता है, तो भू-आर्थिक समीकरण भी भारत के पक्ष में झुकेंगे।

(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी में विशिष्ट विजिटिंग स्कॉलर हैं)

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First Published - September 8, 2025 | 9:51 PM IST

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