आंध्र प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कई रास्ते नजर आ रहे हैं मगर चुनौती यह है कि वह किस ओर कदम बढ़ाए। राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में एक मुखर सहयोगी दल साबित हुआ है। मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) की सोची-समझी एवं सतर्क आलोचना को छोड़कर तेलुगु देशम अन्य सभी मुद्दों पर अपनी सहयोगी भाजपा के साथ खड़ी दिखी है। यह आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि केंद्रीय मंत्रिपरिषद में उसके दो सदस्य हैं। नायडू ने संविधान के 131वें संशोधन विधेयक का जोरदार बचाव किया और इसे विफल करने के लिए विपक्ष की कड़ी आलोचना की।
भाजपा के लिए नायडू का रुख अन्य सहयोगियों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण था क्योंकि आंध्र प्रदेश दक्षिण भारत का एकमात्र राज्य बनकर उभरा जिसने इस सोच को चुनौती दी कि परिसीमन से उत्तर भारतीय राज्यों की तुलना में दक्षिणी राज्यों को अधिक नुकसान होगा। मगर वह अकेले नहीं थे। राज्य में नायडू के कट्टर प्रतिद्वंद्वी और वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी ने भी विधेयक पर विपक्ष पर हमला करते हुए भाजपा का समर्थन किया। रेड्डी ने तेलुगु देशम और नायडू को निशाना बनाया है मगर भाजपा पर हमले करने से परहेज करती रही है, खासकर 2024 के लोक सभा चुनाव के बाद से। ऐसा नहीं लगता कि उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) में लंबित पड़े मामले ही उन्हें भाजपा की आलोचना करने से रोक रहे हैं।
दो सबसे शक्तिशाली राजनीतिक ताकतों के बीच भाजपा का समर्थन करने की मची होड़ से भाजपा को एक ही समय में फायदे और नुकसान दोनों हो रहे हैं।
अपने तमाम प्रयासों के बावजूद आंध्र प्रदेश विधान सभा चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत एक अंक में ही रहा है। वर्ष 2014 में लोक सभा सीटों पर भाजपा का मत प्रतिशत 7.22 फीसदी था। वर्ष 2019 में यह घटकर लगभग 0.98 फीसदी हो गया।
वर्ष 2014 के विधान सभा चुनाव में यह 4.13 फीसदी था और वर्ष 2019 में घट कर 0.84 फीसदी रह गया। पार्टी ने 2024 में सुधार किया और लोक सभा में 11.2 फीसदी मत प्राप्त किए मगर विधान सभा में उसका मत प्रतिशत 2.83 फीसदी पर ही रहा (वर्ष 1999 से ही राज्य में लोक सभा और विधान सभा चुनाव एक साथ हो रहे हैं)।
भाजपा को लगा कि समस्या कहीं न कहीं उसकी राज्य इकाई के नेतृत्व में है। पिछले साल एक रणनीतिक निर्णय के तहत उसने डी पुरंदेश्वरी की जगह पीवीएन माधव को राज्य भाजपा अध्यक्ष नियुक्त किया। पुरंदेश्वरी ने भाजपा राज्य अध्यक्ष के रूप में केवल दो साल काम किया मगर कई लोगों का मानना था कि वह पारिवारिक और जातिगत संबंधों से बंधी हुई थीं (उनकी बहिन का विवाह चंद्रबाबू नायडू से हुआ है)।
इसके उलट माधव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से ताल्लुक रखते थे और ओबीसी श्रेणी से हैं। वह अपने पूरे राजनीतिक जीवन में आरएसएस से जुड़े रहे। उनका काम तेलुगु देशम को नाराज किए बिना राज्य में भाजपा को मजबूत करना था ताकि 2029 में होने वाले विधान सभा चुनावों तक भाजपा की राज्य में अच्छी-खासी मौजूदगी हो जाए।
मगर यह कदम जोखिम भरा था। भाजपा वाईएसआर कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं कर सकती। जगन मोहन रेड्डी ईसाई धर्म से संबंध रखते हैं जो स्थिति को जटिल बना देती है। मगर भाजपा को उनसे रणनीतिक समर्थन लेने में कोई समस्या नहीं दिखती।
आंध्र प्रदेश में मुस्लिम आबादी 10 फीसदी है जो गुंटूर, कृष्णा, नेल्लोर जिलों और रायलसीमा के कुछ खास निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की संभावनाओं को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है।
नायडू इस बात से अच्छी तरह परिचित हैं और चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने मुसलमानों को आश्वस्त करने की कोशिश की कि भाजपा के साथ गठबंधन करने से उनके हितों को कोई नुकसान नहीं होगा। उन्होंने गठबंधन के सत्ता में आने पर समुदाय के लिए कई कदम उठाने का वादा किया। इनमें हज सब्सिडी, मस्जिद रखरखाव के लिए हर महीने 5,000 रुपये और दुल्हन योजना शामिल हैं जिसके तहत मुस्लिम दुल्हनों को 1 लाख रुपये देने का वादा किया गया था। उन्होंने मुसलमानों के लिए 4 फीसदी आरक्षण (ओबीसी कोटा के भीतर) बरकरार रखने का भी संकल्प लिया।
भाजपा को यह बात पसंद नहीं आई मगर लेकिन वह कुछ कह नहीं सकी। पड़ोसी राज्य तेलंगाना में चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक भाषण में कहा था ‘जब तक मोदी जीवित है तब तक मैं दलितों, आदिवासियों और ओबीसी का आरक्षण धर्म के आधार पर मुसलमानों को नहीं देने दूंगा।’ मगर आंध्र प्रदेश में ऐसा नहीं हुआ।
इसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी को उन मुद्दों तक ही स्वयं को रोक कर रखना पड़ा जिन्हें लगभग सभी लोगों का समर्थन मिल रहा है। उदाहरण के लिए इस महीने की शुरुआत में अपनी स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भाजपा ने ‘माना ऊरु-माना जेंडा’ नाम से एक जनसंपर्क अभियान शुरू किया जिसका मूल उद्देश्य लोगों को राज्य के लिए केंद्र की पहल के बारे में बताना था। राज्य में भ्रष्टाचार, विशेष रूप से अमरावती के विकास में रियल एस्टेट सौदों से जुड़े भ्रष्टाचार के खिलाफ जगन मोहन रेड्डी मोर्चा संभाल रहे हैं।
भाजपा के कई नेताओं का मानना है कि किसी राज्य में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा होना हमेशा पार्टी के लिए नुकसानदेह होता है चाहे ओडिशा में बीजू जनता दल के साथ गठबंधन हो या पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ। सरकार के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की विवशता के कारण पार्टी को सत्ताधारी दल के सामने झुकना पड़ता है क्योंकि सत्ताधारी दल के पास ही राजनीतिक दबदबा होता है। अब तक पार्टी इस स्थिति से बाहर नहीं निकल पाई है मगर आंध्र प्रदेश में सफलता हासिल के लिए उसे शायद ऐसा करना पड़ सकता है।