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स्थिरता के दिखावे के बीच भारत की अर्थव्यवस्था के सामने बढ़ते बाहरी जोखिम

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देश की सीमित राजकोषीय बचाव क्षमता के कारण पश्चिम एशिया संकट के बीच हमारा वृहद आर्थिक जोखिम बहुत बढ़ गया है। विस्तार से बता रहे हैं एम गोविंद राव

Last Updated- April 15, 2026 | 9:55 PM IST
West Asia Crisis
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

अमेरिका ने ईरान में जो दुस्साहस किया है उसके विनाशकारी परिणाम अभी भारतीय अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह नजर नहीं आ रहे हैं। बढ़ती ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति में रुकावटों के आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति, रोजगार, विनिमय दर में गिरावट और भुगतान संतुलन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव अभी उभरने शुरू ही हुए हैं। इसका पूरा प्रभाव अभी महसूस नहीं हो सका है क्योंकि सरकार ने असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी में चुनावों के चलते इसके असर को अभी जनता तक नहीं पहुंचने दिया है।

हालांकि सरकार की अवशोषण क्षमता सीमित है और उसका लचीलापन तेजी से समाप्त हो रहा है, भले ही उसने 27 मार्च तक एक सप्ताह में अपने विदेशी मुद्रा भंडार को 10.3 अरब डॉलर घटाकर 688 अरब डॉलर तक ला दिया हो। वास्तव में, वित्त वर्ष 26 में रुपये का 9.9 फीसदी अवमूल्यन एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन है।

पश्चिम एशिया में जारी शत्रुता हालात सामान्य होने के आवरण को उजागर कर देगी, और सीमित राजकोषीय गुंजाइश के साथ ऐसी गतिविधियों को बनाए रखना कठिन होगा। उम्मीद है कि दो सप्ताह का युद्धविराम परदे को गिराए रखेगा। दूसरी ओर, यदि शत्रुता लंबी खिंचती है, तो कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहेंगी और आपूर्ति व्यवधानों के साथ मिलकर भारत को गंभीर ऊर्जा कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। विकल्प कम होते जा रहे हैं, ऐसे में सरकार चुनावों के बाद ऊर्जा कीमतों को बाजार की वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए बढ़ा सकती है। ‘गोल्डीलॉक्स’ (मजबूत आर्थिक वृद्धि और कम मुद्रास्फीति) वाली अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीतिजनित मंदी के चक्रव्यूह में फंसने में अधिक समय नहीं लगेगा।

युद्ध विराम की घोषणा हो चुकी है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि शत्रुता समाप्त होगी या नहीं, या फिर भारतीय अर्थव्यवस्था को कितनी क्षति पहुंचेगी। एक अनुमान के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में 20 डॉलर प्रति बैरल का इजाफा वैश्विक आर्थिक वृद्धि को 0.2 से 0.4 फीसदी तक कम कर देगा। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में 0.8 से 1 फीसदी की कमी आने का अनुमान है। वहीं मुद्रास्फीति में भी इतना ही इजाफा होने का अनुमान है। यद्यपि यह कीमतों के प्रभाव के लगभग बराबर हो सकता है लेकिन उपलब्धता से जुड़ी समस्याएं बनी रह सकती हैं जिससे परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं।

ऊर्जा कीमतों के पुनः निर्धारण और कच्चे माल की लागत वृद्धि को ध्यान में रखने के बाद, अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की स्थितियां फिर से उभरने की संभावना है। मानवीय पीड़ा को केवल इन वृद्धि और मुद्रास्फीति के आंकड़ों से नहीं दर्शाया जा सकता।

पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण भारत का विनिर्माण पीएमआई लगभग चार साल के निचले स्तर यानी 53.9 पर आ गया है, जो पिछले महीने 57.9 था। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती सरकार की वित्तीय कठिनाइयों को और बढ़ा सकती है, जो पहले से ही दबाव में है। कीमतें कम होने पर भी तेल और गैस की कमी घरों और व्यवसायों को परेशान करती रहेगी।

इसका असर परिवहन क्षेत्र से आगे भी जाएगा। कई छोटे और मझोले उद्योग बंद होने के खतरे का सामना कर रहे हैं। कृषि पर भी असर पड़ेगा क्योंकि उर्वरकों की अनुपलब्धता और ऊंची कीमतें सरकार को सब्सिडी बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। ऊर्जा-गहन छोटे और मध्यम उद्यमों पर विशेष रूप से परिवहन, धातुकर्म, रसायन और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक बोझ पड़ेगा। अल्पावधि में नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव संभव नहीं है, इसलिए कठिनाइयां तथा दुर्लभ वस्तुओं की काला बाजारी और भी बढ़ सकती है। जितनी लंबी शत्रुता खिंचेगी, उतने ही स्पष्ट रूप से वृद्धि, रोजगार, विनिमय दर, चालू खाते के घाटे और समग्र मानवीय अनुभव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

देश में राजकोषीय बफर की कमी से व्यापक आर्थिक अस्थिरता के जोखिम बढ़ जाते हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आधार बदलने के कारण, 2025-26 के लिए राजकोषीय घाटे का संशोधित अनुमान जीडीपी का 4.8 फीसदी तय किया गया है, जबकि पहले यह 4.4 फीसदी था। आधार संशोधन के बाद 2026-27 के लिए बजट घाटा जीडीपी का 4.8 फीसदी अनुमानित है, जबकि पहले यह 4.3 फीसदी था।

वर्ष 2030 तक ऋण-जीडीपी अनुपात को जीडीपी के 50 (1 फीसदी कम या ज्यादा ) तक कम करने का लक्ष्य भी टूटने के खतरे में है। चिंता की बात यह है कि संघ और राज्य स्तर पर राजकोषीय जिम्मेदारी कानून पारित होने के बावजूद, 2007-08 को छोड़कर किसी भी वर्ष में जीडीपी के 6 फीसदी तक राजकोषीय घाटे को सीमित करने का लक्ष्य हासिल नहीं किया गया।

इसके अतिरिक्त, कोविड वर्ष को छोड़कर, जब घरेलू क्षेत्र की वित्तीय बचत 11.1 फीसदी तक पहुंची थी, किसी भी वर्ष में यह 12वें वित्त आयोग द्वारा राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन लक्ष्यों को निर्धारित करते समय अनुमानित जीडीपी के 10 फीसदी के करीब नहीं आई। कोविड वर्ष के बाद से राजकोषीय एकीकरण के दावे किए जाते हैं, लेकिन 2023-24 में कुल राजकोषीय घाटा जीडीपी का 8.8 फीसदी था, जबकि घरेलू क्षेत्र की शुद्ध वित्तीय बचत केवल जीडीपी के लगभग 5.2 फीसदी थी।

इससे उद्योग के लिए उधार लेने की लागत बढ़ गई है। वास्तव में, 2021-22 से कुल राजकोषीय घाटा घरेलू क्षेत्र की वित्तीय बचत से कहीं अधिक रहा है, जिससे ऊंची उधारी लागत के कारण निवेश के माहौल ठहराव में आ गया है। लगभग 90 फीसदी वित्तीय संस्थान सरकार के स्वामित्व में हैं और यह सरकारी उधारी में सहायक होता है। समय-समय पर नकदी का संचार केवल सरकार की उधारी लागत को कम रखने में मदद करता है। किसे परवाह है कि रिजर्व बैंक कई बार परस्पर विरोधी भूमिकाओं का प्रबंधन करते हुए हितों के टकराव का सामना करता है।

सीमित राजकोषीय गुंजाइश वाले वातावरण में ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि एक संकट को जन्म दे सकती है। जब 1990 में सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर आक्रमण किया था, तब तेल की कीमतें दोगुनी हो गई थीं और संचित राजकोषीय असंतुलन अभूतपूर्व संकट में बदल गया था। उस संकट के बाद से बाजार-आधारित सुधारों के कारण अर्थव्यवस्था ने लचीलापन हासिल किया है और हम 1991 की तुलना में ऐसे झटके का सामना करने के लिए कहीं बेहतर स्थिति में हैं।

लेकिन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऊंचे घाटे और अत्यधिक सरकारी उधारी, जिसे वित्तीय दमन ने और बढ़ावा दिया है, कॉरपोरेट निवेश को उनकी उधारी लागत बढ़ाकर सीमित कर देंगे। स्थिति वर्तमान में जितनी सामान्य दिखती है, उतनी है नहीं, और जितनी देर हम राजकोषीय समायोजन में करेंगे, समस्या उतनी ही गंभीर होती जाएगी। तात्कालिक संदर्भ में, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाना बाजार की वास्तविकता को दर्शाने के लिए अहम है।

सरकार को यह भी सोचना होगा कि क्या उसे रोजगार मेलों या प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 81.3 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देने जैसी योजनाओं को जारी रखना चाहिए, विशेषकर तब जब बहुआयामी गरीबी घटकर जनसंख्या के 11.28 फीसदी तक आ गई है। आशा है कि सरकार इस संकट से उपजे अवसर में आवश्यक सुधारों को लागू करने में नहीं चूकेगी।


(लेखक एनआईपीएफपी के पूर्व निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - April 15, 2026 | 9:52 PM IST

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