तीन गैर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों में सत्ताधारी दलों को हार का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के इन परिणामों के अलग-अलग सबक और नजरिये हैं। मैं पहले इन तीनों राज्यों के कुछ सामान्य पहलू सामने रखूंगा और फिर कुछ खास। सबसे पहले बात करते हैं पश्चिम बंगाल की।
मैं एक कहानी से शुरुआत करता हूं। श्यामल दत्ता, 1965 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे जिन्होंने 1998 से 2001 तक इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के निदेशक के रूप में काम किया। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। बाद में 2002 से 2008 तक वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग की सरकारों में नागालैंड के राज्यपाल रहे। वह किसी राजनीतिक दल के वफादार नहीं थे।
कोलकाता की एक उड़ान के दौरान मैंने उनसे पूछा था कि क्या भाजपा कभी पश्चिम बंगाल में जीत सकती है। उन्होंने कहा था कि बंगाल किसी भी अन्य प्रदेश की तुलना में भाजपा को अधिक खुले दिल से अपनाएगा। बस यह देखना है कि इसमें कितना वक्त लगेगा। 85 वर्षीय दत्ता सेवानिवृत्ति के बाद कोलकाता के बालीगंज में रहते हैं। मैंने उन्हें फोन करके 26 साल पहले हुई बातचीत की याद दिलाई। और पूछा कि आखिर उन्हें इतना यकीन कैसे था कि भाजपा वहां जीत जाएगी? उन्होंने कहा, ‘यह बहुत पुरानी बात हो गई लेकिन शायद मैं ऐसा इसलिए कह सका क्योंकि मैं कोलकाता में वाजपेयी की रैली में उनके साथ था। वह ममता बनर्जी के घर गए थे और उन्होंने उनकी मां के पैर छुए थे।’
वहां लोगों की गर्मजोशी और भीड़ देखकर उन्हें लगा था कि बंगाल भाजपा के लिए तैयार है। उन्होंने कुछ दार्शनिक अंदाज में कहा कि उन्हें यह भी लगा था कि ममता बंगाल में भाजपा की नेता हो सकती हैं। लेकिन यह कहानी सिरे से उलट गई। ममता की तृणमूल कांग्रेस वाजपेयी के राजग की सदस्य थी और वह रेल मंत्री थीं। फरवरी 2002 के गुजरात दंगों और नरेंद्र मोदी के उभार के बीच मुस्लिम मतों की जरूरत ने ममता को राजग छोड़ने पर विवश किया। इस कहानी के कुछ सबक हैं।
1. पहला निष्कर्ष उनकी पराजय से निकलता है। अब तक कल्याणकारी योजनाओं और पहचान की राजनीति का संयोजन उनके लिए कारगर रहा। 30 फीसदी मुस्लिम वोट और महिलाओं की निष्ठा के चलते वह भाजपा की दशक भर की चुनौती के बावजूद अजेय दिखती थीं। लेकिन आखिरकार स्पष्ट नजर आने वाले विकास की कमी और वाम मोर्चा के समय की ‘दादागीरी’ (स्थानीय माफिया) ने उन्हें हरा दिया। निश्चित रूप से भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन सबक यह है कि केवल कल्याणकारी योजनाएं और पहचान की राजनीति बार-बार काम नहीं करतीं। चौथी बार तो बिल्कुल नहीं। विकास जरूरी है।
2. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दोनों क्षेत्रीय पहचान की राजनीति की सीमाओं को उजागर करते हैं। दीदी और एमके स्टालिन दोनों ने अपनी राजनीति दिल्ली, हिंदी वर्चस्व और अन्यायपूर्ण केंद्र के खिलाफ आगे बढ़ाई। लेकिन उन्होंने यह नहीं समझा कि युवा अधीर हो रहे थे। तमिलनाडु ने पश्चिम बंगाल से अधिक नौकरियां पैदा कीं, लेकिन भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में पीछे छूटे लोग हमेशा लाभ पाने वालों से अधिक होंगे। यही असंतोष जोसेफ विजय की सफलता का कारण बना। दीदी के पास धर्मनिरपेक्षता की अपनी परिभाषा के अलावा कोई विचारधारा नहीं है और तमिल मतदाता पुरानी द्रविड़ विचारधारा से थक चुके हैं। उन्हें नयेपन की आवश्यकता थी।
3. विजय का उदय अभूतपूर्व नहीं है। हमारे पड़ोस के दो वास्तविक लोकतंत्रों यानी श्रीलंका और नेपाल में पहले ही बाहरी नेता स्थापित पार्टियों को किनारे कर चुके हैं। इससे सबक यह है कि लोग, खासकर युवा, बार-बार पुरानी राजनीति के दोहराव से ऊब सकते हैं। यदि कोई नया चेहरा नई सोच और साफ छवि के साथ सामने आता है, तो वे उसे मौका देंगे। इसका पहला संकेत हमने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के रूप में देखा, और अधिक महत्त्वपूर्ण रूप से पंजाब में, जहां अकाली दल जैसी गहरी जड़ें जमाने वाली धार्मिक क्षेत्रीय पार्टी मौजूद थी। राजनीतिक रूप से बाहरी व्यक्ति अब हमारी राजनीति का ‘एक्स फैक्टर’ बन गया है। याद रखिए, तमिलनाडु में श्रीलंका और नेपाल दोनों को मिलाकर भी अधिक मतदाता हैं।
4. हमने तथाकथित ‘अल्पसंख्यक’ वोट के हाशिए पर जाने को देखा है। विभाजन की तर्कशक्ति यही है कि मुसलमान बिखरे हुए हैं, भले ही कुछ राज्यों में उनकी संख्या उल्लेखनीय हो। उनका वोट तभी मायने रखता है जब जिन नेताओं पर वे भरोसा करते हैं, वे हिंदुओं के बड़े हिस्सों के साथ गठबंधन करें। मंडल युग में यादव नेताओं और मायावती ने जाति-आधारित समर्थन जुटाया। वे तीन-तरफा मुकाबले में लगभग 30 फीसदी वोट पाकर जीत सकते थे। लेकिन भाजपा ने हिंदू वर्चस्व का विस्तार कर कई जाति-आधारित दलों को साथ जोड़ लिया है, इसलिए 30 फीसदी वाला दौर खत्म हो गया है। यदि भाजपा को हिंदू वोट का 50 फीसदी मिल जाता है, तो उसकी जीत तय है। पश्चिम बंगाल और असम में उसे लगभग 60 फीसदी की आवश्यकता होती है। इसलिए ‘धर्मनिरपेक्ष’ पार्टियों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। अन्यथा, भारत की 15 फीसदी मुस्लिम आबादी चुनावी दृष्टि से महत्त्वहीन हो जाएगी।
5. राजनीतिक वाम का अंत इतना अपरिहार्य है कि अब इस पर कोई शेखी भी नहीं बघारेगा। केरल में बड़ी हार, पश्चिम बंगाल में लगभग शून्य और तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) के नेतृत्व वाले गठबंधन की पराजय ने वामपंथ को लगभग समाप्त कर दिया है। यह सशस्त्र, ‘क्रांतिकारी’ वामपंथ के अंत के साथ मेल खाता है।
6. क्षेत्रीय पार्टियां अब धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। कुल मिलाकर विजय की तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) का उदय संतुलन बना देता है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस को वापसी में कठिनाई होगी। असम में कभी प्रभावशाली रहा असम गण परिषद अब भाजपा की दूर की सहयोगी बन गई है। शिवसेना विभाजित है। अकाली दल अपने गौरवशाली दिनों की छाया मात्र रह गया है, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा), द्रमुक, जनता दल (सेक्युलर) कमजोर हो चुके हैं और जनता दल (यूनाइटेड) नीतीश कुमार के साथ ढलान की ओर है। भारत राष्ट्र समिति टूट चुकी है और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) स्थायी निष्क्रियता में है। इसका अर्थ यह है कि क्षेत्रीय शक्तियां क्षीण हो रही हैं। ध्यान रहे, मैंने केवल उन्हीं पार्टियों को सूचीबद्ध किया है जिन्होंने कई बार मुख्यमंत्री पद का आनंद लिया है।
7. केरल को छोड़कर, क्षेत्रीय दलों का पतन कांग्रेस के लिए भी सकारात्मक है। इन क्षेत्रीय दलों में से कई या तो कांग्रेस से अलग होकर बने (तृणमूल, युवजन श्रमिक रायथु कांग्रेस पार्टी या वाईएसआरसीपी, राकांपा), या फिर इसके वोट बैंक को खींच ले गए (समाजवादी पार्टी, बीएसपी, राष्ट्रीय जनता दल)। यदि कांग्रेस धैर्य रखकर मेहनत करने को तैयार हो। तो इन दलों का पतन कांग्रेस के लिए नए अवसर खोलता है। सवाल यह है कि क्या उसके पास कौशल, साहस और विनम्रता है? याद रखिए भाजपा ने 2016 में पश्चिम बंगाल में केवल तीन सीटों से शुरुआत की थी।
8. आखिर में, यदि आप भाजपा की सफलता का श्रेय या दोष केवल हिंदुत्व को देंगे तो यह भूल होगी। यह उससे अधिक है। यह है ‘हिंदूकृत राष्ट्रवाद’। दुनिया भर के लोकतंत्रों में कठोर राष्ट्रवाद फिर लौट आया है। जब तक भाजपा के प्रतिद्वंद्वी इसे स्वीकार नहीं करते, वे और अधिक अप्रासंगिक होते जाएंगे। पश्चिम बंगाल में मतदान के अंतिम चरण की पूर्व संध्या पर निकोबार में राहुल गांधी की जो तस्वीर सामने आई है वह इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। इसका मकसद उस परियोजना को रोकना है जिसे व्यापक जनमत भारी सामरिक महत्व का मानता है। आज के उदारवाद को सबसे पहले कठोर राष्ट्रवाद की परीक्षा में खरा उतरना होगा।